भुतहा हवेली का रहस्य
सर्दियों की एक ठंडी रात थी। गाँव के किनारे पर स्थित पुरानी हवेली को लोग "शापित हवेली" कहते थे। कहते हैं कि वहाँ से अक्सर अजीब आवाज़ें आती थीं—कभी किसी औरत की चीख, कभी बच्चों की रोने की आवाज़, और कभी घंटियों की झंकार। गाँव के लोग उस हवेली के पास जाना तो दूर, उसका नाम लेने से भी डरते थे।
रामेश्वर, जो कि एक युवा लेखक था, गाँव में अपने नाना-नानी से मिलने आया था। उसे रहस्यमयी कहानियाँ लिखने का शौक था। जब उसने हवेली की चर्चा सुनी, तो उसके भीतर जिज्ञासा जागी। उसने ठान लिया कि वह हवेली का रहस्य जानकर ही रहेगा।
हवेली का पहला दर्शन
अगली सुबह वह हवेली की ओर निकल पड़ा। हवेली बहुत विशाल थी, लेकिन टूटी-फूटी दीवारें और जंग लगे दरवाज़े उसकी वीरानी का सबूत दे रहे थे। खिड़कियों से झाँकती अंधेरी परछाइयाँ मानो किसी को भीतर बुला रही थीं। हवेली के दरवाज़े पर एक पुराना ताला लगा था, लेकिन अजीब बात यह थी कि दरवाज़ा आधा खुला हुआ था।
रामेश्वर ने साहस जुटाकर भीतर कदम रखा। अंदर धूल और जाले फैले हुए थे। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे, जिनकी आँखें मानो उसे घूर रही थीं। अचानक उसे लगा कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा है। वह पलटकर देखता है, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
रहस्यमयी घटनाएँ
हवेली के भीतर जाते ही उसे अजीब घटनाएँ महसूस होने लगीं। कभी उसे लगा कि कोई उसके पीछे चल रहा है, कभी किसी कमरे से फुसफुसाहट सुनाई देती। एक कमरे में उसने देखा कि एक पुरानी मेज़ पर लाल रंग की किताब रखी है। किताब पर धूल जमी थी, लेकिन उसके पन्ने अपने आप पलट रहे थे।
रामेश्वर ने किताब उठाई। उसमें हवेली के मालिक "राजा विक्रम सिंह" का ज़िक्र था। किताब में लिखा था कि राजा ने हवेली में एक गुप्त खज़ाना छिपाया था, लेकिन उसके लालच और अत्याचार के कारण हवेली शापित हो गई। राजा की आत्मा आज भी हवेली में भटकती है और जो भी खज़ाने की खोज करता है, उसे मौत मिलती है।
आधी रात का सामना
रामेश्वर ने ठान लिया कि वह खज़ाने का रहस्य खोजेगा। रात को वह फिर हवेली पहुँचा। जैसे ही घड़ी ने बारह बजाए, हवेली की दीवारें काँपने लगीं। अचानक दरवाज़े अपने आप बंद हो गए। कमरे में अंधेरा छा गया और एक ठंडी हवा बहने लगी।
उसने देखा कि सामने राजा विक्रम सिंह की आत्मा खड़ी है—लंबा कद, लाल आँखें और हाथ में तलवार। आत्मा ने गरजकर कहा, "यह हवेली मेरी है। जो भी यहाँ खज़ाने की तलाश करेगा, उसका अंत यहीं होगा।"
रामेश्वर ने साहस दिखाते हुए कहा, "मैं खज़ाने के लिए नहीं आया। मैं सच्चाई जानने आया हूँ।"
आत्मा का रहस्य
राजा की आत्मा कुछ पल चुप रही। फिर उसने कहा, "मेरे लालच ने मुझे शापित कर दिया। मैंने अपने ही लोगों को धोखा दिया और उनकी आत्माएँ इस हवेली में कैद हो गईं। जब तक कोई मेरे पापों का प्रायश्चित नहीं करेगा, यह हवेली शापित रहेगी।"
रामेश्वर ने किताब के पन्नों में देखा कि प्रायश्चित का एक तरीका लिखा था—राजा की हवेली में कैद आत्माओं की मुक्ति के लिए दीपक जलाकर प्रार्थना करनी होगी।
मुक्ति की घड़ी
रामेश्वर ने साहस जुटाया और हवेली के बीचोंबीच एक दीपक जलाया। उसने प्रार्थना की कि सभी आत्माएँ मुक्त हों। अचानक हवेली में तेज़ रोशनी फैल गई। चीखें और रोने की आवाज़ें धीरे-धीरे शांत हो गईं। राजा की आत्मा ने मुस्कुराकर कहा, "तुमने मुझे मुक्ति दी। अब यह हवेली शापित नहीं रहेगी।"
इसके बाद हवेली की दीवारें चमकने लगीं। जाले और धूल गायब हो गए। हवेली मानो नई हो गई।
अंत
रामेश्वर ने गाँव लौटकर सबको बताया कि हवेली अब सुरक्षित है। लोग पहले तो विश्वास नहीं कर पाए, लेकिन जब उन्होंने हवेली को चमकते देखा, तो सबने राहत की साँस ली।
रामेश्वर ने इस घटना को अपनी किताब में लिखा। उसकी कहानी ने न सिर्फ़ गाँव वालों को डर से मुक्त किया, बल्कि उसे एक प्रसिद्ध लेखक भी बना दिया।
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