जीतेशकान्त पाण्डेय- अवकाश प्राप्ति के बाद आपकी दिनचर्या क्या रही ?
डॉ0 सूर्यपाल सिंह- अवकाश प्राप्ति के बाद एक जुलाई 2000 को मैं अपने घर आ गया। घर गाँव में था। अब तक शहर में कोई आवास नहीं बनाया था। गाँव में रहते हुए सबसे पहले ‘कंचनमृग’ का जो कार्य बाकी था, उसको पूरा किया। यह मेरा पहला उपन्यास था जो 2000 में ही प्रकाशित हो गया। मेरी रुचि अध्ययन-अध्यापन और लेखन में थी। अब मेरे पास जो भी समय था उसमें लेखन का कार्य चलता रहा। पेंशन का बीस प्रतिशत मैंने बेच दिया था।
उससे दो लाख रुपये से कुछ अधिक की प्राप्ति हुई थी। अब घर वालों की इच्छा थी कि सिविल लाइन्स की ज़मीन पर कोई घर बना लिया जाए। यदि गाँव में पूरी बिजली मिलती तो शायद शहर में घर बनाने की इच्छा न होती। पर शहर और देहात में बिजली आपूर्ति में जो अन्तर होता है, उसने बाध्य किया कि शहर में एक मकान बना लिया जाए। इसीलिए 2001 में सिविल लाइन्स में एक छोटा सा मकान बनाने की तैयारी हुई। मई, जून, जुलाई तक मकान बनवाने में ही व्यस्त रहा। छत लगवाने के बाद दस पन्द्रह दिन का अवकाश मिला।
इस मकान को बनवाने में पारसनाथ वर्मा और अम्बिकेश्वर पाण्डेय ने पूरी मेहनत की। दौड़-धूप कर सामान जुटाना, हिसाब रखना यह सब इन्हीं लोगों के जिम्में था। मकान का ढाँचा खड़ा हो गया तो सफाई आदि का कार्य शुरू हुआ। प्लास्टर का कार्य समाप्त होते ही मेरे पास की बची-खुची पूँजी पूरी तरह से खत्म हो गई। फर्श का काम अभी बाकी था। इसी बीच भटवली बाजार कॉलेज में कुछ बकाया हमारे खाते में जमा हो गया था, वही मिल गया। उस धनराशि को निकालकर मैंने फर्श का काम पूरा कराया। लकड़ी के काम में वहाब जी ने बहुत सहयोग किया। मैंने उन्हें बताया कि मार्च तक कुछ पैसा मिलेगा तभी मैं भुगतान करूँगा।
वे हँसते हुए बोले कि मुझे तभी काम मिलता है जब मकान बनवाने वाले का पैसा प्रायः खर्च हो जाता है क्योंकि खिड़की-दरवाजा व रोशनदान यह सब बाद में लगता है।उन्होंने खिड़की-दरवाजा सब लगा दिया और मैंने मार्च में पैसा मिलते ही पूरा भुगतान कर दिया। अपने सभी शुभचिन्तकों के सहयोग से मैं सिविल लाइन्स में अपना छोटा सा मकान बना पाया। जब तक मकान बनता रहा मैं गाँव से ही आता जाता रहा। मकान बनाते समय लिखने-पढ़ने का काम प्रायः बाधित हो जाता। गाँव पर रहते हुए ही मैंने शिक्षाशास्त्र के दार्शनिक एवं सामाजिक पक्ष पर एक पुस्तक लिखना प्रारम्भ कर दिया था। पारसनाथ वर्मा जी घर पर ही आ जाते और मैं बोलकर कर उनको लिखाता। पुस्तक का अधिकांश गाँव पर रहते हुए ही बोल कर लिखाया।
