इश्क के सात रंग
Seven Stages of Love
इश्क़ की एक काव्यात्मक यात्रा—पहली नज़र की दिलकशी से उन्स, इश्क़, अक़ीदत, इबादत और जुनून से गुज़रते हुए मौत यानी फ़ना तक।
Written By: Vikash Viplao
Stage 1 — दिलकशी / आकर्षण
ख़ता तो थी गुस्ताख़ नज़र की…
इल्ज़ाम-ए-उल्फ़त में पर
दिल गोया गुनाहगार हुआ।
देख झलक उस नूरानी चेहरे की
हादसा ये दिलकशी का 'विप्लव'
साथ मेरे सरेबाज़ार हुआ।।
Stage 2 — उन्स / लगाव
ख़बर नहीं, इस ख़ुमारी की वजह का 'साक़ी',
मालूम नहीं, थी हक़ीक़त या बस एक ख़्वाब।
वो पलकों का झुकना, उन अँखियों का तकना,
अब्र-ए-सियाह से वो केशु, लब जैसे थे गुलाब।
बयाँ उन्स का अपनी अब कैसे करे 'विप्लव,
ख़ुश-बाश में उनकी, दिल-फ़रेब बेकरार हुआ।।
Stage 3 — इश्क़
अदाएँ कर गईं उसकी असर कुछ इस क़दर
रुख़ लिया हसरतों ने फ़लक तक पंख फैलाए
अंजान था दिल की ख़्वाहिशों से जो बाद-ए-सबा में
दिल्लगी में महबूब की रहता अब अफ़साने सुनाए
पूछते फिरते हवाओं से उनका ठिकाना ऐ 'विप्लव'
इब्तिदा-ए-इश्क़ में गुम, कुछ यूँ तेरा इंतज़ार हुआ।।
Stage 4 — अक़ीदत / श्रद्धा
कुबूल हमें चाँद भी और उसके दाग़ भी, रज़ा
ख़ुदाई लुटाए बैठे हैं अपनी दिलबर की पनाह में
तशरीह उनसे राब्ता का फिर भी कैसे करें हम
रुसवा ना हो जाए मोहब्बत महफ़िल की निगाह में
रूबरू हो तो जाते गुज़रते उनकी गलियों से 'विप्लव'
मजबूरियों से उनकी हर दफ़ा पर जो ना बेज़ार हुआ।।
Stage 5 — इबादत / आराधना
इतराते रूहानी अँखियों का फ़ितूर चढ़ा कुछ ऐसा
ज़िक्र-ए-यार से ही तो अब इस रूह का क़रार है
शिकवा करूँ भी कैसे उस सितमगर की रंजिश का
रिवायतें इश्क़ की हमसे क्या कुछ कम नागवार है
बेगाना कहे वो मुझको अपना दीवाना भी 'विप्लव'
इबादत में वादा-ए-निबाह का कैसा ये इख़्तियार हुआ।।
Stage 6 — जुनून / दीवानगी
पैवस्त हुआ जबसे वो रग-ए-जाँ में यूँ लहू की तरह
चुभती तन्हाइयाँ, ये वीरानियाँ ही हासिल-ए-जूनून हैं
भाने लगी उसे अब ये वहशत बिस्तर की सिलवटें भी
रात की सियाही से लिखी बेचैन साँसें उसका सुकून है
इत्तिफ़ाक़ देखो उसके वहम कि दिवानगी का 'विप्लव'
कतरा-कतरा वो पिघला, फिर भी रक़िब गुलजार हुआ।।
Stage 7 — मौत / मृत्यु
कसूर उसका ताउम्र नज़्र-ए-इश्क़ में बस इतना सा रहा
साँस जाती रही जिसकी ख़ातिर वो कभी उसका ना रहा
क़सीदे मोहब्बत के ज़माना पढ़ेगा जब क़यामत के रोज़
खुलेंगे जहाँ आशिक़ी के पन्ने, आँख रोएँगी, रूह हँसेगी
लड़ता रहा परवाना ख़ुदा से आसमाँ के पार भी 'विप्लव'
ख़ाक था दरिया-ए-इश्क़ में, पर शमा का ना दीदार हुआ।।