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Akanksha srivastava

Akanksha srivastava

@akankshasrivastava8179


फूटपाथ पर बिकती जिदंगी
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फूटपाथ में ना सिर्फ सामानें बिकती है,
बल्कि यहाँ पर बिकती है, किसी की उम्मीदें,
किसी के सपनें, किसी बेबस, लाचार पिता के अधूरे ख्वाइशें को पूरा कर पाने की चाहतें।
ये उन चेहरे पर खुशियाँ सजाते है, जिनके कदम शायद उन महंगे शोरूमों को कभी पार कर पाते।
यहाँ ना सिर्फ हर रोज दुकानें सजती है,
हर एक दुकान के साथ सजते हैं कितने सारे ख्वाब
वो ख्वाब जिन्हें हकीकत की जमीन मिलना शायद मुकद्दर में ही नहीं।
वो जो कांच के ऊँचे ऊँचे दीवारों के पीछे जो ब्रांडेड कपड़ों के पीछे जो मुस्कुराते हुए टैग है,
उन्हें निहारती वो बेबस, पथरायी आँखों में चमक दे जाती है वो फूटपाथ पर करीने से सजी दुकानें।
जेब में खनकते सिक्के और वो चंद नोटें से भी पूरी हो जाती है वो सारी हसरतें, वो सारे अधूरे ख़्वाब।
सड़क पर बिकती वो सारी चीजें ना सिर्फ सामानें है,
बल्कि इनसे जुड़ी है किसी का सकून किसी का सम्मान।
ये सिर्फ बाजार की रौनक नहीं, उम्मीदों के चमकते सितारे है।
ये दुकानें ही तो उन लाचारों के फरिश्तें प्यारे है।

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आज की नारी
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तुझे निर्भर नहीं स्वयं आत्मनिर्भर बनना है।
यही निर्भरता तेरी गुलामी की निशानी है, जिसे अब ढहना है।
तुझे दूसरों के बल से नहीं अपने आत्मबल से चलना है।
तुझे झुकना नहीं, तुझे लड़ना है, बनकर अडिग अचल।
हर उस परिस्थिति से लड़ जहाँ तुझे समझौता करना पड़े,
तु उठ खड़ी हो ऐसे की सामने मुश्किल भी ना अड़े।
दूसरों की वजह से नहीं खुद की वजह से स्वाभिमानी बन।
पिंजरे की कैद नहीं, तु स्वछंद गगन का जीव बन।
तुझमे है लक्ष्मी - सा वैभव और दुर्गा - सी शक्ति।
तुझमे है भक्ति मीरा- सी और हो तुम राधा सी त्याग की परछाई।
फिर क्यों तुझे झुकना है और क्यों तुझे अब दबना है?
खुले गगन की उड़ान है तू,
तुझे क्यों पिंजरे में थमना है,
सिद्ध कर दे आज की हम औरतें, दर्द देना नहीं जानती।
पर सहना भी अब स्वाभिमान के विरुद्ध है ये दुनिया मानती।
अब ना कोई समझौता होगा, ना कोई लाचारी होगी।
तेरी अपनी शक्ति ही अब तेरी सबसे बड़ी सवारी होगी।

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दिखती है गिनती जब बहुमत खामोश है
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आखिर क्यों अच्छाई पर बुराई भारी दिखाई जाती है,
आखिर क्यों इंसानियत पर गैरियत भारी दिखाई जाती है।
आज भी दुनिया जज्बातों से भरी पड़ी है,
फिर क्यों हर मोड़ पर बेमानी खड़ी है।
आज भी कितने बच्चे चैन त्याग जाते है,
पिता के सपनों को अपनी नींद बना जाते है।
माँ की उम्मीदों से भरे आँचल को अपने सर का ताज बनाते है।
खुद टूटकर भी घर का सपना साध जाते है,
फिर क्यों उन तमाम होनहारों के ऊपर छा जाते है कुछ गिनती के कुपुत्।
जहाँ आज भी सिरों पर, हज़ारों हाथों की छाया है,
और उन हाथों ने अपनत्व भी तो पाया है।
फिर क्यों प्रचारित होता है की वो महज एक लाचार छाया है।
जहाँ आज भी कई घरों में बड़ों से पुछकर पकवान पकते है।
फिर सिर्फ इसे क्यों प्रमुखता दी जाती की वे एक निवाले के लिए तरसते है।
जहाँ बड़ों ने खींची है, मर्यादा की रेखा,
जिसने पीढ़ियों को दिया ,सही राह को लेखा,
फिर क्यों नजर आते है कुछ अमर्यादित आचरण,
जो मिटा देते है संस्कारों का पावन आवरण,
जहाँ आज भी बड़ों के हक का आदर होता है।
संस्कारों से हर रिश्ता और गहरा होता है।
फिर क्यों दिखाये जाते है,
वो गिनती के बच्चे,
जो अवहेलना कर बड़ों के मान को कुचलते।
आखिर किसने हक दिया ,
हमारे अंकुरित होते बीज़ों के मानस पटल पर,
ये गंदगी बिखरने की, नहीं इज़ाज़त होनी चाहिए,
किसी को उस कच्चे मिट्टी के आकारों को बिगाड़ने की।