गाँव से शहर लाते हुए उस पुस्तक के कुछ अध्याय कहीं गिर गए और वे मिल न सके। उन अध्यायों को पुनः लिखाना पड़ा। यह पुस्तक 2005 में पुस्तकाकार छपी। कविताएँ मैंने 1970 के आसपास लिखना शुरू कर दिया था। बीच बीच में कविताएँ लिखी जाती रहीं लेकिन उनका प्रकाशन नहीं हुआ। सन् 2004 में ‘पर अभी संभावना है’ नाम से कविताओं की पुस्तक छपी। इसमें छन्दोबद्व कविताएँ थी और मुक्त छन्द की भी। साहित्य में भी खेमेबन्दी चलती है। मैं किसी खेमे से जुड़ा नहीं था। इसलिए खेमेबद्ध लेखक मेरी रचनाओं पर चर्चा करते, इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती थी। मैं प्रायः सुबह से एक बजे तक का समय लेखन में लगाता और अपराह्न का समय प्रायः अनुसंधान करने वाले विद्यार्थियों को निर्देशित करने में बिताता।
विभिन्न विषयों के अनुसंधानकर्ता अपनी कठिनाई लेकर आते और मैं उसे हल करने की कोशिश करता। आवश्यकता पड़ी तो कुछ बोलकर लिखा भी देता था। किसी की थीसिस लिखने का काम मैंने नहीं किया। मैं केवल कठिनाई निवारण कर देता था। शोधार्थी को स्वयं अपना विवरण लिखना होता था। जिन लोगो ने मेरे निर्देशन में काम किया उन सबको शोघ प्रबन्ध स्वयं लिखना पड़ा। इन कार्यो के लिए किसी तरह का शुल्क लेना अनुचित समझता था। किसी ने कुछ देना भी चाहा तो मैंने विनम्रता से मना कर दिया। इस बीच ‘शाकुनपांखी’ पर काम शुरू किया गया।
लाल बहादुर शास्त्री कॉलेज में शिक्षण के दौरान मैंने कई नाटकों का मंचन कराया था। इसीलिए अवकाश ग्रहण करने के बाद जब मैं गाँव आ गया तो नाटक में रुचि रखने वाले कुछ बच्चों- रीतेश आदि ने मुझसे सम्पर्क किया। वे चाहते थे कि गोण्डा में नाटकों का मंचन पुनः प्रारम्भ किया जाए। मेरी रुचि थी ही इसलिए नाटक में रुचि रखने वाले कुछ बच्चे मुझसे जुड़ने लगे। मेरे अब तक चार नाटक प्रकाशित हो चुके थे। इसलिए मैंने संविकास के माध्यम से प्रतिवर्ष कुछ नाटकों के मंचन का कार्यक्रम बनाया। नाट्य-पर्व में रीतेश, भैरव मिश्र, देवव्रत, सुनील सोनी, आदि मंचन में भाग लेने लगे।
मंचन के लिए ही ‘तनुदा का अपहरण’ के सभी नाटक लिखे गए। कुछ तीन अंकों के, कुछ एकांकी भी। लगभग पांच वर्षो (2002-2006) तक संविकास के माध्यम से नाटकों का मंचन किया जाता रहा। इसमें बच्चों का पूरा समूह काम करने लगा था। नाटक करने वाले बच्चों की सबसे बड़ी समस्या जीविका की होती है। हर बच्चे को जीविकोपार्जन के लिए कुछ-न-कुछ करना पड़ता है। जो बच्चे कहीं सेवारत रहते हैं उनके लिए काम करना आसान होता है क्योंकि उनके सामने आर्थिक संकट नहीं होता है।
यह अच्छा हुआ कि कुछ बच्चों ने अपनी संस्थाएं पंजीकृत करायीं। उन संस्थाओं को विभिन्न विभागों से कुछ काम मिलने लगा। विभागीय प्रचार में भी ये संस्थाएँ काम करने लगीं जिससे थोड़ी बहुत आमदनी हो जाती। पर इतने से ही बच्चों का काम नहीं हो सकता था। उन्हें कुछ न कुछ काम करना ही था। आज भी नाटक में रुचि रखने वाले युवाओं के समक्ष जीविका का संकट रहता है।
वर्ष 2007 में मैंने ‘पूर्वापर’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। अब मेरे लिए नाटक के मंचन में अधिक समय दे पाना सम्भव नहीं हो पा रहा था। लेकिन नाटक से जुड़े बच्चों ने अपने स्तर से नाटकों का मंचन जारी रखा। अब मेरा अधिकांश समय लिखने-पढ़ने और पत्रिका के लिए सामग्री संकलन में बीत जाता था। पत्रिका त्रैमासिक थी पर उसके लिए निरन्तर कुछ न कुछ काम करना ही पड़ता था। वर्ष में एक बार ‘पूर्वापर’ पर एक समारोह किया जाता जिसमें प्रकाशित पुस्तकों का विमोचन तथा कुछ साहित्यकारों का सम्मान भी किया जाता।
