अध्याय 8: स्मृतियों का पाताल और महागुरु का मौन भंग
गुरुकुल के उस विशाल कक्ष में मशालों की रोशनी दीवारों पर नाच रही थी, जैसे वे भी आने वाले सच से भयभीत हों। आचार्या वसुंधरा का व्यक्तित्व इस समय किसी जलती हुई ज्वाला के समान था। उनके चेहरे पर वह सौम्यता कहीं लुप्त हो चुकी थी जिसके लिए कन्या गुरुकुल की छात्राएं उनका सम्मान करती थीं। उनके हाथों की मुट्ठियाँ कसी हुई थीं और उनकी आवाज़ में वह अधिकार था जिसे ठुकराना महागुरु के लिए भी असंभव था।
वसुंधरा ने चिल्लाकर कहा, महागुरु! यह मौन अब आपको अपराधी बना रहा है। बाहर हवाओं में मेरी शिष्या की चीखें गूँज रही हैं और आप यहाँ नियति का नाम लेकर चुप बैठे हैं? उस काले लबादे पर लौरा का नाम कैसे आया? क्या रुद्र ने उसे भी अपनी उसी काली दुनिया का हिस्सा बना लिया है जिसे आप बरसों से पाल रहे हैं?
महागुरु ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। उनकी पुतलियों में एक अजीब सा खालीपन था। उन्होंने वसुंधरा की ओर देखा और बहुत धीमे स्वर में बोले, वसुंधरा, मर्यादा के बंधन जब टूटते हैं, तो सच की बाढ़ सबको बहा ले जाती है। तुम जिस सच को जानना चाहती हो, वह केवल रुद्र के बारे में नहीं है, वह इस गुरुकुल की उन जड़ों के बारे में है जिन्हें हमने रक्त से सींचा है।
वसुंधरा का क्रोध और बढ़ गया। उन्होंने मेज़ पर रखे प्राचीन पात्र को ज़ोर से झटक दिया। वे चीख उठीं, मुझे शास्त्रों की ये गूढ़ बातें नहीं सुननी! मुझे वह सच चाहिए जो सीधा और स्पष्ट हो। वह लड़का कौन है? उसे यहाँ कौन छोड़कर गया था? और आपने उसे सामान्य छात्रों से अलग, उस वर्जित विद्या की ओर क्यों धकेला जिसने आज उसे एक बागी बना दिया? क्या आपको पता था कि एक दिन वह मेरी लौरा को इस तरह छीन ले जाएगा?
महागुरु अपने आसन से खड़े हुए। उनके खड़े होते ही पूरे कक्ष में एक ठंडी हवा का झोंका आया, जिससे मशालें बुझते-बुझते बचीं। उन्होंने वसुंधरा की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, रुद्र को यहाँ लाया नहीं गया था वसुंधरा, उसे यहाँ 'सौंपा' गया था। एक ऐसे सौदे के तहत, जिसमें मेरा कोई वश नहीं था। तुम पूछती हो कि वह रात कैसी थी? वह रात आज की रात से भी कहीं अधिक काली और भयानक थी।
महागुरु ने अपना हाथ हवा में लहराया। उनके हाथ के इशारे के साथ ही कमरे की धुंध और मशालों का धुआँ एक परदे की तरह हवा में तैरने लगा। वसुंधरा को ऐसा महसूस हुआ जैसे उनके पैर ज़मीन छोड़ रहे हों। उनके चारों ओर का दृश्य धुंधला होने लगा और गुरुकुल की दीवारों की जगह ऊँचे पहाड़ और घने जंगल दिखाई देने लगे।
महागुरु की आवाज़ अब एक गूँज बनकर उनके कानों में बजने लगी, वह आज से लगभग पंद्रह-बीस साल पुरानी एक सर्द रात थी। आसमान से बारिश नहीं, बल्कि आग के गोले जैसे ओले गिर रहे थे। कोहरा इतना घना था कि अपनी ही हथेली दिखाई नहीं देती थी। उसी कोहरे को चीरते हुए एक ऐसी परछाईं गुरुकुल की ओर बढ़ रही थी, जिसने यहाँ की पवित्रता और विनाश के बीच की रेखा को हमेशा के लिए मिटा दिया।
महागुरु ने एक गहरी आह भरी और बोले, उस अज्ञात पथिक के हाथों में एक छोटा सा शिशु था, जिसके रोने की आवाज़ में कोई मासूमियत नहीं, बल्कि एक अजीब सी पुकार थी। वहीं से शुरू हुआ था वह सिलसिला, जिसे आज तुम रुद्र और लौरा के विद्रोह के रूप में देख रही हो।
दृश्य अब पूरी तरह बदल चुका था। वसुंधरा और महागुरु अब वर्तमान में नहीं, बल्कि अतीत की उस दहलीज पर खड़े थे जहाँ से रुद्र की कहानी का पहला पन्ना खुलने वाला था।