सन 1893 की ठंडी रात थी। पहाड़ी गांव के ऊपर धुंध ऐसे लिपटी हुई थी जैसे किसी ने पूरे आकाश को सफेद चादर से ढक दिया हो। उस रात अजीब बात यह थी कि गांव के कुत्ते भी भौंकना भूल गए थे। हवा में एक भारी सन्नाटा था, और उस सन्नाटे के बीच केवल एक घर की खिड़की में टिमटिमाता दिया जल रहा था। वही घर था हरिनारायण का, जो गांव का पढ़ा लिखा आदमी माना जाता था।
हरिनारायण पिछले कुछ दिनों से सो नहीं पा रहा था। उसे लगता था कि उसके अपने विचार उसके नहीं रहे। कभी अचानक उसे गुस्सा आता, कभी बिना वजह डर लगता, और कभी उसके मन में ऐसे ख्याल आते जिनसे वह खुद कांप उठता। उसने कई बार सोचा कि यह केवल थकान है, पर हर रात वह अहसास और गहरा होता गया। उसे लगता जैसे कोई उसकी सोच के अंदर बैठकर उसे धीरे धीरे बदल रहा हो।
उस रात जब घड़ी ने बारह का समय पार किया, तो उसके कमरे में रखा दिया अचानक बुझ गया। कमरे में अंधेरा फैल गया। हरिनारायण ने उठकर दिया जलाने की कोशिश की, पर तभी उसे अपने कान के पास एक धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी। आवाज इतनी पास थी जैसे कोई उसके बिल्कुल पीछे खड़ा हो। आवाज बोली, यह विचार तुम्हारा नहीं है।
हरिनारायण का शरीर सिहर उठा। उसने तेजी से पीछे मुड़कर देखा, पर वहां कोई नहीं था। उसने खुद को समझाया कि यह उसका भ्रम है। पर जैसे ही वह पलटा, उसे महसूस हुआ कि कोई उसकी पीठ पर ठंडी उंगलियां फेर रहा है। वह चीखने ही वाला था कि अचानक उसकी आंखों के सामने अजीब दृश्य उभरने लगे।
उसे अपने ही गांव के लोग दिखाई देने लगे, पर उनके चेहरे विकृत थे। उनकी आंखें खाली थीं, और वे सब एक ही दिशा में देख रहे थे। उस दिशा में अंधेरे के बीच एक आकृति खड़ी थी। उसका शरीर इंसान जैसा था, पर उसके हाथ असामान्य रूप से लंबे थे और उसकी उंगलियां शाखाओं की तरह मुड़ी हुई थीं। उसके बाल जमीन तक लटक रहे थे और उसकी आंखें हरे रंग की चमक रही थीं।
हरिनारायण ने महसूस किया कि वह आकृति उसे देख रही है। और तभी वह आकृति धीरे धीरे उसकी ओर बढ़ने लगी। उसके कदमों की आवाज नहीं थी, पर हर कदम के साथ हरिनारायण का दिल और तेज धड़कने लगा। जैसे ही वह आकृति करीब आई, उसकी फुसफुसाहट साफ सुनाई देने लगी। वह कह रही थी, डर मुझे और मजबूत बनाता है।
हरिनारायण ने भागने की कोशिश की, पर उसके पैर जैसे जमीन में जड़ हो गए थे। अचानक उसे महसूस हुआ कि वह अपने शरीर पर नियंत्रण खो रहा है। उसके हाथ खुद ब खुद उठने लगे, और उसके होंठ बिना उसकी इच्छा के हिलने लगे। वह खुद को बोलते हुए सुन रहा था, पर वह आवाज उसकी नहीं थी।
उसने आईने में देखा, और जो उसने देखा, उससे उसकी आत्मा कांप उठी। आईने में उसका चेहरा था, पर उसकी आंखें वही हरी चमक लिए हुए थीं। उसका मुंह धीरे धीरे खुला, और अंदर गहरा अंधेरा दिखाई दिया, जैसे वहां कोई अंत ही न हो।
अगली सुबह गांव के लोगों ने हरिनारायण को उसके घर के बाहर बैठे देखा। वह चुप था, उसकी आंखें खाली थीं, और उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी। उसने किसी से कुछ नहीं कहा। पर उस दिन के बाद गांव में अजीब घटनाएं शुरू हो गईं।
लोगों ने शिकायत की कि उन्हें अपने ही विचारों पर भरोसा नहीं रहा। कोई अचानक हिंसक हो जाता, कोई रात में चिल्लाने लगता। धीरे धीरे गांव के कई लोग वैसी ही हालत में दिखने लगे जैसे हरिनारायण की थी।
कुछ दिनों बाद गांव के एक बुजुर्ग ने एक पुरानी किताब में उस प्राणी का जिक्र पाया। उसे पिशाचा कहा गया था, एक ऐसा रात्रि जीव जो इंसान के मन में घुसकर उसके डर और भ्रम को खाकर जीवित रहता है। वह सीधे हमला नहीं करता, बल्कि धीरे धीरे इंसान को अपने कब्जे में लेता है, जब तक कि इंसान खुद उसका हिस्सा न बन जाए।
बुजुर्ग ने यह भी पढ़ा कि जब कोई व्यक्ति पूरी तरह उसके प्रभाव में आ जाता है, तो वह खुद एक नया पिशाचा बन जाता है, और फिर दूसरे लोगों के मन में घुसने लगता है।
गांव वालों ने हरिनारायण को पकड़कर एक कमरे में बंद कर दिया, उम्मीद थी कि शायद उसे बचाया जा सके। पर उस रात जब दरवाजा खोला गया, तो कमरा खाली था। खिड़की बंद थी, दरवाजा बंद था, पर हरिनारायण कहीं नहीं था।
सिर्फ दीवार पर एक खरोंचों से लिखा हुआ वाक्य था, जो खून जैसा दिख रहा था। उसमें लिखा था, अब मैं अकेला नहीं हूं।
उस रात के बाद गांव में किसी ने हरिनारायण को नहीं देखा, पर लोगों को अक्सर अपने कानों के पास वही फुसफुसाहट सुनाई देने लगी। धीरे धीरे, एक एक करके लोग बदलते गए।
और आज भी, अगर किसी को अचानक लगे कि उसके विचार उसके अपने नहीं हैं, अगर उसे बिना वजह डर और गुस्सा आने लगे, तो गांव के बुजुर्ग चुपचाप एक ही बात कहते हैं, वह अभी गया नहीं है, वह बस तुम्हारे अंदर आने का इंतजार कर रहा है।