माँ की आखिरी चिट्ठी: एक अमर बलिदान
गाँव की वह पुरानी हवेलीनुमा घर, जिसकी दीवारों से चूना झड़ रहा था, आज अजीब सी खामोशी ओढ़े हुए थी। बाहर सावन की झड़ी लगी थी। बादलों की गर्जना और खिड़की के कांच पर टकराती बारिश की बूंदें ऐसी लग रही थीं, मानो प्रकृति भी किसी गहरे शोक में डूबी हो। रमेश अपनी धुंधली आँखों से बाहर देख रहा था, पर उसे कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था। उसके हाथ में एक पीला पड़ चुका लिफाफा था—माँ की आखिरी चिट्ठी।
आज माँ को गए तीन साल बीत चुके थे, लेकिन रमेश के लिए समय जैसे उसी दिन ठहर गया था। वह कुर्सी पर बैठा कांपते हाथों से उस कागज को छू रहा था, जिसे माँ ने अपनी आखिरी सांसों के करीब रहते हुए लिखा था।
अतीत की धुंधली गलियां
दस साल पहले का वो मंजर रमेश की आँखों के सामने तैरने लगा। उस वक्त वह अपनी जवानी की दहलीज पर था, आँखों में बड़े-बड़े सपने थे। अचानक एक दिन उसे चक्कर आया और वह गिर पड़ा। अस्पताल की सफेद दीवारों और फिनाइल की गंध के बीच डॉक्टरों ने जो खबर सुनाई, उसने रमेश के पैरों तले जमीन खिसका दी।
"दोनों किडनियाँ जवाब दे चुकी हैं। ट्रांसप्लांट ही एकमात्र रास्ता है।"
रमेश टूट गया था। पिता बचपन में ही गुजर चुके थे। घर में केवल वह और माँ थी। गरीबी का साया इतना गहरा था कि दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से जुटती थी, ऐसे में लाखों का ऑपरेशन एक डरावने सपने जैसा था। रमेश ने हार मान ली थी। उसने माँ का हाथ पकड़कर कहा था, "माँ, अब मेरा वक्त आ गया है। तू रोना मत।"
लेकिन माँ... माँ तो माँ होती है। वह रोई नहीं। उसकी आँखों में एक अजीब सा संकल्प था। उसने चुपचाप अपने टेस्ट करवाए। जब डॉक्टरों ने कहा कि माँ की किडनी मैच कर गई है, तो रमेश ने विरोध किया। "नहीं माँ! तू बूढ़ी है, तेरा शरीर यह नहीं झेल पाएगा।"
माँ ने केवल मुस्कुराकर उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा, "पगले, माँ का शरीर तो बना ही संतान के काम आने के लिए है। तू ठीक हो जा, मैं तो लोहे की बनी हूँ, मुझे कुछ नहीं होगा।"
ऑपरेशन और मौन विदाई
ऑपरेशन सफल रहा। रमेश को नया जीवन मिला। लेकिन ऑपरेशन के बाद माँ कभी पहले जैसी नहीं हो पाई। उनकी चाल धीमी पड़ गई थी, चेहरा पीला रहने लगा था। पर जब भी रमेश उनसे पूछता, वे यही कहतीं, "बस उम्र का तकाज़ा है बेटा, तू अपनी पढ़ाई और नौकरी पर ध्यान दे।"
रमेश को शहर में एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। वह अपनी नई दुनिया में व्यस्त हो गया। वह माँ को शहर ले जाना चाहता था, पर माँ ने मना कर दिया। "बेटा, मेरा मन तो इसी मिट्टी में लगता है। तू जा, अपना नाम रोशन कर।"
रमेश हर महीने पैसे भेजता, फोन पर बात करता। माँ फोन पर हमेशा हंसती रहती। वह कहती, "मैं यहाँ मजे में हूँ, पड़ोस की काकी है न, उसके साथ गप्पें मारती हूँ। तू बस अपना ख्याल रखना, टाइम पर खाना खाना।"
वो आखिरी शाम और खुला राज
तीन साल पहले, जब रमेश को खबर मिली कि माँ अब नहीं रही, तो वह पागलों की तरह गाँव भागा। जब वह पहुँचा, माँ जा चुकी थी। बिस्तर के पास एक छोटी सी संदूकची रखी थी, जिसमें रमेश के बचपन के खिलौने, उसकी पहली मार्कशीट और यह चिट्ठी थी।
रमेश ने उस वक्त वह चिट्ठी नहीं पढ़ी थी। वह टूट चुका था। आज, उनकी तीसरी पुण्यतिथि पर, उसने खुद को इतना मजबूत किया कि माँ के उन आखिरी शब्दों को पढ़ सके।
उसने थरथराते हाथों से लिफाफा खोला। नीली स्याही से लिखे अक्षर कहीं-कहीं आंसुओं की बूंदों से धुंधले पड़ गए थे।
चिट्ठी के शब्द: माँ की रूह की पुकार
"मेरा प्यारा बेटा रमेश,
जीते रहो। खूब तरक्की करो। जब तू यह चिट्ठी पढ़ रहा होगा, तब मैं शायद उस पार जा चुकी होऊंगी जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता। बेटा, जब तू पैदा हुआ था, तो तेरी पहली किलकारी सुनकर मुझे लगा था कि ईश्वर ने मुझे दुनिया की सबसे बड़ी दौलत दे दी है। मैंने सोचा था कि मेरा बेटा बड़ा होकर डॉक्टर बनेगा, किसी की सेवा करेगा। पर किस्मत को कुछ और मंजूर था।
