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नही स्नेह अब बातों में, पहचान नहीं किन्हीं आँखों में। अपनत्व नहीं अब दिखता है, हर शक्स अजनबी लगता है। समझदार बन बैठेे हैं , रहा प्रेम का अर्थ नहीं। पहले जैसे श्नेह देने मे , प्राणी अब समर्थ नही। जिसने गैरो को अपनाया था , नित नित प्रेम लुटाया था। चाची ,भैया ,माई ,कह कर बस रिश्ते बन जाते थे, अपने ना होकर भी जो अपनो सा प्रेम जताते थे। रही ना अब वो बात कहीं, लगता अब ना देश वही prachi.... - Prachi Pandey
लगा जब से सावन जग शिव मय हुआ, रहा ना कुछ अधूरा मन निर्भय हुआ। शांति ,सुकून, स्वकच्छंद हरियाली, बिखरी है खुशिया हर डाली डाली। ना कोई आशा ना अभिलाषा किसी की, मैं करू पूजा और भक्ति उसकी। मांगू क्या मै उससे जो सबका पिता है, पाता उसे सबकुछ वह सब जनता है। भला क्या, बुरा क्या, ये मै क्या ही जानू, मुझसे ही बेहतर मुझे मेरा प्रभु जानता है। prachi.....
लाख पीट लो छाती लगालो झूठो की करतारे सच नही छिपता कितना भी चाहे झूठ पैर पसारे धरा यही रह जायेगा सब कुछ ना ले जा पाओगे एक दिन सब खो जायेगा बचा नही कुछ पाओगे prachi...
खूबसूरत है तू ये कहते सभी है, हम कहते है एक खूबसूरत तू ही बातें सभी अक्सर करते तेरी हैं हम करते है एक बातें तेरी ही मानते है तुझ सभीे अपनो सा हमारा तो एक अपना तु ही है
मन चंचल इत उत नित भागत, नैनहीं नींद भरी यह जागत, लावत नित नव नव उत्कंठा, रचत भरत यह नित नूतन पंथा, सोच न इसको हमरे तन की, करत रहत अपने ही मन की, रोक टोक इसको ना भावे, अपनी कहे बस वही सुनावे,
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