और बोल --नमस्ते आंटी कैसे हो आप?
मायादेवी के मुंह से शब्द नहीं निकले पर आंखों से आंसुओं की धारा बह गई।
उन्हें यूं देख कर देव आश्चर्य से बोला क्या हो गया आंटी सब ठीक तो है ना बताइए।
मेरा मन बहुत घबरा रहा है राधा तो ठीक है ना अपनी ससुराल में।
मायादवी को समझ नहीं आ रहा था कि वह देव से क्या कहे और कैसे कहें पर कहना तो था ही।
और फिर ...
माया देवी ने सारी कहानी सुना दी राधा की ।
उन्होंने जो कहा उसको सुनकर देव जैसे जड़ सा हो गया । उसके पैर मानो जमीन से चिपक गये हो।
कान सुन्न से हो गये हो।
उसने कभी कल्पना भी ना की थी कि कभी वह यह भी सुनेगा और वह भी राधा के लिए !!
कुछ समय के लिए वह यु ही खड़ा रहा जड़मति बना और फिर निढाल सा बैठ गया बेंच पर,
इतना सब कुछ हो गया राधा के साथ और उसने मुझे कुछ भी बताया नहीं क्यों?
उसके इस प्रश्न ने देव को झकझोर दिया था ।
क्या अब में राधा के लिए इतना पराया हो गया हूं कि उसने इतनी बड़ी बात मुझसे नहीं बताई ?
शाम घिर आई थी पर देव के लिए काली अमावस्या की रात से कम नहीं थी ।
वह निडाल सा बैच पर बैठा था उसके दिल और दिमाग ने जैसे काम करना बंद कर दिया हो।
माया देवी ने और भी बहुत-सी बातें बताई देव को पर देव को कुछ और सुनाई नहीं दिया।
फिर माया देवी ने कहा --देव अब मुझे घर जाना होगा राधा घर पर अकेली है।
देव ने अपने आप को संभाला और साहस जुटाते हुए बोला- मैं भी चलूंगा आंटी जी घर पर
पर माया देवी ने कहा कि -नहीं देव तुम मेरे साथ नहीं चल सकते ।
अगर तुम मेरे साथ चलें तो राधा को समझ आ जाएगा कि मैंने ही तुम्हें बुलाया है। जो की राधा कभी नहीं चाहती थी।
उसने तुम्हें बताने से शख्त मना किया था।
मैं नहीं जानती देव कि वो ऐसा क्यों कर रही है पर.. इतना तो जानती हूं कि कुछ तो हुआ है जिसने राधा को और भी तोड़ दिया है।
वह शारीरिक रूप से कम और मानसिक रूप से ज्यादा टुट गई है।
और उम्र के इस अंतिम पड़ाव पर अकेले रहना चाहती है बस।
'उम्र का अंतिम पड़ाव 'इस शब्द ने जैसे देव का दर्द बड़ा दिया हो।
फिर देव बोला -आटी में उससे मिले बिना कैसे जा सकता हु घर-वापस ?
मैंने कब कहा है देव की तुम राधा से मत मिलों माया देवी ने कहा।
बस मेरे साथ मत चलो।
जब मैं घर पहुंच जाऊंगी तुम उसके बाद आना और हो सके तो थोड़ा ज्यादा समय उसके साथ बिताना।
और एक बात देव तुम उसे मत बताना कि मैंने तुम्हें यहां बुलाया है । और माया देवी चली जाती है।
देव अब भी बेंच पर निढाल सा बैठा था।
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।
"कैंसर"...
ब्लड कैंसर...वो भी राधा को !!
नहीं ये नहीं हो सकता !
कैंसर शब्द ने देव को बुरी तरह हिला दिया था।
शारीरिक के साथ-साथ मानसिक पीड़ा भी ?
इतना कष्ट सह रही थी राधा और मुझे पता भी नहीं ?
क्या मैं सच में अपनी लाइफ में इतना बिजी था कि मुझे राधे के दर्द का अहसास ही नहीं हुआ ?
या बस मेरे दिल ने यह मान लिया था कि राधा अपनी ससुराल में खुश है।
और जाने कितने प्रश्न देव के दिलों दिमाग पर दस्तक दे रहे थे और उसे पता ही नहीं चला कि कब एक घंटा बीत गया ।
उसका मन दुखी हो गया और राधा से नाराज़ भी क्योंकि उसने इतनी बड़ी बात उसे नहीं बताई थी।
अब देव राधा से मिलने के लिए बेचैन हो गया और उसे अपने प्रश्नोंक उत्तर भी चाहिए थे राधा से।
देव ने अपने आप को सहज किया जैसा की माया देवी ने कहा था और चल दिया राधा से मिलने उसके घर की ओर ..