तेरी बीमारी ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था। जब डॉक्टर ने कहा कि तुझे किडनी चाहिए, तो मुझे एक पल के लिए भी डर नहीं लगा। मुझे खुशी हुई कि मेरे शरीर का एक हिस्सा तेरे काम आएगा। तुझे याद है? तू कहता था कि मेरा खून तेरे अंदर बहता है। अब तो मेरी रूह का एक हिस्सा भी तेरे पास है। तू कभी अकेला नहीं है, मैं तेरे अंदर धड़क रही हूँ।
बेटा, शहर की चकाचौंध में अपनी जड़ों को मत भूलना। मैंने सुना है शहर में लोग बहुत अकेले होते हैं। तू अपनी शादी कर लेना, कोई ऐसी लड़की ढूँढना जो तेरे घर को घर बनाए। मैंने अपनी दवाइयों के लिए जो पैसे तू भेजता था, उन्हें खर्च नहीं किया। मैंने उन्हें जोड़कर तेरे नाम की एक एफडी (FD) कर दी है। मुझे पता है शहर में घर खरीदना महंगा है, ये पैसे तेरे काम आएंगे।
लोग कहेंगे कि मैंने दवाई नहीं ली इसलिए मैं मर गई। पर सच तो ये है बेटा, कि माँ को दवाइयों की नहीं, सिर्फ तेरी खुशी की ज़रूरत थी। अगर मैं वो पैसे दवाइयों पर फूंक देती, तो तेरे भविष्य के लिए कुछ न बचता। माँ का आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है। गाँव का वो छोटा सा खेत मत बेचना, वहां हमारे पूर्वजों की यादें हैं।
जीना तो दूसरों के लिए जीना, अपने लिए तो जानवर भी जी लेते हैं। सबको प्यार देना।
तेरी माँ"
प्रायश्चित और नया संकल्प
चिट्ठी पढ़कर रमेश दहाड़ें मारकर रो पड़ा। उसे याद आया कि कैसे वह अक्सर काम का बहाना बनाकर माँ का फोन जल्दी काट देता था। उसे याद आया कि डॉक्टर ने उसे बताया था कि माँ ने ट्रांसप्लांट के बाद की ज़रूरी दवाइयां बंद कर दी थीं ताकि रमेश पर आर्थिक बोझ न पड़े। उन्होंने अपनी जान की कीमत पर रमेश के भविष्य की नींव रखी थी।
कमरे में सन्नाटा था, पर रमेश के कान में माँ की आवाज़ गूँज रही थी। बाहर बारिश थम चुकी थी। बादलों के बीच से सूरज की एक सुनहरी किरण खिड़की से अंदर आई और सीधे माँ की तस्वीर पर पड़ी। ऐसा लगा मानो माँ मुस्कुरा रही हो और कह रही हो, "रो मत बेटा, मैं यहीं हूँ।"
रमेश ने अपनी आँखें पोंछीं। उसने अपनी कमीज की आस्तीन से माँ की तस्वीर को साफ किया और उसे सीने से लगा लिया। उस पल रमेश ने एक बड़ा फैसला लिया।
उसने तय किया कि वह अब शहर की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में वापस नहीं जाएगा। वह गाँव के उसी खेत में, जिसे माँ ने बचाने को कहा था, एक 'माँ मेमोरियल स्कूल और डिस्पेंसरी' खोलेगा। वह नहीं चाहता था कि गाँव का कोई और 'रमेश' इलाज के अभाव में दम तोड़े, या किसी और माँ को अपने बेटे की जान बचाने के लिए अपनी दवाइयां छोड़नी पड़ें।
उपसंहार: त्याग की अमर सुगंध
महीनों की कड़ी मेहनत के बाद, गाँव में एक सुंदर सा सफेद स्कूल बनकर तैयार हुआ। प्रवेश द्वार पर एक बड़ी सी पत्थर की पट्टिका लगी थी, जिस पर लिखा था— "शिक्षा और स्वास्थ्य: एक माँ का उपहार।"
रमेश अब अकेला नहीं था। गाँव के सैकड़ों बच्चे उसे 'बड़े भैया' कहकर पुकारते थे। जब वह उन बच्चों को पढ़ते देखता, तो उसे लगता जैसे उसकी माँ की आत्मा तृप्त हो रही है।
आज भी, जब शाम को बारिश होती है, रमेश अपनी खिड़की के पास बैठता है। अब उसके हाथ नहीं कांपते, बल्कि उनके हाथों में किसी गरीब बच्चे की किताब होती है। माँ की वो आखिरी चिट्ठी अब एक फ्रेम में जड़कर उसके मेज पर रखी है—न केवल एक कागज़ के टुकड़े के रूप में, बल्कि एक दिशा-निर्देश के रूप में।
माँ चली गई थीं, लेकिन उनका त्याग गाँव की हवाओं में, बच्चों की मुस्कान में और रमेश की हर धड़कन में ज़िंदा था। उन्होंने सिखाया था कि प्रेम केवल पाने का नाम नहीं, बल्कि सर्वस्व न्योछावर कर देने का नाम है