लगा जब से सावन जग शिव मय हुआ,
रहा ना कुछ अधूरा मन निर्भय हुआ।
शांति ,सुकून, स्वकच्छंद हरियाली,
बिखरी है खुशिया हर डाली डाली।
ना कोई आशा ना अभिलाषा किसी की,
मैं करू पूजा और भक्ति उसकी।
मांगू क्या मै उससे जो सबका पिता है,
पाता उसे सबकुछ वह सब जनता है।
भला क्या, बुरा क्या, ये मै क्या ही जानू,
मुझसे ही बेहतर मुझे मेरा प्रभु जानता है।
prachi.....