उस दिन मनमोहन और प्रार्थना किसी काम से गाँव के दूसरे छोर
गए हुए थे। घर पहली बार पूरी तरह खामोश था। केशव ने मौका देखा
केशव (थोड़ा झिझकते हुए) बोला -
सत्यभामा…आज बस हम दोनों…थोड़ी देर बात करें?
सत्यभामा (मुस्कुराकर) बोली -
क्यों नहीं…
छत पर धूप ढल चुकी थी। हवा हल्की ठंडी थी। दोनों पास-पास
बैठे। बातों का सिलसिला चालू हुआ।
केशव बोला -
तुम्हें पता है…मैंने कभी ज़िंदगी से कुछ नहीं माँगा था।
सत्यभामा बोली -
और अब?
केशव (धीरे से) बोला -
अब…सिर्फ़ तुम्हें चाहता हूं।
सत्यभामा कुछ नहीं बोली। बस नज़रें झुका लीं।
केशव बोला -
उस हवेली में…मैं पत्थर बन चुका था।
पर तुमने…मुझे फिर से इंसान बना दिया।
सत्यभामा की आँखें नम हो गईं।
सत्यभामा बोली -
और आपने…मुझे फिर से जिंदा होना सिखा दिया।
केशव धीरे-धीरे उसके और करीब खिसक आया। सत्यभामा की साँसें थोड़ी तेज़ हो गईं। उनकी उँगलियाँ आपस में उलझ गईं।
केशव (फुसफुसाकर) बोला -
अगर मैं तुम्हें छू लूँ…तो तुम।नाराज़ तो नहीं हो जाओगी?
सत्यभामा (धीरे से) बोली -
अगर आप छूएँगे…तो शायद मुस्कुरा दूँ।
वो पल केशव ने धीरे से उसका चेहरा अपने हाथों में लिया। दोनों की साँसें एक-दूसरे को।महसूस होने लगीं। उसके होंठ सत्यभामा के होंठों के क़रीब आए, बस…कुछ मिलीमीटर।
तभी…पीछे से एक जानी-पहचानी आवाज़—
वाह… वाह…क्या सीन चल रहा है!
दोनों एकदम से चौंके, केशव पीछे हटा। सत्यभामा शर्म से लाल हो गई। मनमोहन और प्रार्थना दरवाज़े पर खड़े थे।
मनमोहन (सीटी बजाते हुए) बोला -
लगता है हम गलत टाइम पर आ गए!
प्रार्थना (हँसते हुए) बोली -
या बहुत सही टाइम पर?
केशव (झेंपकर) बोला -
तुम दोनों…
मनमोहन बोला -
कोई बात नहीं भैया…मतलब केशव भैया…
हम आँखें बंद कर लेते हैं।
सत्यभामा (मुँह छुपाते हुए) बोली -
आप दोनों बहुत बुरे हो…
प्रार्थना बोली -
पर बहुत खुश भी हैं!
मनमोहन बोला -
अगली बार डोर पर ‘डू नॉट डिस्टर्ब’ लटका देना।”
केशव हँस पड़ा।
केशव बोला -
लगता है घर में दो नहीं…चार बच्चे हैं।
चारों की हँसी, वो पल अधूरा रह गया। पर दिल पूरा हो गया।
रात का सन्नाटा उस रात घर में एक अलग ही सुकून था।
चारों ज़मीन पर बिस्तर लगाकर सो रहे थे।
सोने की व्यवस्था —
एक तरफ़ मनमोहन केशव की साइड में।
दूसरी तरफ़ प्रार्थना सत्यभामा की साइड में।
और बीच में केशव और सत्यभामा।
रात के किसी पहर सत्यभामा नींद में थोड़ी-थोड़ी खिसकती हुई
केशव के और पास आ गई। ठंडी हवा थी। अनजाने में उसने अपना सिर केशव के कंधे के पास रख दिया। केशव गहरी नींद में था। पर शायद दिल पहचान गया। उसने बिना आँख खोले सत्यभामा को अपनी बाहों में समेट लिया। अब दोनों एक-दूसरे की
बाहों में सुकून से सो रहे थे। कोई दिखावा नहीं। कोई डर नहीं।
बस एक सुरक्षित सी नींद।
तभी…
दूसरी तरफ़ प्रार्थना की नींद खुल गई। उसने आँख मली और जो देखा उसे हँसी आ गई।
प्रार्थना (फुसफुसाकर) बोली -
मनमोहन भैया…उठो…देखो ज़रा…।
मनमोहन ने करवट बदली, उसकी भी नींद टूट गई। उसने नज़र उठाकर बीच में देखा और उसके होंठों पर शरारती मुस्कान आ गई।
मनमोहन (धीमे से) बोला -
ओहो…लगता है हमारे भाई साहब नींद में भी रोमांटिक हैं।
प्रार्थना (हँसी दबाते हुए) बोली -
श्श्श…जगाना मत।
मनमोहन बोला -
कल पूछेंगे कैसी नींद आई थी?
