Bade Dil Wala - Part - 13 in Hindi Motivational Stories by Ratna Pandey books and stories PDF | बड़े दिल वाला - भाग - 13

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बड़े दिल वाला - भाग - 13

अभी तक आपने पढ़ा कि अनन्या ने वीर की असलियत अपनी आँखों से देख ली और उसका भ्रम टूट गया। विश्वासघात से आहत होकर वह घर लौटी, जहाँ अनुराग ने उसके "सॉरी" लिखे कागज़ को देखकर सब समझ लिया, लेकिन फिर भी अनजान बना रहा। अनुराग ने उसे पत्नी के रूप में स्वीकार किया और विवाह को पवित्र बंधन मानकर निभाने का संकल्प लिया, जबकि अनन्या मन ही मन अपने माता-पिता की बातों की सच्चाई को स्वीकार कर रही थी। अब इसके आगे-

'अनु, तुम कहाँ चली गई थीं?', अनुराग की इस बात का अनन्या ने कोई जवाब न देते हुए कहा, "मैं चाय बना कर लाती हूँ, आप जल्दी कैसे आ गए?"

यह पहला वाक्य था जो अनन्या ने आज ख़ुद होकर अनुराग से पूछा था। इस प्रश्न को सुनकर वह बहुत खुश हो गया।

उसने कहा, "बस, तुमसे बातें करने का मन था, इसलिए आ गया।"

अनुराग अनन्या के चेहरे और रोई हुई सूजी आंखें देखकर समझ गया था कि उसके साथ कुछ तो ग़लत हुआ है। अनन्या चाय बना कर लाई, फिर दोनों ने साथ बैठकर चाय पी।

अनन्या ने पूछा, "पापा-मम्मी कब वापस आएंगे?"

अनुराग ने कहा, "लगभग दस दिन बाद।"

तभी अचानक अनुराग के ऑफिस से फ़ोन आया और किसी ज़रूरी काम से उसे तुरंत वापस ऑफिस जाना पड़ा।

अनुराग के जाते ही अनन्या ने वीर को फ़ोन लगाया, "हैलो वीर।"

अनन्या का फ़ोन देखते ही वीर खुश हो गया। उस समय भी वह लड़की उसके पास ही लेटी हुई थी।

उसने कहा, "हैलो अनु, मेरी जान।"

"वीर, मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ।"

"हाँ, बोलो अनु।"

"वीर, कल रात ..."

"क्या हुआ कल रात? क्या उसने तुम्हें छू लिया?"

"नहीं-नहीं, मैं तो कह रही थी कि आने वाली कल की रात को मैं तुम्हारे पास आ रही हूँ हमेशा-हमेशा के लिए। अब मैं तुम्हारे बिना और अलग नहीं रह सकती।"

"यह हुई ना बात मेरी जान, आ जाओ, मैं बेसब्री से कल रात का इंतज़ार करूंगा।"

"वीर, मैं तुमसे एक बात पूछना चाहती हूँ?"

"हाँ-हाँ, पूछो ना अनु।"

"वीर, क्या तुम भी मेरी तरह गंगा की तरह पवित्र हो?"

"क्या ...? यह क्या पूछ रही हो तुम? यह कैसा प्रश्न है? मैं मर्द हूँ, अनन्या।"

"तो-तो क्या हुआ वीर? तुम मुझे तो पवित्र रहने के लिए कह रहे हो, तो मुझे भी तो अधिकार है कि मैं तुमसे कुछ पूछ सकूँ? बोलो ना? तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया। क्या तुम गंगा की तरह पवित्र हो?"

"हाँ, बिल्कुल अनु, बिल्कुल 16 आने पवित्र, बिल्कुल गंगा की तरह। बल्कि उससे भी ज़्यादा, उसमें तो फिर भी लोग कचरा फेंक देते हैं, पर मैं बिल्कुल साफ़-सुथरा हूँ। मेरा मन भी तुम्हारा है और तन भी।"

"अच्छा, तो ठीक है। कल नहीं, परसों रात को मैं हमेशा के लिए आ जाऊंगी।"

"अरे यार और एक दिन इंतज़ार करना पड़ेगा। अनु, कल क्या है, कल ही क्यों नहीं आ सकती।"

"कल अनुराग ने छुट्टी ली है। वह कह रहा था मूवी देखने जाएंगे और फिर डिनर करके ही वापस लौटेंगे।"

"अरे यार, यह खल नायक हम दोनों के जीवन में आया ही क्यों? वह तुम्हें छूने की कोशिश करता होगा ना?"

"हाँ करता तो है, एक बार मेरे होठों पर उसने अपने होंठ भी रख दिए थे। बड़ी मुश्किल से मना किया था मैंने।"

"क्या ...? यह क्या कह रही हो अनु? तुमने तुम्हारे होंठ झूठ कर दिए?"

"अरे-अरे, तुम तो नाराज हो गए। सिर्फ़ होंठ ही तो छुए हैं। मैंने धो भी लिए, तुम चिंता मत करो।"

अनन्या ने यह कहकर कि कल वह अनुराग के साथ है; वीर को बिल्कुल बेफिक्र कर दिया।

वीर भी सच में बेफिक्र हो गया था और उसने अपनी रंगरेलियाँ वैसे ही जारी रखीं।

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक 
क्रमशः