1.) डर लग रहा है।
“ आज मुझे डर लग रहा है…!
कहीं वक्त से पहले ये वक्त ना बदल जाए।
जिंदगी के रास्ते में कई मोड़ है।
डर है, कहीं जिंदगी किसी गलत मोड़ पर ना मूड जाये।
कुछ मर्जीयां खुशियों की भी तो होती होंगी।
डर है, कहीं मुझ तक आते आते खुशियों की मर्जी ना बदल जाये।
आज मुझे डर लग रहा है…!
कहीं बक्त से पहले ये बक्त ना बदल जाये।
कर रही हूँ मे जो कोशिशे बो अब तक तो ईमानदार है।
डर है, कहीं कल को मेरा ईमान ना बदल जाये।
बड़ी दौड़ धूप है,बड़ी है कठिन रहेँ मै जिन पर चल रही हूं,
बो कांटे नहीं टूटे कांच के टुकड़े हैं।
डर है, कहीं चलते चलते मेरे पैर ना छील जाये।
आज मुझे डर लग रहा है…।
कहीं बक्त से पहले ये बक्त ना बदल जाये।
एक कश्मकश है मन मैं,
जो अब तक मैंने किया बो सही था क्या?
जो अब हो रहा है बो सही है क्या?
और जो मैं आगे करने जा रही हूँ,
बो सही होगा क्या?
डर है, कहीं इतनी सारी उलझनों मे मेरा मन ना उलझ जाये।
अपनी मंजिल को पाने की चाह मे जब मे घर से निकली,
मेने सबका दिल तोड़ा सबको नाराज किया था।
डर है, कहीं मैं उनका दिल फिर जीत ना पाई तो,
बो नाराजगी कहीं नफरत मैं ना बदल जाये।
मंजिल की चाह में कहीं घर ना छूट जाए।
आज मुझे डर लग रहा है…।
कहीं वक्त से पहले ये बक्त ना बदल जाए।
मुझे उम्मीद है कुछ पाने की,
हौसला भी है कुछ कर गुजरने का,
पर हिम्मत नहीं है कुछ भी खोने की,
डर है,कहीं कुछ पाने के खातिर मुझे कुछ खोना ना पढ़ जाये।
एक आस दिल मे फिर भी जलाकर रखी है।
बो दिन भी कभी आएगा जिसकी उम्मीद लगाकर रखी है।
फिर भी, आज मुझे डर लग रहा है…।
कहीं बक्त से पहले ये बक्त ना बदल जाये।”
2.) दिल की जिद।
“ ऐ दिल तू जिद ना कर…।
मेरी जिंदगी मे लोग जिद्दी और भी हैं।
ना खुश हो एक गिरह सुलझाकर,
रिश्तों के इस माँझे मे उलझी पतंगे और भी हैं।
एक अरसे बाद उठा है तू आंखे खोलकर,
तुझे खबर कहाँ मेरी आँखों मे,
अब भी सोये अरमा और भी हैं।
तू कर रहा है गुस्ताखी कर,
मुझे पता है तेरी गुस्ताखीयों मे शामिल,
अलबत्ता संजीदगीयां और भी है।
मेरी गुजारिश है तुझसे तू,
जो कर रहा है, बो ना कर,
मेरे पास बक्त नहीं है।
तेरी जिद, गुस्ताखी और,
संजीदगी को समझने के लिए।
क्यूंकि इससे ज्यादा जरुरी,
करने को मेरे पास काम और भी हैं।”
3.) यारियों के काफिले।
जिंदगी के सफर मे बो यारियों के क़ाफ़िले,
जाने कहाँ खो गए!
भोर की नींद भरी आँखों से लेकर,
रात की आखरी उबासी तक साथ रहने वाले!
बो यार जाने कहाँ गुम हो गए!
राह मे बेफिक्री से चलते चलते सरारत करने वाले!
पकड़े जाने पर झूंठी कसमें भरकर बच निकलने वाले!
बो यार जाने कहाँ गुम हो गए!
जिंदगी के सफर मे वो यारियों के क़ाफ़िले,
जाने कहाँ खो गए!
अपने साथ साथ मेरे हिस्से की भी चॉकलेट,
मुझसे छीन के खाने बाले!
मेरे रूठने पर मुझे डबल चॉकलेट लाकर मनाने बाले!
वो यार जाने कहाँ गुम हो गए!
