Ishq Risk in Hindi Drama by ziya books and stories PDF | इश्क़ रिस्क

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इश्क़ रिस्क


समुद्र की गहराइयों में जहाँ सूरज की किरणें भी धुंधली पड़ जाती हैं, वहाँ एक अजीब सी दुनिया बसती है। यह कहानी उसी दुनिया की है, जहाँ इश्क़ और ख़तरा दोनों एक साथ चलते हैं। यह कहानी है अर्जुन की, जो एक समुद्री जीव विज्ञानी था और उसके जीवन में आई उस घटना की जिसने उसकी दुनिया ही बदल दी।
अध्याय 1: समुद्र का बुलावा
अर्जुन मेहता मुंबई के एक प्रतिष्ठित समुद्री अनुसंधान संस्थान में काम करता था। उसकी उम्र महज़ 28 साल थी, लेकिन समुद्री जीवों के बारे में उसका ज्ञान किसी अनुभवी वैज्ञानिक से कम नहीं था। उसके काले घुंघराले बाल, गहरी भूरी आँखें और चेहरे पर हमेशा रहने वाली एक जिज्ञासु मुस्कान उसे भीड़ में अलग बना देती थी।
एक दिन संस्थान के निदेशक डॉ. वर्मा ने अर्जुन को अपने कक्ष में बुलाया। "अर्जुन, हमें अंडमान के पास एक अजीब सी रिपोर्ट मिली है। मछुआरे बता रहे हैं कि वहाँ कुछ अजीब दिख रहा है - कुछ बड़ा, कुछ अलग। मैं चाहता हूँ कि तुम वहाँ जाकर जाँच करो।"
अर्जुन के दिल में उत्साह की लहर दौड़ गई। समुद्र में कुछ नया खोजने का मौका! यह उसके लिए किसी सपने के सच होने जैसा था। "जी सर, मैं कल ही निकलने के लिए तैयार हूँ," उसने तुरंत जवाब दिया।
अगले दिन अर्जुन अपनी टीम के साथ पोर्ट ब्लेयर के लिए रवाना हो गया। टीम में उसके अलावा तीन और सदस्य थे - राज, जो एक अनुभवी गोताख़ोर था; प्रिया, जो समुद्री प्राणियों की तस्वीरें लेने में माहिर थी; और कमल, जो उनका नाविक और स्थानीय गाइड था।
अध्याय 2: पहली मुलाक़ात
पोर्ट ब्लेयर पहुँचकर अर्जुन की टीम ने एक छोटी सी नाव किराए पर ली और उस स्थान की ओर बढ़ी जहाँ मछुआरों ने अजीब चीज़ें देखी थीं। समुद्र शांत था, लेकिन हवा में एक अजीब सी खामोशी थी।
"यहाँ कुछ तो है," कमल ने कहा, जो 40 साल से इन पानियों में काम कर रहा था। "मैंने ऐसी खामोशी पहले कभी नहीं देखी। जानवर भी यहाँ से दूर भाग रहे हैं।"
अर्जुन ने अपना डाइविंग सूट पहना और पानी में कूद गया। राज उसके साथ था। धीरे-धीरे वे गहराई में उतरने लगे। पानी का रंग नीले से हरे और फिर काले में बदल रहा था। मछलियाँ तेज़ी से उनके पास से गुज़र रही थीं, मानो किसी चीज़ से भाग रही हों।
अचानक अर्जुन ने कुछ देखा - एक विशाल परछाई। यह कोई व्हेल नहीं थी, न ही कोई शार्क। यह कुछ और था, कुछ बहुत बड़ा।
परछाई धीरे-धीरे उनके पास आई। और तब अर्जुन ने उसे देखा - एक विशाल प्राणी, जो किसी प्राचीन पौराणिक कथा से निकला लगता था। उसका शरीर व्हेल जैसा था, लेकिन उसकी आँखें... उसकी आँखों में एक अजीब सी बुद्धिमत्ता थी, एक गहराई थी जो अर्जुन को अपनी ओर खींच रही थी।
प्राणी ने अर्जुन की ओर देखा। एक पल के लिए समय रुक गया। अर्जुन को लगा जैसे वह प्राणी उससे कुछ कहना चाह रहा है, उसकी आत्मा से बात करना चाह रहा है।
राज ने अर्जुन का हाथ खींचा। "ऊपर चलना होगा, ऑक्सीजन ख़त्म हो रही है।"
अर्जुन मन मारकर ऊपर आया, लेकिन उसका मन अब भी उस प्राणी के साथ था।
अध्याय 3: रहस्यमयी संबंध
नाव पर वापस आकर अर्जुन ने सबको अपना अनुभव बताया। "यह कोई साधारण प्राणी नहीं है," उसने कहा। "इसमें कुछ ख़ास है, कुछ जो मैं समझ नहीं पा रहा।"