गोण्डा, बहराइच और फैजाबाद आदि के साहित्यकार इस वार्षिक कार्यक्रम में भाग लेते। इसमें किसी विषय पर व्याख्यान होता और भोज में भौरी-भर्ता उपलब्ध कराया जाता जिसे लोग पसन्द करते थे। ‘पूर्वापर’ के माध्यम से अनेक साहित्यकार जुड़ सके। प्रारम्भ से ही मुखपृष्ठ पर जिसका चित्र छपता था उसके बारे में पत्रिका में कुछ सामग्री अवश्य होती थी। रामदरश मिश्र, रमेश उपाध्याय, बनास जन के सम्पादक पल्लव, अलीगढ़ से वेदप्रकाश, अमिताभ, गोरखपुर से वेद प्रकाश पाण्डेय, लखनऊ से राम कठिन सिंह, देवनाथ द्विवेदी, चन्द्रेश्वर, मिर्जापुर से अरविन्द अवस्थी, गणेश गंभीर, भोलानाथ कुशवाहा, फैजाबाद से राम शंकर त्रिपाठी, विजय रंजन, विन्ध्यमणि, स्वप्निल श्रीवास्तव, बलरामपुर से शिवनारायण शुक्ल, अनिल गौड़, कंजेभरिया से लक्ष्मी नारायण अवस्थी, बहराइच से शत्रुघ्नलाल तथा केरल के सैकड़ों साहित्यकार सम्पर्क में आए। स्थानीय साहित्यकारों को भी पत्रिका के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाता रहा। अब तक सैकड़ों साहित्यकारों को ‘पूर्वापर’ से सम्मानित किया जा चुका है।
पूर्वापर प्रकाशन से ही मेरी पुस्तकें छपती रहीं। इसके अतिरिक्त दर्जनों अन्य साहित्यकारों की पुस्तकें भी छपीं। इसमें जगदेव सिंह की ‘थेरी गाथाएं’, कृष्ण नन्दन तिवारी की कविता पुस्तक ‘तरल हो गया मन’ और यात्रा वृतांत, सत्यव्रत सिंह की ‘मुट्ठी भर जल’, ‘चिंगारी बुझी नहीं’, ‘सहस्त्रदल’, भगवती प्रसाद तिवारी का उपन्यास ‘आलोक’, अरविन्द अवस्थी की कविता पुस्तक ‘मेरे गाँव की धूप’, अवध नरेश तिवारी की दो कविता पुस्तकें- ‘देह का मौसम’, ‘अनुभवों के व्रण’, हीरा सिंह ‘मधुर’ का ‘शान्ति सरोवर’ एवं के.डी. सिंह ‘अश्क’ की पुस्तक ‘रोशनी के लिए’, नारायण जी शुक्ल की पुस्तक ‘काल के वक्ष पर’ प्रकाशित हुई।
इसके अतिरिक्त कई अन्य साहित्यकारों की पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं। इससे गोण्डा का साहित्यिक परिवेश विकसित करने में सहायता मिली। ‘पूर्वापर’ में कभी कभी कुछ ज्वलंत प्रश्नों पर भी रचनाएं प्रकाशित की गयी। अब तक इसके 62 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। पूर्वापर का 53, 54 व 55 का संयुक्तांक ‘मलयालम विशेषांक’ के रूप में प्रकाशित हुआ। इस विशेषांक के माध्यम से मलयालम साहित्य के सम्बन्ध में हिन्दी भाषियों को सामग्री उपलब्ध कराई गई। केरल में हिन्दी का काफी प्रचार-प्रसार हुआ है। हिन्दी सीखने को केरल वासियों ने एक अवसर के रूप में देखा। वहाँ के सभी विद्यालयों, विश्वविद्यालय एवं कॉलेजों में हिन्दी पढ़ाई जाती है। हिन्दी पढ़कर बहुत से केरलवासी हिन्दी के अध्यापक बने।
