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गुजर रही है जो मुझ पर, अब किसको मैं बताऊँ, अपना हाल-ए-दिल, अब किसको मैं सुनाऊं। रूठा जो तु मुझसे, रूठी मेरी हर खुदाई, टूटे हुए ख्वाबों का ये मंज़र, अब किसको में दिखाऊ। गुजर रही है जो मुझ पर, अब किसको मैं बताऊँ।। बीत रहे हैं लम्हे, या उन लम्हों में बीतता हूँ मैं। भूली बिसरी तेरी यादों की तस्वीरें, बस जोड़ता हूँ मैं। तेरी वो हँसी, तेरी हर अठखेलियां याद है मुझे। किस्से अपने मोहब्बत की अब गीतों में पिरोता हूँ मैं। अश्कों की स्याही से लिखी दास्तां, अब किसको मैं पढ़ाऊं। गुजर रही है जो मुझ पर अब किसको मैं बताऊँ।। मिले तुम्हें तमाम खुशियां, हमले तो थामा दर्द का दामन है। मिट जाना तेरे इश्क में, मेरी दीवानगी का आलम है। तन्हा सा, बिखरा हुआ, खोखला सा मैं। गए जहाँ तुम मुझे छोड़ कर, रूह मेरी अब भी वही कायम है। तुम बिन मेरे दिल का वो सुकून, अब कैसे मैं पाऊं।। गुजर रही है जो मुझ पर अब किसको मैं बताऊँ अपना हाल ए दिल अब किसको मैं सुनाऊॅ।।
अलीबाग की अधूरी शाम Written By: Vikash Viplao की होती अगर ये फ़िल्म कोई, या मेरी किसी कहानी का संसार… तो इस तरह अधूरी ना होती, ना होती यूँ बेज़ार। होती तू हीरोइन उसकी, और मैं उसका दीवाना हीरो… सात समुंदर पार करके भी आ जाता मैं तेरे द्वार। आँखों में भर लेता तुम्हें, जैसे सदियों से बस इसी मंज़र का था इंतज़ार… और धीरे से थाम हाथ तेरा, करता तेरे चाँद जैसे चेहरे का दीदार। बिठा के तुझे अपनी बुलेट पे, निकलता मैं भीड़ से दूर उस पार… जहाँ सड़कें भी धीरे चलतीं, और हवा भी चखती बस तेरा ख़ुमार। कभी तू कंधे पे सर रख देती, कभी ज़ुल्फ़ें उड़ा देता समुंदरी बयार… और मैं हर मोड़ पे बस ये सोचता, काश ठहर जाए कहीं ये सफ़र मेरे यार। अलीबाग के उस सी फोर्ट पे बैठ जाते लेकर आँखों में ख़याल हज़ार… हाथ में गरम चाय की प्याली होती, और होता लहरों की गुमशुदा ख़ामोशी का संसार। बालों को सँभालते हुए तू करती कुछ आधी-अधूरी बातें बार-बार… हर ख़ामोशी तेरी जैसे कोई नज़्म हो, वैसे पढ़ता मैं उनका सार। पर ज़िंदगी को शायद मुकम्मल कहानियों से नहीं है प्यार… इसलिए तो कुछ सफ़र बस दिल में रहते हैं, और यादें बन फिरते रहते हैं बेक़रार। शायद कल भी जब समुंदर देखूँगा, तो महसूस होगा वही पुराना अँधकार… जैसे अलीबाग की वो हर अधूरी शाम उम्र भर करती रहेगी हमारा इंतज़ार।
इश्क के सात रंग Seven Stages of Love इश्क़ की एक काव्यात्मक यात्रा—पहली नज़र की दिलकशी से उन्स, इश्क़, अक़ीदत, इबादत और जुनून से गुज़रते हुए मौत यानी फ़ना तक। Written By: Vikash Viplao Stage 1 — दिलकशी / आकर्षण ख़ता तो थी गुस्ताख़ नज़र की… इल्ज़ाम-ए-उल्फ़त में पर दिल गोया गुनाहगार हुआ। देख झलक उस नूरानी चेहरे की हादसा ये दिलकशी का 'विप्लव' साथ मेरे सरेबाज़ार हुआ।। Stage 2 — उन्स / लगाव ख़बर नहीं, इस ख़ुमारी की वजह का 'साक़ी', मालूम नहीं, थी हक़ीक़त या बस एक ख़्वाब। वो