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कल और आज
लेखक: विजय शर्मा एरी
प्रस्तावना
यादें कभी पुरानी नहीं होतीं। वे हमारे भीतर ऐसे जीवित रहती हैं जैसे किसी पुराने घर की दीवारों पर टंगी तस्वीरें—धूल से ढकी हुईं, पर हर बार साफ करने पर चमक उठती हैं। यह कहानी भी ऐसी ही यादों की है, जो एक साधारण इंसान के जीवन को असाधारण बना देती हैं।
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पहला अध्याय: गाँव का आँगन
रामेश्वर सिंह अब सत्तर वर्ष के हो चुके थे। शहर की भागदौड़ से थककर वे अपने पैतृक गाँव लौट आए थे। गाँव का वही पुराना घर, मिट्टी की दीवारें, नीम का पेड़ और आँगन में बिछी खटिया—सब कुछ उन्हें बचपन की ओर खींच ले जाता था।
नीम के पेड़ के नीचे बैठते ही उन्हें अपने पिता की आवाज़ सुनाई देती—
"रामू, पढ़ाई कर ले, यही तेरे जीवन का सहारा बनेगी।"
वे मुस्कुराते, क्योंकि वही पिता कभी खेतों में हल चलाते हुए कहते थे—
"खेती ही असली धन है।"
यादों का यह द्वंद्व उन्हें भीतर तक हिला देता।
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दूसरा अध्याय: माँ की रसोई
घर के भीतर जाते ही मिट्टी की खुशबू और रसोई से आती महक उन्हें माँ की याद दिलाती। माँ की रसोई में चूल्हे की आँच पर बनती रोटियाँ और दाल की खुशबू आज भी उनकी स्मृतियों में ताज़ा थी।
माँ अक्सर कहती थीं—
"बेटा, रोटी का स्वाद मेहनत से आता है।"
रामेश्वर को याद है, कैसे वे स्कूल से लौटते ही माँ के हाथ की बनी गुड़-रोटी खाते और फिर दोस्तों के साथ खेलने निकल जाते।
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तीसरा अध्याय: दोस्ती और खेल
गाँव के तालाब के किनारे उनकी टोली इकट्ठा होती। कबड्डी, गिल्ली-डंडा, पतंगबाज़ी—हर खेल में वे अपनी दुनिया खोज लेते।
एक बार पतंगबाज़ी में उनका सबसे अच्छा दोस्त सुरेश उनकी पतंग काट बैठा। उस दिन वे रो पड़े थे। लेकिन सुरेश ने अपनी पतंग उन्हें दे दी और कहा—
"दोस्ती में जीत-हार नहीं होती, रामू।"
यह वाक्य उनके जीवन का मंत्र बन गया।
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चौथा अध्याय: पहली मोहब्बत
यादों की पोटली में एक कोना हमेशा दिल को गुदगुदाता है—पहली मोहब्बत। गाँव की मेले में जब उन्होंने पहली बार शांति को देखा था, तो दिल की धड़कनें तेज़ हो गई थीं।
शांति की आँखों में मासूमियत और मुस्कान में अपनापन था। वे दोनों अक्सर खेतों की मेड़ पर मिलते और भविष्य के सपने देखते।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। शांति की शादी शहर में हो गई। रामेश्वर ने उस दिन समझा कि यादें कभी पूरी नहीं होतीं, वे अधूरी रहकर ही दिल में बस जाती हैं।
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पाँचवाँ अध्याय: संघर्ष और सफलता
यादें केवल सुखद नहीं होतीं, वे संघर्ष की भी गवाही देती हैं। रामेश्वर ने गाँव से निकलकर शहर में पढ़ाई की। गरीबी, भूख और अकेलेपन से जूझते हुए उन्होंने नौकरी पाई।
हर बार जब वे हार मानने लगते, तो उन्हें पिता की आवाज़ सुनाई देती—
"रामू, मेहनत करने वाला कभी हारता नहीं।"
यही आवाज़ उन्हें आगे बढ़ाती रही।
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छठा अध्याय: परिवार और ज़िम्मेदारी
समय बीता, रामेश्वर ने शादी की, बच्चे हुए। ज़िम्मेदारियों का बोझ बढ़ा, लेकिन यादों का सहारा उन्हें हर कठिनाई में शक्ति देता रहा।
बच्चों को पढ़ाते समय वे अक्सर कहते—
"तुम्हारी दादी कहती थीं कि शिक्षा सबसे बड़ा धन है।"
इस तरह वे अपनी पुरानी यादों को नई पीढ़ी तक पहुँचाते रहे।
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सातवाँ अध्याय: बुढ़ापा और स्मृतियाँ
अब जब वे गाँव लौटे हैं, तो हर कोना उन्हें पुकारता है। नीम का पेड़, तालाब, रसोई, मेले की गली—सब कुछ उनकी आँखों में जीवित है।
वे खटिया पर लेटकर आकाश देखते हैं और सोचते हैं—
"जीवन तो बीत गया, पर यादें ही असली पूँजी हैं।"
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उपसंहार
पुरानी यादें हमें यह सिखाती हैं कि जीवन केवल वर्तमान नहीं है। अतीत की स्मृतियाँ हमें गढ़ती हैं, सँवारती हैं और भविष्य की राह दिखाती हैं।
रामेश्वर की कहानी हर उस इंसान की कहानी है, जो अपने अतीत को दिल में सँजोकर वर्तमान को जीता है।