Nakal se Kahi Kranti nahi Hui - 12 in Hindi Biography by Dr. Suryapal Singh books and stories PDF | नकल से कहीं क्रांति नहीं हुई - 12

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नकल से कहीं क्रांति नहीं हुई - 12

1982 में उच्चतर शिक्षा आयोग का गठन किया गया। इसने डिग्री कालेज के प्राचार्यो का चयन प्रारम्भ किया। पहले चयन में शास्त्री कॉलेज के दो अध्यापकों- अशोक श्रीवास्तव और प्रेम शंकर श्रीवास्तव का चयन हुआ था। दूसरे चयन में संत प्रकाश अस्थाना प्राचार्य के रूप में चुने गये थे। जब तीसरी बार आयोग का विज्ञापन निकला तो शास्त्री कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यापक एक फार्म लेकर आ गए। उन्होंने मुझसे कहा कि यह फार्म मैं आपके लिए ही लाया हूँ। आप इसे भर दीजिए। प्राचार्य बनने की मेरी इच्छा तो नहीं थी पर उनके कहने से मैंने वह फार्म भर दिया और निर्धारित शुल्क का ड्राफ्ट बनवा कर फार्म भेज दिया। थोड़े दिन बाद आयोग से सूचना आयी कि आपका ड्राफ्ट गलत नाम से है इसको सही कराकर भेजिए। जितना समय उन्होंने दिया था उस समय के अन्दर मैं भेज नहीं सका। उसे बाद में भेजा तो मैं सोच रहा था कि फार्म निरस्त हो जाएगा। पर कुछ दिनों के बाद साक्षात्कार के लिए उपस्थित होने की सूचना आ गई। मेरे पास डिग्रियाँ नहीं थीं। अंकपत्र तो थे। आयोग में डिग्री भी देखी जाती थी। लेकिन मुझे बुलाया गया था इसलिए अंकपत्र लेकर प्रयाग चला गया। डिग्री के लिए प्रार्थनापत्र लिख दिया कि डिग्री की द्वितीय प्रति प्राप्त करने की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी गई है। जैसे ही मिल जाएगी आयोग को उसकी प्रति उपलब्घ करा दूँगा। वहाँ साक्षात्कार हुआ। साक्षात्कार देकर मैं घर वापस लौट आया। गर्मी की छुटिटयां थीं। एक दिन शाही जी ही मेरे घर पहुँचे और कहा कि प्राचार्य के रूप में आपका चयन हो गया है। मैं आयोग में देखकर आया हूँ। चिट्ठी आती ही होगी। शास्त्री कॉलेज में काम करते हुए मैं काफी सन्तुष्ट था। प्राचार्य के रूप में जाने के लिए मैं बहुत उत्सुक नहीं था। जब चिट्ठी आ गई तो शास्त्री कॉलेज के बड़े बाबू सतीश वर्मा ने कहा कि चलो पहले कालेज देखते हैं। एक दिन सुबह की गाड़ी से हम लोग गोरखपुर पहुँचे, वहाँ से भटवली बाजार जाने के लिए नार्मल टैक्सी स्टैण्ड से टैक्सियाँ मिलती थीं। हम लोग जैसे ही स्टैण्ड पर पहुँचे एक टैक्सी भटवली बाजार जाने के लिए तैयार थी। हमें देखकर आगे बैठे एक सज्जन ने पूछा कि आप भटवली बाजार में कहाँ जाएँगे। बड़े बाबू ने जैसे ही कहा कि डिग्री कालेज जाना है, वे आगे की सीट से उतर पड़े हमें उस पर बिठाया और बड़े बाबू के साथ खुद पीछे बैठ गए। वे इण्टर कॉलेज के बड़े बाबू थे। उन्हें मालूम था कि डिग्री कालेज के प्राचार्य का चयन हो गया है। इसीलिए उन्होंने सम्मान में सीट छोड़ी। हम लोग एक घंटे में भटवली बाजार पहुँच गए। डिग्री कॉलेज सड़क पर ही था। बड़े बाबू हमें वहाँ पहुँचा कर खुद अपने कॉलेज चले गए। हम और वर्मा जी जैसे ही कॉलेज के बरामदे में पहुँचे तो एक सज्जन कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ते दिखे। हम लोगों को देखते ही वे खड़े हो गए। वे समाजशास्त्र के प्रोफेसर जयराम यादव थे। जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं ही चयनित प्राचार्य हूँ तो उन्होंने तुरन्त बड़े बाबू को बुलाने के लिए चपरासी को दौड़ा दिया। आफिस में रवीन्द्र सिंह कुछ टाइप कर रहे थे। वे भी बाहर आए और हम लोगां को बिठाया। थोड़ी देर बाद बड़े बाबू भी आ गए। उन्होंने जलपान के लिए चपरासी को दौड़ाया। हम लोग बैठकर जलपान करने लगे। बड़े बाबू ने कहा कि हम लोग प्राचार्य न होने से त्रस्त हैं। इसलिए आप जल्दी से जल्दी यहाँ पदभार ग्रहण कर लीजिए। तब तक बाजार में खबर फैल गई कि नए प्राचार्य आ गए हैं तो कई लोग मिलने के लिए आ गए। थोड़ी देर रुककर हम लोगां ने वहाँ का जायजा लिया। कॉलेज के मैनेजर रेलवे आफिस के कर्मचारी थे। वर्मा जी ने कहा कि चलो उनसे भी मिल लेते हैं। हम लोग भटवली बाजार से गोरखपुर आ गये। रेलवे के दफ्तर में जाकर मैनेजर से भेंट की। उन्होंने भी यथाशीघ्र पदभार ग्रहण करने के लिए कहा। उनसे मिलने के बाद हम लोग रेलवे स्टेशन आ गये। ट्रेन में लौटते समय वर्मा जी ने कहा कि आप पदभार ग्रहण कर लीजिए।। कॉलेज ठीक लगता है। हम लोग गोण्डा आये और घर आकर सारी बात बतायी। परिवार वालों ने भी पदभार ग्रहण करने के पक्ष में सहमति दी। शास्त्री कालेज में मेरा व्यवहार प्रायः सबको साथ लेकर चलने का हुआ करता था। सर्वसम्मति से यहाँ शिक्षक संघ का अध्यक्ष भी रहा। चार पाँच दिनों के बाद डिग्री कॉलेज भटवली बाजार के मैनेजर की चिट्ठी भी आ गई जिसमें यथाशीघ्र कार्यभार ग्रहण करने का निवेदन किया गया था। सतीश वर्मा ने अवैतनिक अवकाश का आवेदन कराया और 28 जून 1985 की शाम को मुझे कार्यमुक्त कर दिया गया।