Murda Jaag Utha in Hindi Horror Stories by Vedant Kana books and stories PDF | Murda Jaag Utha

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Murda Jaag Utha

पहाड़ों के बीच बसे छोटे से गाँव रामगढ़ में हर तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था। उस रात हवा कुछ अलग थी, जैसे उसमें कोई अनदेखा डर घुला हो। गाँव के लोग जल्दी सो गए थे, क्योंकि पिछले कुछ दिनों से अजीब घटनाएं हो रही थीं। कब्रिस्तान के पास से गुजरने वाले लोगों को रात में किसी के कराहने की आवाज सुनाई देती थी।

गाँव के किनारे एक पुराना कब्रिस्तान था, जहाँ कई साल पहले एक अजनबी आदमी को दफनाया गया था। किसी को उसका नाम तक नहीं पता था। बस इतना पता था कि वह आदमी मरने से पहले बार बार कह रहा था कि वह वापस आएगा। लोग उस बात को पागलपन समझकर भूल गए थे, लेकिन अब वही बात फिर से याद आने लगी थी।

गाँव में एक लड़का था, नाम था मोहन। वह थोड़ा बहादुर और जिज्ञासु था। उसने कई बार उन आवाजों को खुद सुना था। एक दिन उसने अपने पिता से कहा कि वह सच्चाई जानना चाहता है। उसके पिता ने उसे सख्ती से मना किया, लेकिन मोहन के मन में डर से ज्यादा जिज्ञासा थी।

एक रात, जब पूरा गाँव सो रहा था, मोहन चुपके से घर से निकल पड़ा। हाथ में एक छोटी सी लालटेन थी। वह धीरे धीरे कब्रिस्तान की तरफ बढ़ा। जैसे ही वह पास पहुँचा, हवा और ठंडी हो गई। पेड़ों की परछाइयाँ जमीन पर ऐसे फैल रही थीं जैसे कोई उन्हें खींच रहा हो।

कब्रिस्तान के अंदर कदम रखते ही मोहन को एक अजीब सी गंध महसूस हुई। उसने लालटेन ऊँची की और चारों तरफ देखा। सब कुछ शांत था, लेकिन उस शांति में भी एक डर छिपा हुआ था। तभी उसे वही कराहने की आवाज सुनाई दी, जो वह पहले भी सुन चुका था।

आवाज एक खास कब्र की तरफ से आ रही थी। मोहन धीरे धीरे उस तरफ बढ़ा। जैसे ही वह पास पहुँचा, उसने देखा कि उस कब्र की मिट्टी हल्की हल्की हिल रही है। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। वह वहीं खड़ा रह गया, जैसे उसके पैर जम गए हों।

अचानक मिट्टी फटने लगी और अंदर से एक हाथ बाहर निकला। वह हाथ सड़ा हुआ था और उस पर मिट्टी चिपकी हुई थी। मोहन डर के मारे पीछे हटना चाहता था, लेकिन उसका शरीर मानो उसका साथ छोड़ चुका था। कुछ ही पलों में पूरा शरीर बाहर आ गया। वह एक मुर्दा था, जिसकी आँखें बंद थीं, लेकिन उसका चेहरा डरावना था।

फिर धीरे धीरे उसकी आँखें खुलीं। उनमें कोई इंसानी भावना नहीं थी, सिर्फ खालीपन था। वह मुर्दा धीरे धीरे उठकर खड़ा हुआ और सीधे मोहन की तरफ देखने लगा। उसकी चाल बहुत अजीब थी, जैसे हर कदम पर उसका शरीर टूट रहा हो।

मोहन डर के मारे पीछे हटने लगा और फिर अचानक मुड़कर भागा। वह जितनी तेज भाग सकता था, भागता रहा। पीछे से उसे कदमों की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। वह घर पहुँचकर दरवाजा बंद कर लिया और पूरी रात डर से कांपता रहा।

अगली सुबह उसने गाँव वालों को सब कुछ बताया। पहले तो किसी ने उसकी बात पर यकीन नहीं किया, लेकिन जब कुछ लोग कब्रिस्तान गए, तो उन्होंने देखा कि एक कब्र सच में खुली हुई थी और उसके अंदर कुछ नहीं था।

गाँव में डर फैल गया। लोग अब उस जगह के पास जाने से भी डरने लगे। लेकिन असली डर तब सामने आया जब गाँव के एक बुजुर्ग ने मोहन से एक बात पूछी। उसने कहा, “जब तुम भाग रहे थे, तो क्या तुमने पीछे मुड़कर देखा था कि वह मुर्दा तुम्हारे पीछे ही था?”