प्रिया ने अपने कैमरे की तस्वीरें देखीं। "देखो, इसकी त्वचा पर निशान हैं। ये कोई प्राकृतिक निशान नहीं लगते।"
अगले कुछ दिनों तक अर्जुन रोज़ उस प्राणी से मिलने जाता। धीरे-धीरे उन दोनों के बीच एक अजीब सा रिश्ता बन गया। प्राणी अब अर्जुन को देखते ही पास आ जाता। अर्जुन ने उसका नाम "नीलकंठ" रख दिया था।
एक दिन अर्जुन जब पानी में था, तो नीलकंठ ने अपनी पूँछ से एक अजीब सी आवाज़ निकाली। यह आवाज़ किसी गीत जैसी थी, एक दुखद गीत। अर्जुन को लगा जैसे नीलकंठ दर्द में है, अकेलेपन में है।
"क्या तुम अकेले हो?" अर्जुन ने मन ही मन पूछा। नीलकंठ ने अपनी बड़ी आँखों से उसे देखा, और अर्जुन को जवाब मिल गया।
अध्याय 4: ख़तरे की घंटी
एक हफ्ते बाद स्थिति बदल गई। पोर्ट ब्लेयर में एक बड़ी शिपिंग कंपनी के लोग आए। उन्होंने सुना था कि यहाँ एक दुर्लभ समुद्री प्राणी है और वे उसे पकड़कर किसी एक्वेरियम में रखना चाहते थे।
डॉ. वर्मा ने अर्जुन को फ़ोन किया। "अर्जुन, सरकार ने उस प्राणी को पकड़ने की इजाज़त दे दी है। वे कहते हैं कि यह वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए ज़रूरी है।"
अर्जुन का दिल बैठ गया। "सर, नहीं! यह ग़लत है। नीलकंठ को खुले समुद्र में ही रहना चाहिए। वह किसी टैंक में नहीं रह सकता।"
"मुझे माफ़ करना अर्जुन, लेकिन फ़ैसला हो चुका है। तुम्हें उन्हें मदद करनी होगी।"
अर्जुन ने फ़ोन काट दिया। उसके सामने एक बड़ा सवाल था - अपनी नौकरी बचाए या नीलकंठ को?
अध्याय 5: इश्क़ की क़ीमत
उस रात अर्जुन को नींद नहीं आई। वह समुद्र किनारे बैठा सोच रहा था। प्रिया उसके पास आकर बैठ गई।
"तुम नीलकंठ से प्यार करने लगे हो, है न?" उसने धीरे से पूछा।
अर्जुन चौंक गया। "क्या? नहीं, मैं बस... वह एक ज़िंदा प्राणी है, प्रिया। उसकी भी भावनाएँ हैं।"
"यही तो प्यार है, अर्जुन। किसी की परवाह करना, उसकी ख़ुशी को अपनी ख़ुशी से ज़्यादा ज़रूरी समझना।"
अर्जुन को एहसास हुआ कि प्रिया सही कह रही थी। पिछले हफ्ते में नीलकंठ उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया था। वह सिर्फ़ एक वैज्ञानिक नमूना नहीं था, वह एक दोस्त था, एक साथी था।
"तो तुम क्या करोगे?" प्रिया ने पूछा।
"जो सही है," अर्जुन ने जवाब दिया।
अध्याय 6: विद्रोह
अगले दिन शिपिंग कंपनी के लोग अपने जाल और उपकरणों के साथ आ गए। उनके पास एक बड़ा जहाज़ था और एक पूरी टीम।
अर्जुन ने उनसे बात करने की कोशिश की। "सुनिए, यह प्राणी बहुत संवेदनशील है। इसे पकड़ना ख़तरनाक हो सकता है।"
कंपनी के मुखिया, मिस्टर खन्ना ने हँसते हुए कहा, "डॉक्टर साहब, हमने इससे बड़े-बड़े जानवर पकड़े हैं। चिंता मत करिए।"
लेकिन अर्जुन जानता था कि यह अलग है। नीलकंठ कोई साधारण जानवर नहीं था।
जब वे समुद्र में पहुँचे और जाल बिछाने लगे, तो अर्जुन ने एक फ़ैसला किया। वह चुपके से पानी में कूद गया और नीलकंठ के पास गया।
"भाग जाओ," उसने अपने मन में कहा। "यहाँ से दूर चले जाओ।"
नीलकंठ ने उसे देखा, और फिर कुछ अजीब हुआ। प्राणी ने अपनी पूँछ से पानी में एक शक्तिशाली धारा पैदा की, जिससे जाल टूट गए। फिर वह तेज़ी से गहराई में उतरने लगा।
अर्जुन ऊपर आया तो खन्ना बहुत ग़ुस्से में था। "तुमने क्या किया? तुमने उसे भगा दिया!"
