Yaado ki Sahelgaah - 24 in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (24)

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (24)

 

                      : : प्रकरण - 24 : :

         परमेश्वर एक दुर्घटना का शिकार हो गया था. उस को गंभीर चोट लगी थी. उस को गुह्य अंग में चोट लगने से शस्त्र क्रिया करनी पड़ी थी जिस ने उसे वैवाहिक सुख से वंचित कर दिया था.

         उस हादसे की वजह से वह अपनी बीवी के बुलाने पर भी मुंबई  नहीं आया था. उस बातने दोनों मिया बीवी के बीच दरार पैदा कर दी थी.

         बहुत समय बाद वह मुंबई आया था.. उस पर ' कीसी' नाराज हो गई थी. उस ने अपने पति से झगड़ा किया था.

         वह बेकसूर था. कुछ कहने को समर्थ नहीं था. उस की चुप्पी ने ' कीसी ' को क्या क्या कहने को कहने पर मजबूर किया था.

        उस ने पति की बफादारी पर संदेह जताया था

        वह दुबई में कीसी दूसरी लड़की के चककर में फ़स गया था. ऐसा ताना भी मारा था.. और. परमेश्वर के पास चुप्पी के सिवा और कोई विकल्प नहीं था.

       घर में कंकाश, कलह का माहौल सा छा गया था, इस स्थिति में परमेश्वर ने फ़ोन कर के मुझे घर बुलाया था.

       और मैं एक घंटे के भीतर उस के घर पहुंच गया था. मैंने दरवाज़े की बेल बजाई थी.. उस वक़्त भीतर से ' कीसी' की रोने की आवाज मेरे कानो पर टकराई थी. 

        परमेश्वर ने खुद आकर दरवाजा खोला था. 

       और मुस्कुराकर मेरा स्वागत  किया था:

        ' कीसी' भी उस वक़्त रोइ थी. मैंने उस के कंधो पर हाथ रखकर सवाल किया :

         " मेरी बहन को क्या हो गया? "

         मेरा सवाल सुनकर वह जोरो से रोने लगी.

         और शिकायतों की धुआंदार बारिश शुरू हो गई.

          " परमेश्वर विदेश जाकर मुझे भूल गया है. लगता है वहाँ उसे कोई ओर मेम मिल गई है. "

           यह बहुत बड़ी बात थी.. या कहो गंभीर आक्षेप था. जो ना तो मैं मानने को तैयार था, ना परमेश्वर..

       समस्या का कोई हल नहीं आता था. कोई बड़ी बात थी, जो परमेश्वर बता नहीं सकता था.

       इस स्थिति में उस ने कपाट से एक फाइल निकालकर मेरे हाथों में थमा दी. वह कोई अस्पताल की फाइल थी, जिस में परमेश्वर के मेडिकल रिपोर्ट्स थे, जिसे पढ़कर मैं अचंबित ऱह गया.

       उस को जानलेवा अकस्मात हुआ था बच तो गया लेकिन वैवाहिक सुख से वंचित हो गया था. उसे काफ़ी समय अस्पताल में रहना पड़ा था इस लिये वह अपनी बीवी की जरूरत पर मुंबई नहीं आ पाया था.

       हकीकत जानकारी' कीसी' भी पलभर के लिये अपने होंश खो बैठी. भान में आते ही वह रोने लग गई.

        उस से अनजाने मे बहुत बड़ी गलती हो गई थी. उस बात का उस ने दिल से पछतावा व्यक्त किया. परमेश्वर ने उसे माफ कर के गले लगा दिया.

        और दोनों के बीच की दूरियां मिट गई थी.

                          000000000

      शेठ ब्रदर्स में पगार का धोरण बहुत ही निम्नतर कक्षा का था. इस लिये हमने मैनेजमेंट के सामने जेहाद पुकारी थी जिस का नेतृत्व मैंने और एक ब्राह्मणने स्वीकारा था. मैं तो आखिर तक लड़ने को तैयार था लेकिन वोह ब्राह्मण पैसे की लालच में पलटी मार गया था और मैं अकेला पड़ गया था. मैनेजमेंट ने कुछ पगार में बढ़ावा किया था. वह सही नहीं था. तो तय किया गया था. नये पगार से कोई पगार नहीं लेगा. लेकिन वोह रायजी के बच्चे ने नये पगार के वाउचर पर सही कर दिया था. और मेरे सामने शरीफ होकर बचाव किया था.