मोहन ने धीरे से सिर हिलाकर मना किया।

बुजुर्ग ने गहरी साँस ली और कहा, “क्योंकि कल रात गाँव के दूसरे छोर पर रहने वाले रामलाल की भी मौत हो गई। उसके गले पर वही निशान थे जैसे किसी ने उसे पकड़कर दबाया हो। और उसका घर कब्रिस्तान के बिल्कुल उलट दिशा में है।”

यह सुनकर मोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई। अगर मुर्दा उसके पीछे था, तो फिर रामलाल को किसने मारा।

उसी रात, मोहन अपने घर में अकेला बैठा था। उसके पिता बाहर गए हुए थे। अचानक उसे अपने कमरे के बाहर किसी के चलने की आवाज सुनाई दी। वह धीरे से दरवाजे के पास गया और अंदर से झांकने लगा।

बाहर आँगन में कोई खड़ा था। वह मुर्दा नहीं था वह मोहन खुद था। उसी चेहरे के साथ, उसी कपड़ों में, लेकिन उसकी आँखें बिल्कुल खाली थीं।
मोहन का दिल जैसे सीने से बाहर निकलने को था। उसने अपने ही जैसे उस चेहरे को आँगन में खड़ा देखा, जो बिना पलक झपकाए उसे घूर रहा था। उसकी आँखें खाली थीं, जैसे उनमें कोई आत्मा ही न हो। दरवाजा धीरे धीरे चरमराते हुए खुल रहा था और मोहन पीछे हटता जा रहा था।

अचानक वह दूसरा मोहन एक कदम आगे बढ़ा। उसके पैरों की चाल बिलकुल अजीब थी, जैसे वह चल नहीं रहा हो बल्कि किसी अदृश्य ताकत से खींचा जा रहा हो। मोहन ने डर के मारे दरवाजा जोर से बंद कर दिया और पीछे हटकर दीवार से लग गया। उसकी साँसें तेज हो गईं, हाथ काँप रहे थे।

कुछ पल तक बाहर से कोई आवाज नहीं आई। फिर अचानक दरवाजे पर धीरे धीरे दस्तक होने लगी। पहले हल्की, फिर तेज, और फिर इतनी जोर से कि पूरा दरवाजा हिलने लगा। मोहन ने अपने कान बंद कर लिए, लेकिन वह आवाज उसके दिमाग में गूंजती रही।

तभी बाहर से एक आवाज आई, बिल्कुल उसकी अपनी आवाज जैसी, “दरवाजा खोलो मोहन… मैं हूँ… तुम्हारा ही साया…”

मोहन की आँखों में डर साफ दिख रहा था। उसने हिम्मत जुटाई और धीरे से खिड़की की तरफ बढ़ा। उसने परदे के पीछे से झाँककर बाहर देखा। आँगन में वही खड़ा था, लेकिन अब उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी, जो इंसानी नहीं लग रही थी।

अचानक वह चेहरा बदलने लगा। उसकी त्वचा काली पड़ने लगी, आँखें गहरी हो गईं और मुँह से खून टपकने लगा। कुछ ही पलों में वह एक सड़े हुए मुर्दे में बदल गया। वही मुर्दा जो कब्र से बाहर निकला था।

मोहन पीछे हटते हुए गिर पड़ा। तभी दरवाजा खुद ब खुद खुल गया। ठंडी हवा का झोंका अंदर आया और साथ में वह मुर्दा भी।

उसने धीरे धीरे मोहन की तरफ कदम बढ़ाए। हर कदम के साथ जमीन पर खून के निशान बनते जा रहे थे। मोहन ने उठने की कोशिश की, लेकिन उसका शरीर जवाब दे चुका था। मुर्दा उसके बिल्कुल सामने आकर रुक गया और झुककर उसके चेहरे के पास आ गया।

उसकी साँस सड़ी हुई थी और आवाज बहुत धीमी, “तुमने मुझे जगाया है… अब तुम्हें मेरी जगह लेनी होगी…”

अगले ही पल सब कुछ अंधेरा हो गया।

सुबह गाँव वालों ने मोहन के घर का दरवाजा खुला पाया। अंदर मोहन की लाश पड़ी थी, उसकी आँखें पूरी तरह खुली हुई थीं और चेहरे पर डर जमी हुई थी। उसके गले पर गहरे निशान थे, जैसे किसी ने उसे दबाकर मार दिया हो।

लेकिन असली डर अभी बाकी था।

कब्रिस्तान में जाकर लोगों ने देखा कि वह खुली हुई कब्र अब फिर से भरी हुई थी। जैसे किसी को वापस दफनाया गया हो। लेकिन इस बार कब्र पर जो नाम लिखा था, उसे देखकर सबके होश उड़ गए।

उस पर लिखा था, “मोहन”

गाँव में सन्नाटा छा गया। कोई कुछ समझ नहीं पा रहा था। अगर मोहन यहाँ दफन है, तो फिर कल रात उसके घर में क्या था।

उसी रात, कई लोगों ने कब्रिस्तान के पास एक नई आकृति को घूमते हुए देखा। उसकी चाल धीमी थी, शरीर झुका हुआ था और आँखें खाली थीं।

और सबसे डरावनी बात यह थी कि अब वह आवाज फिर से सुनाई देने लगी थी।

धीमी, ठंडी और पहचान में आने वाली।

“दरवाजा खोलो… मैं वापस आ गया हूँ…”