मैं जो किसी बात से चीड़ जाऊं तो मुझे और चिढ़ाने वाले!
बाते कह कर मुँह पर मुकर जाने वाले!
वो यार जाने कहाँ गुम हो गए!
जिंदगी के सफर मे बो यारियों के क़ाफ़िले,
जाने कहाँ खो गए!
छोटे छोटे झगड़ो मे मुझसे कभी बात ना करने की,
कसमे खाने वाले!
और सुबह लड़कर शाम तक भी मुझसे दूर ना रह पाने वाले!
वो यार जाने कहाँ गुम हो गए!
मेरी हर गलती मे मेरा साथ देने वाले!
गलती पकड़े जाने पर मेरी सजा खुद पर लेने वाले!
बो यार जाने कहाँ गुम हो गए!
जिंदगी के सफर मे वो यारियों के क़ाफ़िले,
जाने कहाँ खो गए!
यूँ तो मेरे मुँह पर हँसने वाले,
दूसरों से मेरी बुराई करने वाले!
लेकिन मुझपे जो कोई मुसीबत आये तो,
ढाल बनकर मेरे लिए सबसे लड़ने वाले!
वो यार जाने कहाँ गुम हो गए!
बो यारियों के मेले,बो कुल्फी और चाट के ठेले!
बो मीठी जलेबी और तीखी कचौड़ी उसपे यारों की,
झूंठी शहीनसाही ठाट!
लम्बी लम्बी बाते और बढ़े बढ़े झूंठ बोलने वाले!
वो यार जाने कहाँ गुम हो गए!
जिंदगी के सफर मे वो यारियों के क़ाफ़िले,
जाने कहाँ खो गए!
उन सुहाने दिनों को रोज याद करना,
आज कल जिंदगी जीने का बस यही तो है बहाना!
ये सब कह कर बो आज भी कभी कभी याद करने वाले!
बो यार पुराने कितने बदल गए!
हम इस जिंदगी के सफर मे कितने आगे आ गए!
जिंदगी के किसी भी मोड़ पर ना विछड़ने का
वादा करने बाले!
बो यार जाने कहाँ गुम हो गए!
जिंदगी के सफर मे वो यारियों के क़ाफ़िले,
जाने कहाँ खो गए!”
4.)चल एक सफर।
“ चल एक सफर मेरे साथ,
शायद तुझे भी मेरी गर्दिशोँ की खबर हो जाये।
ये मेरी ना जिद है,ना जरुरत की तू मेरा साथी हो जाये।
बस एक अनकही चाह रखी है दिल मे की,
सायद गर तू मुझे समझ ले तो तू खुद मजबूर,
होने को मेरा हमसफर हो जाये।
चल एक सफर मेरे साथ सायद तुझे भी,
मेरी मजबूरियों का अहसास हो जाये।
जैसे तूफ़ाँ मे टूटी कश्ती का सहारा भी काफ़ी होता है।
दिल मे उम्मीद बनाये रखने के लिए,
बेसे ही तय करने को सफर चाहे कितना भी हो लम्बा।
बक्त के जल्दी निकलने के लिए,
एक साथी होता है जरुरी साथ चलने के लिए।
चल एक सफर मेरे साथ,
शायद तुझे भी वक्त की कदर हो जाए।
तकदीर में लिखा क्या है? ये किसको पता है।
ना अंदाजे ना तकाजे से लकीरें हाथ की बदलेगी।
जिस दिन तुम चल पढ़ोगे हाथ थाम कर यकीन मानना,
लकीरें भी बदलेंगीँ तकदीरेँ भी बदल जाएंगीँ।
चल एक सफर मेरे साथ,
शायद तुझे भी मेरी अच्छाइयों का अंदाजा हो जाए।
सच और दिखाबे मे आईने की दो सुरतों जितना ही फर्क है।
जो तुम्हे दिख रहा है,
बो आँखों पे पड़ा गलतफहमीयों का पर्दा है।
और छुपी हुई है हकीकत जिस परदे के पीछे,
बस दो कदम चलो और पर्दा हटा कर देख लो।
मेरी सच्चाई भी तेरे दीदार को बेक़रार खड़ी है।”
5.) तू पछताता रहा।
“ तू पछताता रहा जिन अधूरे ख़्वाबों के लिए।
विछड़ते नातों के लिए, टूटते वादो के लिए,
नाकाम इरादों के लिए.