पलकों का झुकना, उन अँखियों का तकना, अब्र-ए-सियाह से वो केशु, लब जैसे थे गुलाब। बयाँ उन्स का अपनी अब कैसे करे 'विप्लव, ख़ुश-बाश में उनकी, दिल-फ़रेब बेकरार हुआ।। Stage 3 — इश्क़ अदाएँ कर गईं उसकी असर कुछ इस क़दर रुख़ लिया हसरतों ने फ़लक तक पंख फैलाए अंजान था दिल की ख़्वाहिशों से जो बाद-ए-सबा में दिल्लगी में महबूब की रहता अब अफ़साने सुनाए पूछते फिरते हवाओं से उनका ठिकाना ऐ 'विप्लव' इब्तिदा-ए-इश्क़ में गुम, कुछ यूँ तेरा इंतज़ार हुआ।। Stage 4 — अक़ीदत / श्रद्धा कुबूल हमें चाँद भी और उसके दाग़ भी, रज़ा ख़ुदाई लुटाए बैठे हैं अपनी दिलबर की पनाह में तशरीह उनसे राब्ता का फिर भी कैसे करें हम रुसवा ना हो जाए मोहब्बत महफ़िल की निगाह में रूबरू हो तो जाते गुज़रते उनकी गलियों से 'विप्लव' मजबूरियों से उनकी हर दफ़ा पर जो ना बेज़ार हुआ।। Stage 5 — इबादत / आराधना इतराते रूहानी अँखियों का फ़ितूर चढ़ा कुछ ऐसा ज़िक्र-ए-यार से ही तो अब इस रूह का क़रार है शिकवा करूँ भी कैसे उस सितमगर की रंजिश का रिवायतें इश्क़ की हमसे क्या कुछ कम नागवार है बेगाना कहे वो मुझको अपना दीवाना भी 'विप्लव' इबादत में वादा-ए-निबाह का कैसा ये इख़्तियार हुआ।। Stage 6 — जुनून / दीवानगी पैवस्त हुआ जबसे वो रग-ए-जाँ में यूँ लहू की तरह चुभती तन्हाइयाँ, ये वीरानियाँ ही हासिल-ए-जूनून हैं भाने लगी उसे अब ये वहशत बिस्तर की सिलवटें भी रात की सियाही से लिखी बेचैन साँसें उसका सुकून है इत्तिफ़ाक़ देखो उसके वहम कि दिवानगी का 'विप्लव' कतरा-कतरा वो पिघला, फिर भी रक़िब गुलजार हुआ।। Stage 7 — मौत / मृत्यु कसूर उसका ताउम्र नज़्र-ए-इश्क़ में बस इतना सा रहा साँस जाती रही जिसकी ख़ातिर वो कभी उसका ना रहा क़सीदे मोहब्बत के ज़माना पढ़ेगा जब क़यामत के रोज़ खुलेंगे जहाँ आशिक़ी के पन्ने, आँख रोएँगी, रूह हँसेगी लड़ता रहा परवाना ख़ुदा से आसमाँ के पार भी 'विप्लव' ख़ाक था दरिया-ए-इश्क़ में, पर शमा का ना दीदार हुआ।।
ऐ मेरे मनमीत, बस ये बता जा, कहाँ से लाऊँ इतना सब्र, ये सिखा जा। कि तुझसे बातें न हों, मुलाक़ात न हो, और मुझे फ़र्क़ न पड़े—इतना बेपरवाह बना जा।
दिल टूट गया.... कोई बात नहीं हाथ छूट गया.... कोई बात नहीं साथ छूट गया.... कोई बात नहीं मैं राह, तू राही.... कोई बात नहीं मैं रास्ता, तू मंज़िल.... कोई बात नहीं तू समन्दर, मैं साहिल... तू समझदार, मैं जाहिल... तू कायनात, तू जगत... तू हर जगह सही, और मैं हर जगह ग़लत! पर याद रखना... एक वक़्त ऐसा भी आएगा, जब मैं हँसूँगा और तू रोएगी... और ना भी रोई ना... तो कोई बात नहीं।
“मिलोगी क्या... एक आख़िरी बार और, बस गले लग कर बिछड़ना है, इस दबे शोर में 'विप्लव'... ख़ामोशी से टूट के बिखरना है।। ”
एक चेहरा… एक जज़्बात… एक चाहत… एक तमन्ना… और… कुछ अधूरी ख़्वाहिशें। काश अपनी वो मोहब्बत… ये गुज़ारिश मुकम्मल हो जाती… पर हर दुआ ... कामिल होने के लिए नहीं होतीं। धीरे-धीरे दिल में आग़ाज़ लेती है, ख़ामोशी से धड़कनों में पलती है… और फिर बस उम्रभर… एक नाक़िस नज़्म की तरह, तन्हाइयों में गूँजती है।