प्रार्थना बोली -
और वो भी बहुत मासूम बनकर।
मनमोहन बोला -
शर्त लगाओ—
सुबह दोनों कुछ याद नहीं होने का नाटक करेंगे।
प्रार्थना बोली -
और हम दोनों बहुत सीरियस बनकर
बोलेंगे—
‘हमें सब दिखा।’
दोनों ने हँसी दबाई। रजाई में मुँह छुपा लिया।
बीच में…
केशव और सत्यभामा अब भी एक-दूसरे में सिमटे हुए शांति से
सो रहे थे। जैसे किसी को डर न हो कि सुबह फिर कोई तूफ़ान आएगा। उस रात घर में चार लोग सो रहे थे—
लेकिन दो दिल पहली बार बिल्कुल बेफ़िक्र।
सुबह की पहली रोशनी खिड़की से धूप की पतली सी लकीर
अंदर आई। केशव ने आँख खोली, और कुछ नरम सा अपने सीने पर महसूस किया। उसने नीचे देखा सत्यभामा उसकी बाहों में।
एक झटका केशव एकदम चौंक गया।
केशव (धीरे से) बोला -
अरे…! ये कब हुआ?!
उसी पल सत्यभामा की भी नींद खुल गई।
सत्यभामा (हड़बड़ाकर) बोली -
ये…ये कैसे…?!
दोनों जल्दी से अलग हुए, दोनों की आँखों में घबराहट थी।
सत्यभामा बोली -
क… कहीं…किसी ने देख तो नहीं लिया?
केशव ने इधर-उधर नज़र दौड़ाई , कमरा शांत था।
केशव (साँस छोड़ते हुए) बोला -
शायद…नहीं…
तभी…पीछे से ताली की धीमी आवाज़—
मनमोहन बोला -
वाह…बहुत प्यारी सुबह की शुरुआत है!
प्रार्थना (हँसते हुए) बोली -
गुड मॉर्निंग लव बर्ड्स!
दोनों हक्का-बक्का रह गए।
सत्यभामा (शर्म से लाल होते हुए) बोली -
अ… आप दोनों कब जाग गए?
मनमोहन बोला -
कब?
रात को ही।
प्रार्थना बोली -
और बहुत मज़ेदार नज़ारा देखा।
केशव (झेंपते हुए) बोला -
देखो…वो…नींद में…गलती से…।
मनमोहन (आँख मारते हुए) बोला -
हाँ हाँ…नींद में ही बाँहों में आ गई होंगी।
प्रार्थना बोला -
और नींद में ही किसी ने पकड़ भी लिया होगा!
सत्यभामा तकिया उठाकर प्रार्थना की तरफ़ फेंकती है।
सत्यभामा बोली -
चुप रहो आप दोनों!
मनमोहन (हँसते हुए) बोला -
अरे भाभी…हम तो बस गवाह हैं।
केशव (मुस्कुराते हुए) बोला -
और बहुत शरारती गवाह हो।
प्रार्थना बोली -
कल रात आप दोनों इतने क्यूट लग रहे थे कि हमने जगाया ही नहीं।
एक पल की चुप्पी, फिर चारों हँस पड़े।
सुबह की हल्की-फुल्की शुरुआत डर नहीं था। सिर्फ़ झेंप और खुशी थी।
सत्यभामा (धीरे से, केशव से) बोली -
आपने…ठीक किया…मुझे दूर नहीं किया।
केशव उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुरा दिया।
केशव बोला -
शायद…नींद भी हमारी तरफ़ थी।
बाहर की धूप और तेज़ हो गई। उस घर में आज भी प्यार मना नहीं था।
क्या ये मासूम शरारतें और नज़दीकियाँ उन्हें और क़रीब लाएँगी?
क्या बाहर की दुनिया फिर कोई नई मुसीबत लेकर आएगी?
क्या ये अधूरा पल फिर पूरा होगा?
क्या किस्मत फिर बीच में कुछ नया खेल खेलेगी?