The Download Link has been successfully sent to your Mobile Number. Please Download the App.
Continue log in with
By clicking Log In, you agree to Matrubharti "Terms of Use" and "Privacy Policy"
Verification
Download App
Get a link to download app
कविता : “स्वार्थ में भी प्रेम हैं ” मैं मानता हूँ, दुनिया में कुछ भी निःस्वार्थ नहीं, हर मुस्कान के पीछे भी एक ख्वाहिश कहीं छिपी रही। तुम्हें चाहना भी शायद मेरी आदत बन गई, क्योंकि तुम्हारे साथ रहकर ही मेरी दुनिया सज गई। मैं कहूँ “मैं तुमसे बेइंतहा प्यार करता हूँ”, तो सच ये है — मैं खुद को तुममें खोजता हूँ। तुम्हारी हँसी से मेरा दिल सुकून पाता है, तुम्हारे आँचल में ही मैं अपना घर बसाता हूँ। मैं तुम्हें चाहता हूँ, क्योंकि तुम मुझे अच्छा लगाते हो, तुम्हारे बिना मेरे दिन अधूरे रह जाते हो। शायद ये प्यार भी एक मीठा सा स्वार्थ है, जिसमें मैं खुद को हर रोज़ बचा ले जाता हूँ। फिर भी, इस स्वार्थ में जो अपनापन है, वही तो प्यार की सबसे खूबसूरत पहचान है। अगर तुम्हारे साथ रहकर मैं मुस्कुरा लूँ, तो यही मेरा सबसे सच्चा इम्तिहान है। पल्लव सान्याल
कविता: तुम होती "काश तुम होती, मुझे समझ पाती, मेरी खामोशी को पढ़ लेती। काश तुम होती, मुझसे कहती, दिल की बातों को नजर से सुनती। मेरे बारे में थोड़ा जान लेती, मेरी पीड़ा को पहचान लेती। तुम तो समय हो, बहते हुए मिले , तुम्हें क्या फर्क पड़ता है, रुके या चले। मैं तुम्हारे पीछे दौड़ रहा हूँ, हर दिन खुद को भुला रहा हूँ। अगर कभी तुम मेरे पीछे आती, तो मेरी थकान मिट जाती। यही है भाग-दौड़ का जीवन, हर चेहरे के पीछे छिपा है एक सावन। भीड़ में रहकर भी मैं तन्हा हूँ, अपने ही साए से अनजान हूँ। यार, मैं सच में अकेला हूँ, बिना आवाज़ का सवाल हूँ। कोई बस एक बार पूछे, “कैसे हो?” — मन कहता है बहुत अच्छे ।" पल्लव सान्याल
कविता:हे रात… हे रात, तुम क्या जानती हो तुम्हारी गोद में जागते सब , वे नींद में नहीं होते —वे अपने को दफ़्न कर रहे होते हैं कब। उनकी सीने में दुख का अथाह सागर, उनकी धड़कन में जलती तेज लौ का अथाह डागर , हर साँस के साथ चलती उतरती अनकही सी मौत को वो निहारती। वे आसमान के चमकीले तारे नहीं हैं, जो खुलकर चमक सकें, वे बुझती-बुझती लौ हैं जो काँपते-काँपते थम जाती हैं। खुशियाँ कब की राख हुईं, हँसी बस एक दिखावा हुई, विनाश के उस मोड़ पर खतम हुआ है उनका उस ठोर पर। ज़िंदा लोग अँधेरे से डरते हैं, उन्हें भोर का इंतज़ार रहते है, पर जिनके भीतर सूरज मरते है, वे हर पल अँधकार सहते है। लाशों की कोई सुबह नहीं है, न कोई नया खिलता सवेरा है, उनके हिस्से में लिख दी गई अनंत रात का एक डेरा है। इसलिए हे रात, समझ लो तुम, जो तुम्हारा हाथ कसके थामे हैं, वे इस दुनिया में जीते नहीं हैं, बस साँसों का बोझ उठाए रखते हैं। चलते-फिरते साए हैं वे, जिनमें जीवन की कोई आह नहीं है, नाम भले ही इंसान का ये— हक़ीक़त में साँस लेती वह लाश हैं। पल्लव सान्याल
