भाग 1:
हवेली के आँगन में शाम उतर रही थी।
सूरज की आख़िरी किरणें संगमरमर की ज़मीन पर सुनहरी लकीरें खींच रही थीं। हवा में इत्र, चंदन और गुलाब की मिली-जुली खुशबू थी। कहीं दूर तबले की धीमी थाप सुनाई दे रही थी, जैसे हवेली खुद किसी पुराने राग में साँस ले रही हो।
इसी आँगन में आयरा घूम रही थी।
उसका घेरदार अनारकली हर घूम के साथ हवा में लहराता, जैसे कोई अधूरी ख़्वाहिश उड़ान भर रही हो। उसके खुले बाल, जिनमें हल्की-सी लहर थी, उसकी कमर तक आते थे। गालों पर शर्म की हल्की सुर्ख़ी और आँखों में वो चमक—जो सिर्फ़ तब आती है जब दिल किसी का नाम लेने से डरता भी है और चाहता भी है।
पीछे खड़ा था ज़ैन।
उसके हाथ आयरा की कमर के इर्द-गिर्द थे—ना ज़्यादा कसकर, ना ढीले। बस इतने पास कि आयरा को एहसास हो कि वह अकेली नहीं है।
ज़ैन की नज़र उसके चेहरे पर थी, लेकिन वो उसे देख नहीं रहा था…
वो उस एहसास को देख रहा था जो आयरा उसकी ज़िंदगी में बन चुकी थी।
“इतनी खुश क्यों हो?”
ज़ैन ने धीमी आवाज़ में पूछा।
आयरा मुस्कुराई, आँखें बंद किए-किए।
“क्योंकि अभी… इस पल में… कोई डर नहीं है।”
ज़ैन की मुस्कान हल्की-सी फीकी पड़ गई।
डर।
वो शब्द दोनों के बीच हमेशा खड़ा रहता था—एक अदृश्य दीवार की तरह।
तीन साल पहले…
आयरा इस हवेली में पहली बार आई थी, तो उसकी आँखों में डर साफ़ झलक रहा था।
वो एक साधारण-सी लड़की थी—छोटे शहर से आई हुई, सपनों से भरी, लेकिन हकीकत से अनजान।
और ज़ैन…
ज़ैन इस हवेली का वारिस था।
नाम, रुतबा, पैसा—सब कुछ था उसके पास।
बस एक चीज़ की कमी थी—सुकून।
उनकी पहली मुलाक़ात बारिश की रात हुई थी।
आयरा हाथ में फाइलें लिए दौड़ रही थी, और मोड़ पर अचानक ज़ैन से टकरा गई।
फाइलें ज़मीन पर बिखर गईं।
आयरा घबरा गई।
“मुझे माफ़ कीजिए…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
ज़ैन ने झुककर फाइलें उठाईं।
“इतनी बारिश में कहाँ भाग रही हो?”
आयरा ने नज़र उठाई—और वहीं अटक गई।
उसकी आँखों में पहली बार किसी ने उसे देखा था।
ना जज किया, ना अनदेखा।
“मैं… यहाँ नौकरी के लिए आई हूँ।”
ज़ैन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“तो शायद तुम यहीं की हो।”
वो एक मामूली-सा वाक्य था।
लेकिन आयरा के लिए वो पहली बार था जब किसी ने उसे अपनापन दिया।
वापस वर्तमान में…
आयरा घूमते-घूमते ज़ैन की बाहों में आकर रुक गई।
“अगर ये पल हमेशा के लिए रुक जाए तो?”
उसने फुसफुसाकर पूछा।
ज़ैन ने उसका माथा चूमा।
“तो दुनिया चलती रहेगी, और हम यहीं फँस जाएँगे।”
आयरा हँसी…
लेकिन उस हँसी में भी एक डर छिपा था।
क्योंकि वो जानती थी—
ज़ैन की दुनिया आसान नहीं है।
उसका परिवार, उसकी जिम्मेदारियाँ, उसकी विरासत—
और आयरा?
वो सिर्फ़ एक नाम थी, जिसे कभी भी मिटाया जा सकता था।
हवेली के अंदर…
ऊपर की मंज़िल पर, ज़ैन की माँ बेग़म सायरा खिड़की से सब देख रही थीं।
उनकी आँखों में गुस्सा नहीं था।
वहाँ फ़ैसला था।
“ये लड़की…”
उन्होंने धीमे से कहा,
“ज़ैन को कमज़ोर बना रही है।”
उनके लिए प्यार एक कमजोरी था।
और आयरा—एक खतरा।
रात
आयरा अपने कमरे में बैठी थी।
खिड़की से चाँद की रोशनी अंदर आ रही थी।
उसके फोन पर ज़ैन का मैसेज चमका:
“अगर पूरी दुनिया मेरे खिलाफ हो जाए…
तब भी इस दिल में सिर्फ़ तुम रहोगी।”
आयरा की आँखें भर आईं।
उसने जवाब टाइप किया:
“और अगर तुम्हें मुझे छोड़ना पड़ा?”
काफी देर तक कोई जवाब नहीं आया।
फिर सिर्फ़ एक लाइन:
“तो मैं खुद को छोड़ दूँगा… तुम्हें नहीं।”
आयरा ने फोन सीने से लगा लिया।
उसे नहीं पता था—
कि ये प्यार जितना खूबसूरत है,
उतना ही ख़तरनाक भी।
और ये कहानी सिर्फ़ शुरुआत है।