Double Game - 34 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 34

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 34

महिमा की मुस्कान अब गायब हो चुकी थी। उसने एक गंभीर वकील की तरह फाइल मेज पर रखी और वंशिका की आँखों में झाँका।
"वंशिका, अब भावनाएं छोड़ो और कानून का काला सच सुनो। तुम चाहती हो कि मैं पुलिस भेजूँ और काया को घर से बाहर निकाल दूँ, लेकिन हकीकत इतनी आसान नहीं है। कानून की नज़र में घर अब केवल तुम्हारा नहीं रहा।"
महिमा ने समझाना शुरू किया...  चूँकि भूपेंद्र उस घर का मालिक या सह-मालिक है और काया ने उससे शादी कर ली है (चाहे वह गैर-कानूनी ही क्यों न हो), वह उस घर में घरेलू नातेदारी के तहत रहने का दावा कर सकती है। हम उसे जबरन सड़क पर नहीं फेंक सकते जब तक कि कोर्ट का आदेश न आ जाए। 

वंशिका की आंखों में फिर से आंसू आ गए । 

महिमा ने कहना जारी रखा... "हिंदू कानून में दूसरी शादी शून्य है, लेकिन काया अब वहां से तब तक नहीं हिलेगी जब तक वह खुद न चाहे। अगर हम पुलिस ले भी गए, तो वह रो-धोकर घरेलू हिंसा का कार्ड खेल देगी और कहेगी कि उसके पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं है। कानून अक्सर बेसहारा दिखने वाली औरतों को छत देने के पक्ष में झुक जाता है और उसके पास सच में ही छत नहीं है ।

वंशिका का दिल बैठा जा रहा था सुनकर।

महिमा बोलती जा रही थी.... "तुम दोनों की शादी की मर्यादा वे पहले ही पार कर चुके हैं। अब अगर मैं उन्हें अलग भी कर दूँ, तो भी वे बाज़ नहीं आएंगे। वे छिपकर मिलेंगे, और भूपेंद्र अपनी कमाई का हिस्सा उसे देता रहेगा।"

वंशिका को लग रहा था कि कानून किसके लिए बना है फिर? जिसने उसकी गृहस्थी उजाड़ी वो दोषी होने के बाद भी आधी हिस्सेदार हो गई थी उसकी गृहस्थी में। 

"कानून कहता है कि अगर पति ने दूसरी शादी की है, तो पहली पत्नी तलाक और गुज़ारा भत्ता मांग सकती है। लेकिन अगर तुम घर में साथ रहना चाहो, तो तुम्हें काया की मौजूदगी बर्दाश्त करनी होगी क्योंकि भूपेंद्र अब अपनी आधी कमाई उसे देने के लिए मानसिक रूप से तैयार है।" महिमा ने ठंडी आह भरते हुए कहा, "वंशिका, कड़वा सच यह है कि भारतीय कानून में सज़ा मिलने में बरसों लग जाते हैं। तब तक काया उसी बेड पर सोएगी जिस पर तुम सोती थी, और उसी किचन में खाना बनाएगी जिसे तुमने सजाया था। अगर तुम वहां रुकती हो, तो हर दिन घुट-घुट कर मरोगी। और अगर तुम उसे बाहर निकालना चाहती हो, तो तुम्हें एक लंबी और गंदी कानूनी लड़ाई लड़नी होगी जहाँ वह खुद को पीड़िता साबित करने की कोशिश करेगी।"

वंशिका सन्न रह गई। उसे लगा था कि कानून उसकी ढाल बनेगा, पर यहाँ तो कानून काया के लिए भी दरवाज़े खोल रहा था।

महिमा ने अंत में कहा, "मेरा सुझाव यह है—उस घर का मोह छोड़ो। हम भूपेंद्र की आर्थिक कमर तोड़ेंगे। उसे तलाक के केस में इतना घसीटेंगे कि उसकी प्रमोशन वाली सारी हेकड़ी निकल जाए। जब पैसा खत्म होगा, तो काया खुद उसे लात मारकर भाग जाएगी। याद रखना, काया को घर से निकालना मुश्किल है, लेकिन भूपेंद्र को कंगाल करना आसान है।"

वंशिका ने गहरी सांस ली। उसके भीतर की अबला मर चुकी थी। उसने मेज पर रखे पेन को उठाया और कहा, "ठीक है मैम। उसे घर मुबारक, पर मैं उसे चैन की रोटी नहीं खाने दूँगी। शुरू कीजिये कार्यवाही।"

