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अमृत वचन मन, वचन और काया का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए करें। जब आप दूसरों को सुख देते हैं, तो कुदरत आपको कभी दुःखी नहीं होने देती। - Nitya Oswal
भगवान महावीर स्वामी की वाणी “अहिंसा परमो धर्मः। सव्वे जीवा वि इच्छंति, जीविउं न मरिज्जिउं।।” (अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है। महावीर स्वामी कहते हैं – जैसे तुम्हें अपना जीवन प्यारा है, मरना कोई नहीं चाहता, वैसे ही इस संसार का हर जीव जीना चाहता है, मरना कोई नहीं चाहता। इसलिए किसी भी जीव को कष्ट मत दो।) गहरे अर्थ की व्याख्या इंसान सोचता है कि अहिंसा का मतलब होता है सिर्फ किसी को मारना नहीं है। पर महावीर की अहिंसा बहुत गहरी है। वो कहते हैं कि हिंसा 3 तरह की होती है – मन से, वचन से, और कर्म से। किसी के बारे में बुरा सोचना भी हिंसा है। किसी को गाली देना, ताना मारना, दिल दुखाना भी हिंसा है। और मारना-पीटना तो है ही। असली धर्म मंदिर जाना या माला फेरना नहीं है, असली धर्म है हर जीव के प्रति दया रखना। चींटी से लेकर हाथी तक, दुश्मन से लेकर दोस्त तक – सबकी आत्मा एक जैसी है। जब तक तेरे मन में किसी के लिए भी नफरत है, तब तक तू धार्मिक हो ही नहीं सकता। महावीर कहते हैं – खुद को जीतो, दुनिया अपने आप जीत जाओगे। जीवन प्रसंग : चंडकौशिक नाग का महावीर स्वामी जब घोर तप कर रहे थे, तब एक जंगल से गुजर रहे थे। वहां चंडकौशिक नाम का एक भयानक जहरीला नाग रहता था। वो इतना क्रोधी था कि उसकी फुफकार से ही पक्षी पेड़ से गिरकर मर जाते थे, जिस रास्ते से गुजरता वहां की घास जल जाती थी। पूरा इलाका वीरान हो गया था। लोगों ने महावीर को रोका – “भगवन, उधर मत जाइए, वो नाग आपको डस लेगा।” महावीर मुस्कुराए और उसी रास्ते पर चल दिए। चंडकौशिक ने देखा एक इंसान उसकी तरफ आ रहा है। वो आग-बबूला हो गया। फुफकार मारकर महावीर की तरफ दौड़ा और उनके पैर के अंगूठे पर डस लिया। खून की जगह दूध निकलने लगा। पर महावीर शांत खड़े रहे। न गुस्सा, न डर, न बदले की भावना। उन्होंने नाग की आंखों में करुणा से देखा और बोले – “समझो चंडकौशिक, समझो। बुझे-बुझे, चंडकौशिक बुझे।” ये शब्द सुनते ही नाग का पूरा जन्म-जन्मांतर का हिसाब आंखों के सामने घूम गया। उसे याद आया कि वो पिछले जन्म में एक क्रोधी तपस्वी था जिसने अहंकार में कई जीव मारे थे। महावीर की करुणा और प्रेम ने उसके जहर को अमृत में बदल दिया। वो शांत होकर महावीर के चरणों में लोट गया। फिर उसने खाना-पीना छोड़ दिया। चींटी भी मुंह में चली जाती तो निकाल देता – कहीं जीव-हत्या न हो जाए। कुछ दिन बाद शांत भाव से उसने प्राण त्याग दिए। शास्त्र कहते हैं वो मरकर स्वर्ग में देव बना। प्रसंग से सिद्ध वाणी: महावीर ने दिखा दिया कि अहिंसा का मतलब कायर बनना नहीं है। उन्होंने नाग से नफरत नहीं की, उसे दुश्मन नहीं माना। मन से भी हिंसा नहीं की। अगर वो चाहते तो तप के बल से उसे भस्म कर सकते थे, पर उन्होंने प्रेम से जीता। ये सिद्ध करता है कि “सव्वे जीवा वि इच्छंति जीविउं” — हर जीव जीना चाहता है। नाग भी सुधरना चाहता था, बस उसे करुणा का स्पर्श चाहिए था। विरोधाभास का समाधान लोग पूछते हैं – “महावीर कहते हैं किसी को मत मारो, फिर अर्जुन ने महाभारत में लाखों को मारा। क्या अर्जुन पापी हुआ?” जवाब: “नहीं। अर्जुन को पाप नहीं लगा।” “क्यों?” 