उस रात गांव के बाहर वाला पुराना रास्ता जैसे किसी अनदेखे डर से भरा हुआ था। हवा बिल्कुल धीमी थी, फिर भी पीपल के पेड़ की पत्तियां अपने आप कांप रही थीं। लोग कहते थे कि उस रास्ते पर रात के बाद कोई अकेला न जाए, लेकिन हर चेतावनी की तरह इसे भी कुछ लोग मजाक समझते थे। मैं भी उन्हीं में से एक था।
मेरा नाम माधव था, और मैं उस समय पास के गांव में अनाज बेचकर लौट रहा था। सूरज डूब चुका था और अंधेरा तेजी से फैल रहा था। मेरे पास बस एक लालटेन थी, जिसकी पीली रोशनी रास्ते पर कांपती हुई पड़ रही थी। दूर कहीं सियारों की आवाज गूंज रही थी, और हर आवाज जैसे मेरे दिल की धड़कन को तेज कर रही थी।
जब मैं उस पुराने चौराहे पर पहुंचा, जहां चार रास्ते मिलते थे, तभी मुझे पहली बार उसका एहसास हुआ। हवा अचानक ठंडी हो गई। लालटेन की लौ तेज होकर बुझने जैसी हुई। और फिर मैंने उसे देखा।
वह एक औरत थी। सफेद साड़ी में, लंबे खुले बाल, और उसका चेहरा आधे अंधेरे में छिपा हुआ। वह चौराहे के बीच खड़ी थी, जैसे किसी का इंतजार कर रही हो। मैंने सोचा शायद कोई गांव की औरत होगी जो रास्ता भटक गई है।
मैंने हिम्मत करके आवाज लगाई, “कौन हो तुम? इस वक्त यहां क्या कर रही हो?”
वह धीरे से मेरी तरफ मुड़ी। उसका चेहरा सुंदर था, असाधारण रूप से सुंदर। उसकी आंखें चमक रही थीं, जैसे उनमें कोई आग जल रही हो। उसने धीमी आवाज में कहा, “मैं रास्ता भटक गई हूं… क्या तुम मुझे गांव तक छोड़ दोगे?”
उसकी आवाज में एक अजीब सा खिंचाव था। जैसे कोई मुझे अपनी तरफ खींच रहा हो। मैं कुछ पल के लिए भूल गया कि लोग इस जगह के बारे में क्या कहते थे। मैंने हामी भर दी।
हम दोनों साथ चलने लगे। वह मेरे बिल्कुल पास थी, लेकिन उसके कदमों की आवाज नहीं आ रही थी। यह बात मुझे अजीब लगी, लेकिन मैंने खुद को समझा लिया कि शायद मेरे कान धोखा दे रहे हैं।
चलते चलते उसने बातें करनी शुरू कीं। उसने कहा कि वह बहुत समय से अकेली है, कोई उसका नहीं है। उसकी बातों में दर्द था, लेकिन उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान बनी हुई थी। मुझे उसके लिए सहानुभूति होने लगी।
अचानक मुझे एक बात याद आई। बचपन में दादी कहती थीं, “रात में किसी अजनबी के साथ चलो तो पहले उसके पैर देखना।”
मेरे कदम धीमे हो गए। दिल जोर से धड़कने लगा। मैंने धीरे से अपनी लालटेन नीचे की तरफ झुकाई।
और जो मैंने देखा, उसने मेरी रूह तक जमा दी।
उसके पैर उल्टे थे।
एड़ियां आगे और उंगलियां पीछे।
मेरा गला सूख गया। मैं समझ गया कि मैं किसके साथ चल रहा हूं। यह कोई इंसान नहीं थी। यह चुरेल थी।
मैंने डर के मारे पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन तभी उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ बर्फ की तरह ठंडा था। उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि मैं छुड़ा नहीं पा रहा था।
उसका चेहरा धीरे धीरे बदलने लगा। उसकी सुंदरता एक भयानक रूप में बदल गई। आंखें और ज्यादा चमकने लगीं, मुंह से काली हंसी निकलने लगी। उसके बाल हवा में ऐसे लहरा रहे थे जैसे जिंदा हों।
“अब याद आया?” उसने फुसफुसाते हुए कहा, “अब बहुत देर हो चुकी है…”
मुझे लगा मेरी ताकत खत्म हो रही है। शरीर भारी होने लगा। सांस लेना मुश्किल हो गया। ऐसा लग रहा था जैसे कोई मेरी जिंदगी को धीरे धीरे खींच रहा हो।
मैंने पूरी ताकत लगाकर खुद को छुड़ाया और भागने लगा। पीछे से उसकी हंसी गूंज रही थी। वह मेरे पीछे नहीं दौड़ रही थी, लेकिन उसकी आवाज हर तरफ से आ रही थी।
मैं भागते भागते किसी तरह गांव पहुंचा और वहीं गिर पड़ा।
जब होश आया, तो सुबह हो चुकी थी। गांव वाले मेरे चारों तरफ खड़े थे। उन्होंने कहा कि मैं रात भर बेहोश पड़ा था। मेरा चेहरा बूढ़े आदमी जैसा लग रहा था, और मेरे बाल सफेद हो चुके थे।
मैंने उन्हें सब कुछ बताया, लेकिन कुछ लोग यकीन नहीं कर रहे थे। तभी गांव के सबसे बुजुर्ग आदमी ने धीरे से कहा, “यह वही है… चौराहे वाली चुरेल… जो आदमी को जवान से बूढ़ा बना देती है।”
उस दिन के बाद मैंने कभी उस रास्ते की तरफ नहीं देखा।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
कुछ दिनों बाद, गांव में एक और अजीब बात होने लगी। रात के समय, कुछ लोगों को एक औरत दिखाई देती थी, जो चौराहे के पास खड़ी रहती थी। लेकिन इस बार वह अकेली नहीं थी।
लोग कहते थे कि उसके साथ एक बूढ़ा आदमी भी खड़ा रहता था, जिसकी आंखें खाली थीं और चेहरा डर से जकड़ा हुआ था।
और सबसे डरावनी बात यह थी कि वह बूढ़ा आदमी… बिल्कुल मेरी तरह दिखता था।
अब हर रात मुझे एक ही सपना आता है। मैं उसी चौराहे पर खड़ा हूं। वह मेरे पास आती है, मुस्कुराती है, और कहती है, “अब तुम भी मेरे साथ चलोगे… हमेशा के लिए…”
और जब मैं नींद से जागता हूं, तो मेरे पैरों में अजीब सा दर्द होता है… जैसे वे धीरे धीरे उल्टे मुड़ रहे हों।