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हमारे देश के लाल
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कितनी महान होगी वो ममता,
जिसने अपने जिगर के टुकड़े को ,
दुसरो के लिए जीना सिखाया।
कितनी दृढ़ होगी पिता की वो सीख,
जिसने अपने लाल को तलवार नहीं ,
दूसरों की ढाल बनना सिखाया।
कितना विशाल होगा वह हृदय,
जिसने ऐसे दिल को स्वीकार किया,
जिसके सीने में हर धड़कन सिर्फ देश के लिए धड़कता है
कितना मजबूत होगा उस बहन का मन,
जिसे यह भी ज्ञात नहीं की अगली बार उसकी राखी,
उसी कलाई पर सजेगी या नहीं।
कितनी सौभाग्य शाली होगी वो गलियाँ वो घर,
जिसके कण- कण में उस देशभक्त की स्मृतियाँ रची- बसी है।
और कितने बिरले है इस माटी के लाल,
जिन्होंने अपने सुख चैन का त्याग,
हमारी चैन की नींद के लिए कर दिया।
____________आकांक्षा श्रीवास्तव

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गठरी में सिमटा अथाह अपनत्व
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मायके से लौटती बेटी, अपने हाथों में,
एक छोटी सी गठरी लेकर आती है।
पर उस गठरी की कीमत उससे पूछो,
वो महज छोटी- छोटी चीजें नहीं,
वह तो भावनाओं का अथाह समंदर है।
खट्टे - मीठे आचारों की महक,
जो हर कौर के साथ,
बचपन की गलियों में लौटा ले जाए।
छोटी - छोटी निमकियों में गुंथी होती है,
माँ की अनगिनत दुआऐं,
थक जाये जब जीवन पथ तब राह दिखाये।
शकरपारे में घुली वो मिठास ,
जैसे चुपके से समझा रही हो,
रिश्तों में घोलना हर पल मिठास।
और उन नन्ही पन्नी में बंधी चटनिया,
शायद यही समझाती है,
रिश्ते चाहे कितने ही स्वतंत्र क्यों ना हो जाए,
उसमे अपनी उपस्थिति चटनी की तरह जरूर रखना।
ना जाने कितने अनमोल सबक समेटे होती है,
वह छोटी- सी गठरी, माँ की सारी अनकही बातों का सार,
बेटी के जीवन के नाम, एक मौन उपहार।
-----आकांक्षा श्रीवास्तव

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संघर्षों से निखरता जीवन
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अच्छा हुआ जो मिली हमे कठिन राहे,
कदम -कदम पर उलझी कई चाहे|
अगर आसान होता हर एक सफर तो निखरता कैसे जीवन का असर|
अच्छा हुआ जो हाथो मे कठिनाई आई
वरना मेहनत की कीमत कैसे समझ पाई।
रुकवटे आई, पर रोकी नही राह, ठोकरों ने ही दी हमे आगे की चाह|
एक-एक शौक को हमने गॅवाया ,
जिम्मेदारियो को अपना श्वंंगार बनाया।
तब समझ आया जीवन का अर्थ गहरा,
संघर्ष बिना नही होगा जीवन सुनहरा।
बिना ऑधी के उड़ान नही होती,
बिना तपिश के पहचान नही होती।
_____ आकांक्षा श्रीवास्तव

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