1. अर्जुन की नीयत क्या थी? अर्जुन लड़ना ही नहीं चाहता था। गांडीव रख दिया था। बोला “मैं अपने गुरु, भाई, दादा को कैसे मारूं?” उसके मन में नफरत नहीं थी, मोह था। भगवान कृष्ण ने गीता में समझाया “तू सिर्फ निमित्त है। ये पहले से मरे हुए हैं। तू कर्तव्य कर, फल की इच्छा मत कर।” 2. महावीर और अर्जुन “फर्क कहां है?” • चंडकौशिक को महावीर ने नहीं मारा क्योंकि वो सुधर सकता था। करुणा से काम चल गया। • दुर्योधन को अर्जुन ने मारा क्योंकि वो सुधरने वाला नहीं था। 13 साल वनवास, द्रौपदी का चीरहरण, सबके बाद भी अकड़ नहीं गई। अगर अर्जुन युद्ध न करता तो अधर्म जीत जाता, करोड़ों निर्दोष मरते। 3. महावीर का सिद्धांत यहां कैसे लागू हुआ? महावीर ने द्वेष को पाप कहा, कर्तव्य को नहीं। अर्जुन के मन में दुर्योधन के लिए व्यक्तिगत नफरत नहीं थी। वो क्षत्रिय धर्म निभा रहा था – कमजोर की रक्षा, अधर्म का नाश। गीता 2.47 : “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”“तेरा अधिकार सिर्फ कर्म पर है।” अर्जुन ने मन से हिंसा नहीं की। उसने अनासक्त भाव से तीर चलाया। जैसे डॉक्टर ऑपरेशन करता है – दर्द देता है पर मरीज को बचाने के लिए। नीयत मारने की नहीं, धर्म बचाने की थी। व्यावहारिक उदाहरण 1. पुलिस वाला अपराधी को गोली मारता है। क्या वो हत्यारा है? नहीं। अगर नीयत जनता को बचाने की है, तो वो धर्म कर रहा है। पर अगर वर्दी की आड़ में बदला ले रहा है, तो पाप है। 2. आप रास्ते से जा रहे है, कोई गुंडा लड़की छेड़ रहा है। आप उसे 2 थप्पड़ मारकर भगाते है। क्या आपने हिंसा की ? नहीं। आपने एक बड़ी हिंसा रोकी। ये अहिंसा है। पर अगर आप अहंकार में आकर उसे अधमरा कर दो, तो वो हिंसा बन गई। महावीर + अर्जुन का संगम - मुख्य सीख ★ पाप कर्म में नहीं, कर्तव्य भाव में है। नफरत से चींटी मारो तो पाप, करुणा से युद्ध करो तो धर्म। ★ अहिंसा का मतलब कायरता नहीं। चंडकौशिक सुधर सकता था तो प्रेम से जीतो। दुर्योधन नहीं सुधर सकता तो धर्म के लिए लड़ो। ★ खुद से पूछो : मैं ये क्यों कर रहा हूं? जवाब में ‘मैं’ ‘मेरा’ ‘बदला’ है तो रुको। जवाब में ‘धर्म’ ‘कर्तव्य’ ‘रक्षा’ है तो कर दो। ★ महावीर का सार : मन को हिंसा से खाली कर दो। फिर चाहे नाग के सामने खड़े हो या कुरुक्षेत्र में – तुम अहिंसक ही रहोगे। आज की पावन प्रार्थना “हे महावीर, हे माधव, मुझे ऐसी बुद्धि दे कि मैं कब करुणा से जीतूं और कब धर्म के लिए लड़ूं, ये समझ सकूं। मेरे हर कर्म के पीछे द्वेष न हो, बस कर्तव्य हो। मेरे मन-वचन-कर्म से अहिंसा बहे, चाहे मैं मौन बैठा हूं या युद्ध लड़ रहा हूं। मिच्छामि दुक्कडम्।”
