एक ईच्छा
लेखक: विजय शर्मा एरी
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प्रस्तावना
जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा इच्छाओं पर नियंत्रण है। मनुष्य का मन चंचल है—कभी धन की ओर दौड़ता है, कभी सुख की ओर, कभी शक्ति की ओर। लेकिन जो व्यक्ति अपने मन को साध लेता है, वही सच्चा विजेता होता है। यह कहानी है अर्जुन की, जिसने संयम को अपना मार्गदर्शक बनाया और समाज को नई दिशा दी।
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भाग 1: गाँव का वातावरण
पंजाब के एक छोटे से गाँव में अर्जुन का जन्म हुआ। गाँव हरियाली से भरा था, सरसों के खेतों में पीले फूल लहराते थे। सुबह-सुबह जब सूरज की किरणें खेतों पर पड़तीं, तो पूरा गाँव सुनहरी आभा में नहा जाता।
अर्जुन का परिवार साधारण था। पिता किसान, माँ गृहिणी। घर में सादगी थी, लेकिन संस्कार गहरे थे। अर्जुन बचपन से ही तेज़-तर्रार था। उसे किताबों से प्रेम था, परंतु उसका मन अक्सर भटक जाता।
गाँव के बुज़ुर्ग उसे कहते—
"बेटा, जीवन में सबसे बड़ा धन संयम है। जो अपने मन को जीत लेता है, वही संसार को जीत सकता है।"
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भाग 2: किशोरावस्था की चुनौतियाँ
जैसे-जैसे अर्जुन बड़ा हुआ, उसकी इच्छाएँ भी बढ़ीं। गाँव के अन्य लड़के शहर जाकर नौकरी करने लगे। अर्जुन भी सोचने लगा कि उसे जल्दी पैसा कमाना चाहिए।
एक बार उसके मित्र ने कहा—
"अर्जुन, क्यों इतना पढ़ाई में डूबा रहता है? चलो, थोड़ा मज़ा करते हैं। जिंदगी का क्या भरोसा!"
अर्जुन का मन डगमगाया। लेकिन तभी उसे गुरुजी की बात याद आई—"संयम ही सबसे बड़ा धन है।" उसने पार्टी में जाने से इंकार कर दिया। मित्रों ने उसका मज़ाक उड़ाया, पर अर्जुन ने संयम रखा।
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भाग 3: शहर की चमक-दमक
अर्जुन ने शहर जाकर कॉलेज में दाखिला लिया। वहाँ की दुनिया अलग थी—चमकदार रोशनी, बड़े-बड़े मॉल, और आधुनिक जीवन की लहरें।
कई बार उसे लगता कि वह भी इस दौड़ में शामिल हो जाए। लेकिन हर बार वह खुद को रोकता। वह सोचता—"यदि मैं संयम खो दूँ, तो मेरी मेहनत व्यर्थ हो जाएगी।"
धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाई। कॉलेज में उसे छात्रवृत्ति मिली। वह पढ़ाई में अव्वल आया।
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भाग 4: परीक्षा की घड़ी
कॉलेज के अंतिम वर्ष में अर्जुन को एक बड़ी कंपनी से नौकरी का प्रस्ताव मिला। लेकिन शर्त थी कि उसे कुछ गलत आँकड़े पेश करने होंगे।
अर्जुन के सामने दो रास्ते थे—
1. नौकरी स्वीकार कर आर्थिक लाभ लेना।
2. सत्य और संयम का मार्ग चुनकर अवसर खो देना।
उसने गहरी साँस ली और मन को शांत किया। उसे याद आया कि जीवन का असली मूल्य धन नहीं, बल्कि ईमानदारी और संयम है। उसने नौकरी ठुकरा दी।
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भाग 5: गाँव की ओर वापसी
नौकरी छोड़ने के बाद अर्जुन गाँव लौट आया। लोग हैरान थे—"इतना बड़ा अवसर छोड़कर वापस क्यों आया?"
अर्जुन ने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। उसने उन्हें संयम का महत्व समझाया। वह कहता—
"बच्चों, यदि तुम अपने मन को साध लोगे तो कोई भी लक्ष्य कठिन नहीं रहेगा।"
धीरे-धीरे उसका प्रयास रंग लाने लगा। गाँव के बच्चे पढ़ाई में आगे बढ़ने लगे। लोग उसे सम्मान देने लगे।
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भाग 6: समाज में परिवर्तन
अर्जुन ने शिक्षा के साथ-साथ गाँव में सामाजिक सुधार भी शुरू किए। उसने शराबबंदी का अभियान चलाया। उसने युवाओं को समझाया कि नशा जीवन को बर्बाद करता है।
कई लोग पहले उसका विरोध करते रहे। लेकिन जब उन्होंने देखा कि अर्जुन संयमित जीवन जीकर कितना संतोष पा रहा है, तो वे भी प्रभावित हुए।
गाँव में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। लोग मेहनत करने लगे, बच्चे पढ़ाई में आगे बढ़ने लगे।
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भाग 7: अर्जुन का आदर्श
वर्षों बाद अर्जुन एक प्रसिद्ध शिक्षक और समाजसेवी बन गया। लोग उसे आदर्श मानते थे।
उसने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि—
"संयम ही सच्चा बल है। धन, शक्ति और प्रसिद्धि क्षणिक हैं, पर संयम जीवन को स्थायी ऊँचाई देता है।"
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उपसंहार
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, यदि हम संयम बनाए रखें तो हम हर चुनौती को पार कर सकते हैं। अर्जुन की तरह हमें भी अपने मन को साधना होगा।
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