         " मुझे मालूम नहीं था की वो नया पगार था. "

         अब ऐसा कैसे हो सकता है? जो आदमी हर स्टाफ के पगार के बारे में जानता हो उसे नये जूने पगार में जानकारी ना हो वह कैसे हो सकता था.

          मेरा पगार उस से 15 रूपये ज्यादा था. इस बात को लेकर ना जाने मुझे  कितनी बार सुनाया था.

        उस ने शानपन दिखाया था.. फिर ज़ब पोल खुली तो वह वाउचर पर की गई साइन केंसल करने को आमादा हो गया था.

        उस ने मुझे पूछा था: " क्या मेरी साइन केंसल कर दूं? "

         यह तो अपने हाथ जलाने वाली बात थी.

         मैनेजमेंट उसे सवाल करती. पहले साइन की बाद में केंसल किस के कहने पर की तो वह जरूर मेरा नाम आगे कर देता.. मैंने उसे कुछ नहीं कहां था.

        मेरे लिये प्रेस्टीज का सवाल बन गया था..' शेठ ब्रदर्स ' में काम करने का कोई मतलब नहीं था. मैंने इस्तीफा दे दिया था, लेकिन दूसरा जोब मिलने की तलाश में ' शेठ ब्रदर्स' में काम चालू रखा था.

        उस से अकाउंट मेनेजर को दिक्कत हुई थी.. ओफिस में सब उसे बोंड्या कहते थे. यह नाम सुहानी के देवर ने दिया था, वह उस की ही बिरादरी से था.

        आख़िरकार अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिये जोब छोड़ना पड़ा था. और दो महिने बेकार घर में बैठना पड़ा था.

         उस दौरान एक साहित्यिक कार्यक्रम में मेरी मुलाक़ात एक पत्रकार से हुई थी. उस ने मुझे बताया था.

         बहुत जल्द इंडियन एक्सप्रेस जुथ गुजराती भाषा में एक नया दैनिक पेपर लोंच करने जा रहा है उन्हें प्रूफ रीडर्स की आवश्यकता हैं. मैं भी एक लेखक था. मैंने कई कहानिया लिखी थी. उसे खुद लिखता था और खुद ही उस का प्रूफ रीडिंग करता था.

       मुझे आसानी से जोब मिल गया था. पेपर शुरू होने में तीन महिने का समय बचा था और हमें नियुक्त कर लिया गया था.

       मुझे बतौर प्रूफ रीडर कोई अनुभव नहीं था. तो मैंने एक मित्र के साप्ताहिक अख़बार का नाम दे दिया था, जिस ने मेरे पहले कहानी संग्रह का काम किया था.

       प्रूफ रीडर का मुख्या वैसे तो अच्छा था लेकिन उसे मेरी काबेलियत देखकर जलन होती थी.

       मैंने एक गुजराती न्यूज़ पेपर की साप्ताहिक पूर्ति में अपने साथ हुआ अनुभव भेजा था. जो छपा था. उसी को पेपर शुरू होते ही उस में छापने को दिया था. वह तो ठीक था लेकिन गुड फैथ ने हेड को बताया था तो उस ने मेरा नाम करते हुए तंत्री को बता दिया था और मैं उन की नजर से उतर गया था.

      तंत्री जीनियस था. वह कुछ अलग करने की कोशिश में लगा रहता था. मैं प्रूफ रीडर था फिर भी मुझे स्पोर्ट्स में ज्यादा दिलचस्पी थी. उस ने मेरी काबिलियत की सराहना की थी. मैंने एक तुलनात्मक लेख लिखा था, जिसे पढ़कर खुद तंत्री ने मेरी प्रशंसा की थी. उस से मुझे प्रेरणा मिली थी. मैं अपनी कहानी के बारे में उन्हें मिला था. 

    तब ना जाने क्यों उन्होंने मुझ से विचित्र वर्तन किया था. 

      " मैं ऐरे गैरे लोगो की कहानिया नहीं छापता. "

      वह बड़ी आसानी से गुस्सा होता था और अपने टेबल पर सिर पटकता था. उसे मारता था.

       जीनियस लोग कैसे होते है, उस का अदभुत नमूना था.

        मैं प्रूफ रीडर और मददनीश स्पोर्ट्स तंत्री की भूमिका एक साथ निभाता था. फिर मुझे मददनीश तंत्री का मौका मिला था.

        लेकिन तंत्री का व्यवहार मैं बर्दास्त नहीं कर पाता था. मै जोब छोड़ने को आमादा हो गया था.

         तब मुझे ओफिस में काम करने वाले सब तंत्री की बदौलत दूसरा जोब मिला था.

                   00000000000    ( क्रमशः )