वो,चार लोग चंद आंसु वहा कर तुझे खाख कर गये।
जिन चार लोगो के लिए तूने कभी,
जिंदगी को जिंदगी सा ना जिया।
अब जिंदगी सुलग कर राख हो गई,
अधुरी हर ख्वाहिश खाख हो गई।
जिन सांसों की डोरी से दुनिया का नाता जुड़ा था।
मिट्टी में मिलते ही वो दुनिया पराई जात हो गई।
तु अब भी बैठा है जिंदगी के अफसोस मैं,
जैसे मौत से ही जिंदगी मांग ली हो ये तो बही बात हो गई।”
6.) ऐ मेरे बेताब दिल।
“ऐ मेरे वेताब दिल जरा खुद को थाम ले!
अपनी मशरूफियों से निकल थोड़ा तो खुद को आराम दे।
क्यों कर रहा है इतनी जद्दोजहद किसी न कदरे के वास्ते।!
उस वे मुरब्बत वे हया का यूँ न बार बार नाम ले।
मसगुल वो अपनी ही कहानीयों में बहुत हैँ।
मसरूफ वो अपनी ही मेजवानीयों में बहुत है।
उसे कद्र कहाँ रही खुद के सिवा किसी और की।
उसे अपनी कदरदानियों पे खुद गुमान बहुत है!
कुछ कद्र तू भी अपनी कर ले,
तेरी भी अहमीयत है इतना तो समझ लें।
कर खुद से मोहब्बत पहले फिर चाहे किसी को दिल दे।
कुछ कद्र तू भी तो अपनी कर ले,
ऐ दिल अपना अहमीयत तु समझले।
कर खुद से मोहोब्बत पहले,फिर चाहे किसी की दिल दे।”
7.) जाने क्यों?
“ गर्विदा सी हवाएं चलने लगी है फिजाओं में,
जाने क्यों? क्या पता?
ये जो घुल रहा संगीत है हवाओं में,
जाने क्यों? क्या पता?
ये झंकार की है गुंज कैसी कोई दे रहा है दस्तक यहां,
कौन है बो? क्या पता?
पग पग बढ़ते मेरी ओर यह कदम किसके हैं?
कौन है बो? क्या पता?
किसकी झांझर की झनक है ये जो,
इस रात की खामोशी की जंजीर तोड़ रही है।
वो आहिस्ते से आ रही है मेरी ओर,
जाने क्यों? क्या पता?
बेकरार होने लगी है धड़कनेँ ,
जाने क्यों? क्या पता?
क्यों चांदनी टूट कर चांद से फर्श पर आ बिखरी है,
जाने क्यों? क्या पता?
ये हवा,ये फिजा,और ये रोशन आसमान हो गया है गवाह,
मिलने मुझे आई है कोई अप्सरा।
हो गए हैं गवाह यह तारे सभी,
स्वर्ग से उतर के एक परी मेरे रूबरू आ गई।
रात की स्याह में वो सुबह की धूप सी छा गई।
अब पता चला चांद क्यों है खफा,
क्यों गा रही है हवा,क्या महक इन फिजाओं में घुल रही है।
शबनम को पिघलाने सम्मा वो सँग लाई है।
अंधेरी रात को सुबह में बदलने आई है।
देखो मुझसे मिलने मेरी दिलरुबा आई है।
अब जानू मैं मुझे है पता,
गर्विदा सी हवाएं क्यों चल रही है फिजाओं में।
हां जानू मैं मुझे है पता।”
8.) जख्मो के दाग।
“ जख्मों के दाग धूलते नहीं पानी से,
तू तेजाब डाल शायद दिल की जलन मिट जाएगी।
मिट्टी में जो आग लग रही है,
जाने क्या-क्या जलाएगी।
मिटाने के बाद सारी कायनात के,
मिलने की कोई घड़ी आएगी।
कयामत की होगी वो काली रात,
तू मुझसे मिलने जब आएगी।
मेरे खाली हाथ लिए झूंठी आस,
तूफाँ को संभाले बैठे हैं।
जाने कितनी बार होंगे जार जार,
तब हाथों में लकीरें तेरे नाम की आएंगीँ।
मैं बुझता दीप लो का फकीर,
अंधेरे में डूबता जाता हूं।
तू पूनम की रात मेरी आखिरी आस,
क्या सब लूटने के बाद तू आएगी।”