कविता: कल का क्या भरोसा कल का क्या भरोसा है, किसी की ज़िंदगी छोटी, किसी की लंबी होती है, मौत कभी किसी के दरवाज़े पर दस्तक देती है, तो कभी किसी के सिरहाने खामोशी से खड़ी होती है। कौन जानता है किसके हिस्से में कल का सूरज उगेगा भी या नहीं उगेगा… आज तुम मुझसे मुँह फुलाकर बैठे हो, पर क्या पता कल मैं तुम्हारे सामने खड़ा हो पाऊँगा भी या नहीं। दिल से जुड़े रिश्तों को यूँ ही ग़लतफ़हमियों के हवाले मत करो, ये रिश्ते काँच की तरह होते हैं, एक दरार पूरी आवाज़ बदल देती है। मन-मुटाव की इस गाँठ को इतना कसकर मत बाँधो, कभी-कभी ढीली डोर में ही रिश्ते साँस लेते हैं। तुमने मुझसे बात करना छोड़ दिया— मगर मिला क्या तुम्हें? वक़्त तो रेत है, मुट्ठी कसो या खोलो, फिसल ही जाता है। आज जो पास है वो ही कल सबसे दूर होगा, तुम आवाज़ लगाते रह जाओगे और हम यादों की धुंध में बहुत आगे निकल चुके होंगे। मैं तुमसे बहुत दूर जा रहा हूँ… शायद लौटूँ, शायद कभी मिल भी जाऊँ, या शायद सिर्फ़ एक अधूरी याद बन जाऊँ। अगर फिर मुलाक़ात न हो सके, तो बस इतना याद रखना— मैंने तुम्हें दिल से चाहा था, और जाते-जाते तुम्हारी ख़ुशी की दुआ साथ ले जा रहा हूँ। तुम खुश रहना… यही मेरी आख़िरी ख़ामोश विनती है। पल्लव सान्याल
कविता: क्षितिज उस क्षितिज के पीछे तुम्हारी आँखें उभरती हैं, गहरे नीरव समुंदर में सुनहरी यादें तरलीत हैं। शाम ने तुम्हारे पलक पोंछ कर सूरज को चूम लिया, और एक अकेला आँसू सागर की तरफ़ चल दिया। 😢 नीला आसमान भी ठहर सा गया, सांसें छीनती गई, तुम्हारी नज़रों में डूबते , छलकते हर आंसे टिकती हुईं। लहरों पर टिके हुए मीठे वादों के टुकड़े बिखरते हुए, पुराने कल की ख़ामोशी में नव गीत अब सुनते हुए। हर सूरज उतरते ही कुछ मिसालें चमक बन जाती हैं, तुम्हारी आँखे, आँचल में ढले हुए सितारे मील जाती हैं। धुंधली सी परछाई सी छिपती है चेहरे के किनारों पर, और मैं गिनता हूँ उन लम्हों को जो तुमसे गुज़रे हारों पर। चाहत की लहरों ने किनारे पर ख़ामोशी लिख दी, शब्द टूटे पर एहसासों ने फिर मुस्कान की इबादत खड़ी की। रात की चादर जब पानी पर धीरे-धीरे चलती है, सूरज के पीछे से जैसे छाया और रौशनी मचलती है। आँसू बनकर सूरज समुन्दर में गिरता है मगर जलता नहीं, वह ताप और याद दोनों का संगम है — संभलता तो है मगर मुश्किल नहीं। पर हर सुबह की किरण ये सिखाती है फिर से उठना, क्योंकि किनारा इंतज़ार करती है, और आँखें फिर से देखना। 🌅
Copyright © 2026, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved.
Please enable javascript on your browser