दिव्य संदेश जब भी जीवन में कोई विकट परिस्थिति सामने आए, तो सबसे पहले यह स्वीकार कर लें कि यह आपके ही किसी पुराने कर्म का हिसाब चुकता करने आई है। इस दुनिया में कोई भी संयोग स्थायी नहीं है, जो आया है उसका जाना निश्चित है। संकट के समय घबराने की बजाय शांत रहकर उसे केवल बीतते हुए देखें। परिस्थिति को दोषी मानना बंद करें, यह सब 'व्यवस्थित' के नियम से है। टकराव में उलझने की बजाय समता भाव से रास्ता निकालना ही मुश्किलों से मुक्ति की चाबी है।
विपरीत परिस्थितियां ही नए जीवन की शुरुआत हैं! ✨🌱 जब जीवन में हर तरफ से असफलता, मानसिक तनाव या अकेलापन घेर ले, तो निराश न हों। प्रकृति का एक नियम याद रखिए— “एक बीज को भी नया जीवन पाने के लिए सबसे पहले मिट्टी के गहरे अंधकार में टूटना पड़ता है।” ★आज का आध्यात्मिक विचार: हमारे जीवन में आने वाले दुख केवल हमारे पुराने कर्मों का हिसाब चुकता करने आते हैं। दुख का आना इस बात का संकेत है कि पुराना हिसाब ख़त्म हो रहा है और अब एक नया, सुंदर अध्याय शुरू होने वाला है। ★परम पूज्य दादा भगवान का सूत्र: “जो हो गया सो न्याय।”भूतकाल को बदला नहीं जा सकता, लेकिन वर्तमान को संभालकर भविष्य को दिव्य बनाया जा सकता है। आज का संकल्प: मैं अपने बीते हुए कल (Past) का कैदी नहीं हूँ। मैं ईश्वर का अंश हूँ, और हर परिस्थिति से बाहर निकलने की शक्ति मेरे भीतर है। #SpiritualAwaking #InnerStrength #Positivity #DadaBhagwan #MentalPeace #NewBeginning
नकारात्मक विचारों से मुक्ति क्या आप हर समय बहुत अधिक सोचते हैं? क्या अनचाहे और नकारात्मक विचार आपके मानसिक संतुलन को प्रभावित कर रहे हैं? “नकारात्मक विचारों से मुक्ति के उपाय” एक ऐसी व्यावहारिक मार्गदर्शिका है जो आपके मन को अशांत करने वाली कड़ियों को तोड़ने में मदद करती है। यह पुस्तक केवल समस्याओं पर बात नहीं करती, बल्कि दैनिक जीवन में अपनाए जा सकने वाले आसान और वैज्ञानिक उपाय प्रदान करती है। https://www.matrubharti.com/book/19994194/nakaratmak-vicharo-se-mukti-1
OCD से मुक्ति “क्या आप भी ताले को बार-बार चेक करते हैं, या हाथ धोने के बाद भी गंदगी का वहम रहता है? यहाँ तक कि कई बार भगवान या पूजनीय लोगों के प्रति भी मन में अनचाहे और डरावने विचार आने लगते हैं, जिससे इंसान ग्लानि (गुिल्ट) से भर जाता है। भारत की करीब 1% आबादी इस OCD (मनोग्रसित-बाध्यता विकार) से जूझ रही है, लेकिन लोग इसे महज़ एक आदत या पाप मान बैठते हैं। इस लेख में हमने बेहद सरल उदाहरणों के साथ दिमाग को गुलाम बनाने वाले इसी अदृश्य चक्र को डिकोड किया है। एक विशेष तालिका (Table) के ज़रिए जानिए सामान्य आदत और इस बीमारी के बीच का वो महीन अंतर, जो हर किसी को पता होना चाहिए। क्या वाकई इस मानसिक उलझन का वैज्ञानिक इलाज संभव है? अपनी या अपने अपनों की शांति के लिए अभी पूरा लेख पढ़ें!” https://www.matrubharti.com/book/19994085/ocd-se-mukti-1