"मैंने कुछ नहीं किया," अर्जुन ने शांति से कहा। "वह ख़ुद चला गया।"
अध्याय 7: परिणाम
अर्जुन को तुरंत मुंबई बुला लिया गया। डॉ. वर्मा बहुत नाराज़ थे। "तुमने अपनी ज़िम्मेदारी को धोखा दिया, अर्जुन। मुझे तुम्हें नौकरी से निकालना पड़ेगा।"
अर्जुन ने स्वीकार किया। उसे पता था कि यह होने वाला है। लेकिन उसे कोई पछतावा नहीं था।
"सर, विज्ञान का मतलब सिर्फ़ खोज करना नहीं है," उसने कहा। "इसका मतलब है प्रकृति का सम्मान करना, जीवन का सम्मान करना। अगर हम हर दुर्लभ चीज़ को पकड़कर पिंजरे में बंद कर दें, तो हम इंसान नहीं, शिकारी हैं।"
डॉ. वर्मा ने कुछ नहीं कहा। शायद अर्जुन की बात में कुछ सच्चाई थी।
अध्याय 8: नई शुरुआत
अर्जुन मुंबई लौट आया, लेकिन उसका दिल अब भी अंडमान के समुद्र में था। उसने एक छोटी सी नौकरी ली - एक स्कूल में विज्ञान पढ़ाने की। वह बच्चों को समुद्री जीवन के बारे में बताता, उन्हें प्रकृति से प्यार करना सिखाता।
एक दिन उसे प्रिया का फ़ोन आया। "अर्जुन, तुम्हें नहीं पता क्या हुआ! नीलकंठ फिर दिखा है। लेकिन इस बार वह अकेला नहीं है। उसके साथ दो और छोटे प्राणी हैं। शायद उसके बच्चे!"
अर्जुन की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। नीलकंठ ने अपना परिवार पाया था। वह अब अकेला नहीं था।
"और सुनो," प्रिया ने आगे कहा, "सरकार ने उस पूरे इलाके को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया है। अब कोई वहाँ शिकार नहीं कर सकता।"
अध्याय 9: अंतिम मुलाक़ात
तीन महीने बाद अर्जुन को एक आमंत्रण मिला। एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री संरक्षण सम्मेलन में उसे बुलाया गया था। उसकी कहानी दुनिया भर में फैल गई थी।
सम्मेलन के बाद अर्जुन फिर से अंडमान गया। वह नाव किराए पर लेकर उसी जगह गया जहाँ उसने पहली बार नीलकंठ को देखा था।
वह पानी में उतरा। कुछ देर तक तो कुछ नहीं दिखा, लेकिन फिर वो आया - नीलकंठ। और उसके साथ थे उसके दो बच्चे।
नीलकंठ धीरे से अर्जुन के पास आया। उन दोनों ने एक-दूसरे को देखा, और उस पल में शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। यह एक विदाई थी, और साथ ही एक वादा - कि प्रकृति और इंसान दोनों साथ रह सकते हैं, अगर इंसान प्यार और सम्मान के साथ काम करे।
उपसंहार
अर्जुन की कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुई। उसने एक एनजीओ शुरू की जो समुद्री जीवन के संरक्षण के लिए काम करती थी। उसने कई युवाओं को प्रेरित किया कि वे विज्ञान का इस्तेमाल प्रकृति की रक्षा के लिए करें, न कि उसका शोषण करने के लिए।
नीलकंठ और उसका परिवार आज भी उसी संरक्षित क्षेत्र में रहता है। कभी-कभार अर्जुन उनसे मिलने जाता है, और हर बार नीलकंठ उसे पहचान लेता है।
यह कहानी सिखाती है कि सच्चा इश्क़ सिर्फ़ इंसानों के बीच नहीं होता। यह इंसान और प्रकृति के बीच भी हो सकता है। और जब ऐसा होता है, तो इश्क़ एक जोखिम बन जाता है - एक ऐसा जोखिम जो उठाने लायक होता है।
अर्जुन ने अपनी नौकरी खोई, लेकिन उसने अपनी आत्मा पाई। उसने दुनिया को दिखाया कि कभी-कभी दिल की आवाज़ सुनना, तर्क से ज़्यादा ज़रूरी होता है।
इश्क़ एक रिस्क है, लेकिन कुछ रिस्क ऐसे होते हैं जो ज़िंदगी को मायने देते हैं।