बाहर सड़क पर वंशिका अपनी गृहस्थी के मलबे पर आंसू बहा रही थी, लेकिन घर के भीतर मंजर बिल्कुल अलग था। काया अब उस बेडरूम में, उसी बेड पर एक नई नवेली दुल्हन की तरह बैठी थी, जहाँ वह पहले ही कई बार भूपेंद्र के साथ सुहागरात मना चुकी थी। कमरे की हवा में अब भी वंशिका के महंगे इत्र की महक बाकी थी, लेकिन काया ने उसे अपनी पसीने और सिंदूर की गंध से ढकने का फैसला कर लिया था।

हॉल में भूपेंद्र अपनी माँ मनोरमा से डांट खा रहा था। मनोरमा चिल्ला रही थीं कि समाज को क्या मुँह दिखाएंगे, लेकिन काया को इन बातों से कोई सरोकार नहीं था। उसे उसका हक मिल चुका था। उसने बेड के मखमली गद्दे को सहलाया और अपनी यादों के झरोखे में झांकने लगी।

काया को वह दिन याद आया जब वह पहली बार इस घर की दहलीज पर आई थी। वाकई, उस वक्त वह कितनी मासूम और निश्छल थी। वह सचमुच बेसहारा थी, पर वंशिका ने उस पर जो अटूट विश्वास किया, वह काया के लिए एक वरदान साबित हुआ। वंशिका ने उसे घर की चाबियां सौंपीं, उसे परिवार का हिस्सा माना और घर की पूरी जिम्मेदारी उस पर छोड़ दी। इसी आजादी ने काया को धीरे-धीरे मजबूत और फिर लालची बना दिया।
जब उसने देखा कि भूपेंद्र छोटी-छोटी जरूरतों के लिए—चाहे वह चाय हो, खाना हो या कपड़ों की तह—पूरी तरह उस पर निर्भर हो चुका है, तो काया के मन में एकाधिकार की भावना जागने लगी। उसे लगने लगा कि इस घर का असली पहिया तो वह है, वंशिका तो बस एक सजावटी सामान है।
इस आग में घी डालने का काम मनोरमा ने किया। वंशिका को नीचा दिखाने और उसे उसकी आधुनिकता के लिए टोकने की होड़ में मनोरमा ने काया को सिर पर चढ़ा लिया था। काया ने बड़ी चतुराई से इस कलह का फायदा उठाया। उसने जानबूझकर घर के हर कोने में अपनी पैठ बना ली थी। उसने सबको अपनी ऐसी आदत लगा दी थी कि उसके बिना घर का एक पत्ता तक नहीं हिलता था।
लेकिन जब वंशिका को खतरे का अहसास हुआ और उसने काया को उसकी औकात दिखानी शुरू की, तो काया का अहं चोट खा गया। वह अपमान बर्दाश्त नहीं कर पाई। उसी दिन उसने ठान लिया था कि वह वंशिका की जगह हड़प कर रहेगी। आखिर उसने इस घर में इतनी मेहनत की है, पसीना बहाया है, तो राज भी वही करेगी।
काया की मजबूरी भी कम नहीं थी। वह पैंतीस उम्र के पड़ाव को पार करने वाली थी। उसकी एक शादी पहले ही टूट चुकी थी। वह जानती थी कि वह पढ़ी-लिखी नहीं है कि कहीं सम्मानजनक नौकरी कर सके। उसके पास न रहने को घर था, न ही कोई ऐसा सहारा जहाँ वह सिर छुपा सके। वह हर ऐरे-गैरे आदमी को अपना जिस्म नहीं सौंप सकती थी। उसे एक सुरक्षित छत और एक कमाने वाला मर्द चाहिए था। जब उसने भूपेंद्र की आँखों में अपने लिए वह आदिम हवस देखी, तो उसे समझ आ गया कि यही वह सुनहरा मौका है। उसने भूपेंद्र की उस कमजोरी को अपना हथियार बनाया। उसने अपने जिस्म के जाल को इतनी बारीकी से बुना कि भूपेंद्र उसमें फड़फड़ाने लगा।
काया ने आईने में खुद को देखा और अपनी माँग के सिंदूर को और गहरा किया। उसने मन ही मन कहा, "वंशिका दीदी, आपने मुझे घर दिया, लेकिन मैंने अपना घर बसाने के लिए आपका उजाड़ दिया। मेरी मजबूरी मेरा वजूद था, और आपका वजूद अब इस घर से खत्म हो चुका है।"

काया अब इस घर की नई मालकिन थी, कम से कम उसे ऐसा ही लग रहा था। उसे नहीं पता था कि जिस कमाऊ मर्द के भरोसे उसने यह महल खड़ा किया है, वह खुद अपनी बुनियाद खो चुका है। उसे अपनी जीत का जश्न मनाने की जल्दी थी, यह जानते हुए भी कि इस जीत की नींव एक औरत के आंसुओं पर रखी गई है।





क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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