तनाव और डिप्रेशन से मुक्ति आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव और डिप्रेशन साइलेंट किलर बन चुके हैं। यह सिर्फ सामान्य उदासी नहीं, बल्कि एक गहरी मानसिक लड़ाई है जो किसी को भी तोड़ सकती है। लेकिन याद रखिए, डिप्रेशन आपकी कमजोरी नहीं बल्कि इस बात का संकेत है कि आप बहुत लंबे समय से अकेले मजबूत बने रहने की कोशिश कर रहे थे। अब वक्त हार मानने का नहीं, बल्कि एक शानदार शुरुआत करने का है। यह लेख आपको निराशा के अंधेरे से निकालकर सकारात्मकता के उजाले में ले जाएगा जहां आप सामान्य मानसिक थकान और डिप्रेशन के बीच के छिपे हुए लक्षणों को पहचानना सीखेंगे। इसके साथ ही आप यह भी जान पाएंगे कि रोजमर्रा की जिंदगी का दबाव और हार्मोनल बदलाव हमारी मानसिक सेहत को कैसे प्रभावित करते हैं। इस लेख में दिमाग को शांत करने वाली तकनीकों, योग, सही डाइट और ‘नो’ कहने की आदत जैसे अचूक उपायों को बहुत ही सरल तरीके से समझाया गया है। यह व्यावहारिक गाइड आपको रोजमर्रा की उन 3 आदतों से रूबरू कराएगा जो आपके खोए हुए आत्मविश्वास को वापस ला सकती हैं और आपको बिना झिझक के थेरेपिस्ट या अपनों से बात करने की ताकत देगी। यह सिर्फ एक आर्टिकल नहीं है बल्कि आपकी जिंदगी बदलने वाला एक जरिया है जो आपको मानसिक रूप से मजबूत बनाना सिखाता है। उठिए, इस लेख को पूरा पढ़िए, अपने मन के बोझ को कम कीजिए और अपनी जिंदगी की कमान फिर से अपने हाथों में लीजिए। https://www.matrubharti.com/book/19993939/tanaav-aur-depression-se-mukti-1
क्या आप जानते हैं कि चिलचिलाती धूप में बूंद-बूंद पानी के लिए तड़पते बेजुबानों को अनदेखा करना हमारी इंसानियत पर कितना बड़ा सवाल है? हमारे वेदों के परम ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ सिद्धांत और गरुड़ व स्कंद पुराण के उन पवित्र सत्यों को उजागर करता यह लेख, सीधे आपकी चेतना को झकझोर देगा कि क्यों हमारे पूर्वजों ने ‘भूत यज्ञ’ को हर गृहस्थ के लिए एक अनिवार्य कर्तव्य बनाया था। यह सिर्फ एक लेख नहीं, बल्कि भीषण गर्मी में दम तोड़ते मूक प्राणियों की मर्मस्पर्शी पुकार और साक्षात ईश्वर की सेवा का वह दिव्य मार्ग है जिससे हर मनुष्य को जुड़ना चाहिए। चिलचिलाती धूप के इस दौर में आपका एक छोटा सा संवेदनशील प्रयास कैसे किसी बेजुबान के लिए जीवनदान और आपके जीवन के लिए अक्षय पुण्य का वरदान बन सकता है, यह जानने के लिए इस विशेष प्रस्तुति को पूरा पढ़ें और बेजुबानों के मददगार बनें। https://www.matrubharti.com/book/19992956/n-a