तस्वीरें तो उन लोगों को सँभालनी पड़ती हैं, जिन्हें भूल जाने का डर हो। मैं उसे तस्वीरों में नहीं रखता, वो तो मेरी हर धड़कन में रहती है। आँखें बंद करूँ तो सामने आ जाती है, आँखें खोलूँ तो अंदर बैठी मिलती है। उसे देखने के लिए अब तस्वीर की ज़रूरत नहीं पड़ती, क्योंकि वो मेरी यादों में नहीं रहती... वो तो मेरी रूह के पते पर शिफ़्ट हो चुकी है।
शीर्षक: आँखों की मस्तियाँ गीतकार: विकाश विप्लव देखी जो तेरी... देखी जो तेरी आँखों की मस्तियाँ, खोया दिल ये मेरा... खोया दिल ये मेरा, ना रहीं इसकी हस्तियाँ, देखी जो तेरी आँखों की मस्तियाँ। छाया तेरे इश्क़ का मुझपे कैसा ये नशा, हर घड़ी ढूँढूँ तुझे, ढूँढूँ बस तेरा पता, दिल को ना चैन मेरे, ना क़रार का निशाँ, तन्हा-तन्हा बीते दिन, तन्हा बीतीं रतियाँ, देखी जो तेरी आँखों की मस्तियाँ। बस गए हो जब से तुम धड़कनों में मेरी, डूबे रहते हैं हर पल हम ख़यालों में तेरे, मिलना हमारा मुक़द्दर होगा भी कि नहीं, तू ही आके उलझन ये सुलझा दे साथिया, देखी जो तेरी आँखों की मस्तियाँ। ज़िक्र तेरा ही सजता है अब हर महफ़िल में मेरी, सुलझा करता हूँ रात-दिन उलझनें मैं तेरी, है मोहब्बत कितनी, कितनी चाहत है मेरी, देख आँखों में मेरी, अपनी तस्वीर बेलिया, देखी जो तेरी आँखों की मस्तियाँ... खोया दिल ये मेरा, ना रहीं इसकी हस्तियाँ।
दिल टूटा है, मगर ज़िंदा हूँ अभी Poet : विकाश विप्लव तू मिली तो लगा था जैसे बरसों की आवारा तलाश ख़त्म हुई, तू गई तो समझ आया कि कुछ कहानियाँ मुकम्मल होने के लिए नहीं, बस अधूरी छूटने के लिए ही लिखी जाती हैं। मैंने तुझे चाहा था किसी जीत की तरह नहीं, एक घर की तरह... जहाँ लौटकर उम्र भर का सुकून मिलता है। तू कहती रही मजबूरियाँ हैं, मैं कहता रहा रास्ते निकल आएँगे, तू कल के अंधेरों से डरती रही, और मैं आज की रौशनी में तेरा हाथ थामे अडिग खड़ा रहा। अजीब बात है ना... जिसे खोने के ख़ौफ़ में मैं हर रोज़ जीता था, वही एक दिन बड़ी सादगी से मुझे खोने का फ़ैसला सुना गई। अब कोई शिकवा, कोई शिकायत भी नहीं है तुझसे, बस एक गहरा खालीपन है... जो हर रात तेरे नाम की सिसकी से शुरू होता है, और तेरी धुंधली याद पर आकर ख़त्म। मैं आज भी ठीक उसी मोड़ पर खड़ा हूँ, जहाँ तू मुझे तन्हा छोड़कर आगे बढ़ गई थी, फ़र्क सिर्फ़ इतना है... पहले तेरा बेताबी से इंतज़ार करता था, अब चुपके से अपने ही दिल को समझाता हूँ। अगर कभी गुज़रते हुए मेरी याद आ भी जाए, तो ये ख़याल दिल में मत लाना कि मैं नफ़रत करता हूँ, मैंने इबादत की तरह मोहब्बत की थी तुमसे... और सच्ची मोहब्बतें, लाख बिखर जाएँ, पर कभी नफ़रत करना नहीं सीखतीं। तुम मेरी ज़िंदगी का सबसे हसीन हादसा, सबसे ख़ूबसूरत ग़लती थीं, और मैं आज भी उस पावन ग़लती को, अपने माथे की दुआ की तरह याद करता हूँ।
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