Mafia ki Mohabbat - 5 in Hindi Love Stories by Pooja Singh books and stories PDF | माफिया की मोहब्बत - 5

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माफिया की मोहब्बत - 5

चैप्टर 5 — अपहरण
कैफ़े के बाहर शाम उतरने लगी थी।
कांच की दीवारों पर हल्की नारंगी रोशनी पड़ रही थी और अंदर का सुकून भरा माहौल अब भी वैसा ही था — जैसे दुनिया में कुछ गलत हो ही नहीं सकता।
सावी पानी का ग्लास हाथ में पकड़े चुप बैठी थी।
अथर्व बिल पे करने काउंटर की तरफ गया हुआ था।
उसके दिमाग में अभी भी वही पल घूम रहा था —
घुटनों पर बैठा अथर्व… कांपती आवाज… सच्ची आँखें।
दिल भारी था।
वो उठी और बाहर के दरवाज़े के पास चली गई। उसे थोड़ी हवा चाहिए थी।
दरवाज़ा खोलते ही हल्की ठंडी हवा चेहरे से टकराई। सड़क लगभग खाली थी… सिर्फ कुछ गाड़ियाँ दूर-दूर गुजर रही थीं।
सावी ने गहरी सांस ली।
उसी पल…
एक काली SUV ठीक सामने आकर रुकी।
उसे लगा कोई सामान्य ग्राहक होगा।
दरवाज़ा खुला।
दो आदमी उतरे।
उनकी चाल सामान्य नहीं थी।
सावी का दिल अचानक तेज धड़कने लगा।
वो पलटी — अंदर जाने के लिए।
लेकिन देर हो चुकी थी।
एक हाथ ने उसकी कलाई पकड़ ली।
“कौन—?! छोड़ो!”
दूसरे आदमी ने तुरंत उसके मुंह पर कपड़ा रख दिया।
सावी पूरी ताकत से छूटने की कोशिश करने लगी।
उसके नाखून आदमी की त्वचा में धंस गए।
“जल्दी करो!”
उसकी आवाज दब गई।
उसने कांच के अंदर देखा —
अथर्व काउंटर पर खड़ा था… पीठ उसकी तरफ थी।
सावी ने पैर से दरवाज़े को ठोकर मारी।
धप्प!
अथर्व मुड़ा।
उसकी आँखें फैल गईं।
“सावी!!”
वो दौड़ा।
लेकिन तब तक उसे खींचकर गाड़ी की तरफ घसीटा जा चुका था।
अथर्व पूरी ताकत से बाहर भागा।
एक आदमी को पकड़कर उसने मुक्का मारा — आदमी लड़खड़ा गया।
“उसे छोड़ो!”
दूसरे ने उसे जोर से धक्का दिया।
अथर्व सड़क पर गिर पड़ा… लेकिन तुरंत उठा।
उसने सावी का हाथ पकड़ लिया —
कुछ सेकंड के लिए दोनों की पकड़ जुड़ गई।
सावी की आँखों में डर भर गया था।
“अथर्व…!”
अगले ही पल —
किसी ने लोहे की रॉड उसके सिर के पास जमीन पर दे मारी।
चिंगारियाँ सी उड़ीं।
अथर्व का संतुलन बिगड़ा…
उसकी पकड़ छूट गई।
दरवाज़ा बंद।
SUV तेज़ी से आगे बढ़ गई।
“सावी!!!”
उसकी आवाज सड़क पर गूंजती रह गई।
गाड़ी मोड़ काटकर गायब हो चुकी थी।
कुछ मिनट बाद
अथर्व सड़क के बीच खड़ा था।
सांसें टूट रही थीं।
हाथ कांप रहे थे।
उसने फोन निकाला… उंगलियाँ सही से काम नहीं कर रही थीं।
पहला नंबर — पुलिस।
फिर अचानक उसे कुछ याद आया।
हमला…
चेतावनी…
वो एक नाम जो वो लेना नहीं चाहता था।
उसने दूसरा नंबर डायल किया।
रिंग…
रिंग…
कॉल उठी।
दूसरी तरफ खामोशी।
अथर्व की आवाज टूट गई —
“रेयांश… सावी को ले गए।”
कुछ सेकंड कुछ नहीं बोला गया।
फिर दूसरी तरफ बहुत धीमी आवाज आई —
“कहाँ से?”
“कैफ़े… ब्लू ऑर्किड… अभी!”
अगले ही पल कॉल कट गया।
शहर के दूसरे कोने में
एक सुनसान गोदाम के बाहर बाइक रुकी।
रेयांश उतरते ही ठिठक गया।
उसकी मुट्ठियाँ धीरे-धीरे भींच गईं।
उसने आसमान की तरफ देखा… जैसे खुद को रोकने की आखिरी कोशिश कर रहा हो।
वो वादा।
दूर रहूँगा…
कुछ सेकंड बाद उसने आंखें खोलीं।
इस बार उनमें कोई नरमी नहीं थी।
सिर्फ ठंडा गुस्सा।
उसने फोन मिलाया।
“सबको खबर कर दो।”
दूसरी तरफ से आवाज आई —
“क्या शुरू करें?”
रेयांश ने धीमे कहा —
“अब कोई नियम नहीं रहेगा।”
उसने बाइक स्टार्ट की।
इंजन की आवाज रात को चीरती हुई निकल गई।
दूसरी तरफ — चलती गाड़ी के अंदर
सावी की आंखों पर पट्टी बंधी थी।
हाथ पीछे बांधे हुए।
उसकी सांसें तेज थीं।
गाड़ी झटके खाती आगे बढ़ रही थी।
एक आदमी बोला —
“बॉस खुश होगा। आखिर मिल ही गई।”
दूसरा हंसा —
“इस बार वो खुद आएगा लेने।”
सावी का दिल बैठ गया।
“कौन…?”
कोई जवाब नहीं मिला।
सिर्फ एक वाक्य —
“जिससे तुम दूर रहना चाहती थी… उसी के कारण तुम यहाँ हो।”
सावी के गाल पर आँसू बह निकला।
उसे पहली बार महसूस हुआ —
खतरा शुरू नहीं हुआ…
अब असली खेल शुरू हुआ है।