क्या आप भी दूसरों के व्यवहार से दुखी हैं? जानिए दादा भगवान का जादुई समाधान!" “अक्सर हम दूसरों को अपनी तकलीफों का जिम्मेदार मानते हैं, लेकिन जब नज़रिया बदलता है, तो जीवन बदल जाता है। दादा भगवान के विज्ञान से मिली इस अनमोल समझ को पढ़ें और साझा करें। 🙏✨” “क्या कभी आपको ऐसा लगा है कि आपकी शांति की चाबी दूसरों के हाथों में है? कोई कुछ कह देता है और आप घंटों परेशान रहते हैं?” अक्सर हम अपनी तकलीफों का दोष दूसरों को देते हैं, लेकिन दादा भगवान के ‘अक्रम विज्ञान’ ने मुझे एक ऐसी समझ दी है जिसने मेरे जीने का अंदाज़ा ही बदल दिया। कैसे हमारा अपना ‘कर्म’ और सामने वाला ‘निमित्त’ मिलकर काम करते हैं? कैसे एक छोटी सी प्रार्थना और माफी हमारे भारी से भारी कर्म को हल्का कर सकती है? अपनी शांति वापस पाने और रिश्तों को एक नई गहराई देने के लिए, इस लेख को अंत तक ज़रूर पढ़ें। यह आपकी सोच और आपके जीवन, दोनों को बदल सकता है। 👇 अक्सर जब कोई हमें दुःख देता है या हम पर बिना वजह चिल्लाता है, तो हमारा मन कहता है— “गलती उसकी है, वह कितना बुरा है।” लेकिन क्या वाकई ऐसा है? आध्यात्मिक विज्ञान (अक्रम विज्ञान) के अनुसार, जीवन के कठिन प्रसंगों को सुलझाने की एक अद्भुत चाबी मिली है, जो मैं आप सभी के साथ साझा करना चाहती हूँ। 1. सामने वाला कौन है? हमें लगता है कि सामने वाला व्यक्ति हमें दुःख दे रहा है, लेकिन हकीकत में वह सिर्फ एक ‘निमित्त’ (Postman) है। मेरे ही किसी पुराने कर्म का हिसाब चुकता करने के लिए कुदरत ने उसे एक साधन बनाया है। दादा भगवान कहते हैं— “भुगते उसकी भूल।” यानी जो आज दुःख भोग रहा है, गलती (हिसाब) उसी की है। जैसे ही हम सामने वाले को निर्दोष देखते हैं, हमारा आधा बोझ उतर जाता है। २. बाहर से कड़क, अंदर से नर्म अक्सर लोग पूछते हैं— “अगर हम सबको निर्दोष देखकर माफ करेंगे, तो लोग हमारा फायदा उठाएंगे।” यहाँ समझ की ज़रूरत है। हमें अंदर से सामने वाले को निर्दोष मानना है ताकि हमारा द्वेष खत्म हो, लेकिन बाहर से व्यवहार में हम ‘कड़क’ हो सकते हैं। जैसे एक माँ बच्चे को सुधारने के लिए नाटक की तरह कड़क होती है, वैसे ही हम अपनी सीमाएं तय कर सकते हैं, पर मन में कड़वाहट रखे बिना। ३. प्रार्थना और जागृति का जादू रोजाना की एक छोटी सी प्रार्थना हमारे जीवन की दिशा बदल सकती है: “हे अंतर्यामी परमात्मा! मुझसे मन, वचन, काया से किसी भी जीव को किंचित मात्र भी दुःख न हो, ऐसी मुझे शक्ति दीजिए।” यह प्रार्थना हमारे भविष्य के नए कर्मों को बांधने से रोकती है। भले ही पुराना स्वभाव (गुस्सा) कभी-कभी बाहर आ जाए, लेकिन अगर हम तुरंत जान लेते हैं कि “यह गलत हुआ”, तो हमारी जागृति शुरू हो जाती है। ४. अपनी भूलों की सफाई (प्रतिक्रमण) जब भी हमसे कोई गलती हो या मन में किसी के प्रति बुरे विचार आएं, तो तुरंत मन ही मन माफ़ी मांग लें: “मैं आपके भीतर बैठे शुद्धात्मा से क्षमा मांगता हूँ, मुझसे गलती हो गई, ऐसा नहीं होना चाहिए।” जब हम अपनी गलती का पक्ष लेना छोड़ देते हैं और दोबारा न करने का निश्चय करते हैं, तो कर्म की जड़ कट जाती है। निष्कर्ष: बदला लेने से हिसाब बढ़ता है, और माफ़ करने (प्रतिक्रमण) से हिसाब चुकता होता है। अपनी सोच बदलें, जीवन अपने आप शांत हो जाएगा। यह मेरी अपनी समझ है जो मैंने आध्यात्मिक चर्चा के माध्यम से सीखी, उम्मीद है यह आपके भी काम आ
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