उनमें बहुत से शिक्षक अवकाश प्राप्त कर चुके हैं और उनकी दूसरी पीढ़ी हिन्दी-अध्यापन कर रही है। हिन्दी का ज्ञान अर्जित कर केरलवासियों ने इसे जीविका का माध्यम बनाया। ‘पूर्वापर’ पत्रिका केरल भेजी जाती रही। कोविड काल में आर. सुरेन्द्रन को जब पत्रिका नहीं मिल पायी तो उन्होंने पत्र लिखा- पत्रिका निकल रही है या नहीं। मैंने पत्रिका के कई अंक उनको एक साथ भेजा और निवेदन किया कि ‘पूर्वापर’ का मलयालम विशेषांक निकालना चाहता हूँ। वे कालीकट विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राघ्यापक थे। अब अवकाश प्राप्त कर चुके हैं। यद्यपि उनके कैंसर का आपरेशन हो चुका है और डॉक्टर की देखरेख में उनकी दवाएँ चल रही हैं किन्तु उन्होंने अतिथि सम्पादक बनना स्वीकार कर लिया। वे भाषा-समन्वयवेदी संस्था के संस्थापक अध्यक्ष भी हैं।
उन्होंने विभिन्न साहित्यकारों की रचनाएँ मँगाकर भेजीं। इस महनीय कार्य में तिरुवनन्तपुरम् के डॉ0 अजय कुमार का भी योगदान भुलाया नहीं जा सकता। फलतः लगभग दो सौ पृष्ठों का मलयालम विशेषांक छपा ही, उसे पुस्तकाकार भी प्रकाशित किया गया। मलयालम विशेषांक निकाल कर ‘पूर्वापर’ परिवार को भी विशेष प्रसन्नता हुई। ‘पूर्वापर’ के हर अंक की लगभग 80 प्रतियाँ केरल जाती हैं। पूर्वापर का 62वां अंक भी कन्नड़ की साध्वी अक्क महादेवी पर केन्द्रित है। इसके पहले भी तमिल भाषी एम. शेषन को केन्द्र में रखकर एक अंक निकाला गया था। इस अंक में तमिल साहित्य पर पर्याप्त सामग्री प्रकाशित की गई थी। उद्देश्य यह था कि दक्षिण में लिखे साहित्य के बारें में हिन्दीभाषियों को जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
तमिलनाडु में हिन्दी को लेकर थोड़ा विरोध दिखाई पड़ता है। पर ज्यों ज्यों उत्तर-दक्षिण का सम्पर्क बढ़ता जा रहा है तमिलनाडु के आमजन हिन्दी सीखने में रुचि ले रहे हैं। भारत की एकता और समृद्वि के लिए यह प्रवृति उपयोगी है। भारत विभिन्न भाषाओं का देश है। हर बड़े देश में कई भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं। भारत में भी उत्तर-दक्षिण को लेकर अलग अलग विचार प्रकट किए जाते रहे हैं। दक्षिण की भाषाओं को उत्तर की भाषाओं से अलग बताया जाता रहा है। पर नये अध्ययनों से यह पुष्ट होता जा रहा है कि दोनों का उत्स एक है। उत्तर-दक्षिण का भाषाई संवाद निरन्तर बढ़ रहा है। उसमें अनुवाद की मुख्य भूमिका रही है।
नई तकनीक के आ जाने से अब मशीनी अनुवाद संभव हो सका है। कहा जाता है कि एक साथ साठ भाषाओं में अनुवाद की प्रक्रिया चल सकती है। माइक्रोसाफ्ट जैसी कम्पनियाँ इस दिशा में अच्छा काम कर रही हैं। वे निरन्तर प्रयास कर रही हैं कि अनुवाद के माध्यम से साहित्य एवं अन्य जानकारियाँ अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचायी जा सकें। इससे हम विश्व साहित्य के बारे में सुगमता से अधिक जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।