Yaado ki Sahelgaah - 27 in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (27)

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (27)

  

                : : प्रकरण - 27 : :

         उस का नाम संगीता था.

          वह बहुत भोली और सरल लड़की थी. 

          मैंने उस के नाम का अंग्रेजी में अनुवाद किया था.

          म्युझिका!! 

          जो उसे बेहद पसंद था.

           वह ज़ब हसती थी तो उस के गालों के खंजन मुझे बहुत भाता था.

        वह मेरी गुरु थी. उस ने मुझे बेझिक रूप से कम्प्यूटर सिखाया था. उस के लिये मैं उस का शुक्र गुजार था.

        मैंने उस की सराहना करते हुए कहां था.

        " हम दोनों एक ही बेंच पर बैठने वाले स्टूडेंट हैं. "

        वह मुझे बहुत सन्मान देती थी. मेरा भी ख्याल रखती थी. मै भी उस का ख्याल रखता था.

        मैं हररोज उस के लिये ओफिस जाते वक़्त कुछ ना कुछ खाने की चीज ले जाता था. और कोई हमारे रिश्ते को मानता, स्वीकारता था या नहीं मैं नहीं जानता नहीं था, लेकिन मनीषा हमारे रिश्ते का सन्मान करती थी.

         उस के पिताजी कम उम्र में कोमी दंगल में फसकर अपनी जान खो बैठे थे और वह अपने मामा मामी के साथ रहती थी. वह लोग उस का एक मा बाप से भी ज्यादा जतन करते the, उस का ख्याल करते थे. उस की सारी मांगे पुरी  करते थे.. म्युझिका को उस बात का गर्व था. 

       मैंने एक बार प्यार से उस के गालों को सहलाया था. तो वह भड़क गई थी. लेकिन वह एक पिता का स्पर्श था, इस बात का उसे एहसास हुआ था. उस ने मेरी मांफी मांगी थी.

       उस के बाद एक बार मुझे कुछ ऐसी बात कहीं थी जिस से मुझे रोना आ गया था. मैं अपने आंसू छिपाने किचन में चला गया था. वहां एक स्टाफ सदस्य ने मुझे देख लिया था. वह तुरंत म्युझिका को बुला लाया था. उस ने मेरी मांफी मांगी थी. और मेरे कमीज की जेब से गोली निकालकर मुझे खिलाई थी

        हम लोग सब साथ में खाना खाते थे.. म्युझिका और मैं सदैव साथ साथ बैठते थे.

        उस में ओफिस के कीसी भी क्लीग को कोई समस्या नहीं थी.

         ओफिस दूसरी जगह शिफ्ट हो गई थी. जो स्टेशन से दूर थी.. वास्तु पूजन में आरती भी शामिल हुई थी. मैंने म्युझिका से परिचय करवाया था.. उस ने बड़ी श्रद्धा से आरती के पैर छुए थे.

         हम लोगो का आपस में बातचीत करना आम हो गया था. हम लोग रविवार को भी बात करते थे.

         ऐसे ही एक दिन मैंने उस से बात की थी.

          घर में कुछ मेहमान मौजूद थे. फिर भी उस ने इत्मीनान से बातें की थी.

          दूसरे दिन ओफिस पहुंचते हुए उस ने मुझे सरप्राइज दिया था :

        " आप की प्रार्थना रंग लाई हैं. कल ज़ब आप ने फोन किया तो एक लड़का अपने परिवार के साथ मुझे देखने आये थे. सब को मैं पसंद आ गई हूं. इस इतवार को मेरी सगाई भी तय हो गई हैं. "

        " वाव! यह तो बहुत बड़ी खबर हैं. कोंग्रेट्स मेरी बेटी! " 

         मैंने उस के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिये थे.

          वह मेरी बात सुनकर भावुक हो गई थी. हम दोनों की आँखों में खुशी के आंसू उमट पड़े थे.

      लडके का नाम प्रसाद था. उस का चिनोई में बार था. वह खाता लड़का था. दोनों देखने में, वजन में भी एक जैसे थे. मैंने उस की मामी के सामने मजाक दी थी

       " दोनों हर तरह से एक जैसे हैं. तराजू में रखे तो दोनों के वजन में एक इंच का भी फर्क नहीं आयेगा! "

        मेरी मजाक सुनकर वह खुलकर हंस पड़े थे..

        इतवार को मैं उस की सगाई में उपस्थित हो गया था. दोनों को जी भर के आशीर्वाद दिये थे. ओफिस के अन्य कर्मचारियों ने कुछ नहीं दिया था. लेकिन मैंने एक बंद लिफाफा उस के हाथों में थमा दिया था.

        बाद में लंच का कार्यक्रम था.. उस में नोन वेज आइटम्स शामिल थी. मैंने भी चिकन और मटन का आस्वाद लिया था. 

        उस पर हर कोई ने अचरज व्यक्त किया था.

        उस के बाद म्युझिका ने ओफिस में पार्टी रखी थी.

         उस में मेरी तरफ से मैंने पिझा को शामिल किया था. उसे पिझा बहुत पसंद था. एक बार उस ने ऐसी ही पिझा का नाम लिया था. और मैं कुछ नहीं कर पाया था. उस का अफ़सोस होता था. इस लिये ओफिस क्लीग से पैसे उधार लेकर पिझा मंगाया था.

      मेरी इस बात से म्युझिका प्रभावित हो गई थी. मैंने उसे गले लगा दिया था.

       लेकिन उस के बाद मैं म्युझिका शादी कर के दूर चली जायेगी इस बात से संतप्त सा हो गया था.

        मेरी जिंदगी में कई इत्तेफ़ाक़ हुए थे. जिस में यह एक था. मैं और राजहंस एक ही दिन ओफिस से बाहर हुए थे. और अब मैं और म्युझिका. 

        उस की एक आदत थी, जो कभी भुलाई नहीं जा सकती थी. वह कुछ भी अकेले नहीं खाती थी.

        एक दिन रात को हम सब गणपति के दर्शन के दर्शन  के लिये उस के घर गये थे.. तब उस की मामीने हमारा अच्छी तरह स्वागत किया था.. जो मेरे लिये यादगार बन गया था.

         उस के और प्रसाद के बीच एक समानता थी.

         दोनों के जन्म दिन भी 24/02 को ही आता था..

          जिसे भी भूले भुलाया नहीं जा सकता था.

          शादी की पहली आमंत्रण पत्रिका पिता के नाम भगवान के पास रखनी होती हैं. म्युझिकाने उस का श्रेय मुझे दिया था.

          तब मैं उसके कंधो पर हाथ रखकर भगवान की छबी के पास ले गया था. फिर उस को कहां था.

      " बोलो! पहली पत्रिका अपने पिता की तरफ से तुम्हे अर्पण करती हूं. "

       और उसने मेरी बात का अमल किया था.

       उस वक़्त मैंने एक गीत गाया था:

        बाबुल की दुवाये लेती जा,.

        जा तुझ को सुखी संसार मिले,.

         मैं के की कभी ना याद आये,

         ससुराल में इतना प्यार मिले

        उसके एक ही शब्द से मैंने अपनी सालो पुरानी आदत को त्याग दिया था. यह जानकर उस ने आश्चर्य और खुशी की मिश्रित लागणी महसूस की थी.

        मैं छोटे से बच्चे की तरह उंगली के नाख़ून चबाता था. उस वजह से मुझे  काफ़ी पीड़ा भुगतनी पड़ी थी.

         यह जानकर उस ने कमेंट्स किया था.

         " छी! छोटे बच्चे की तरह नाख़ून चबाते हो.. "

         मेरी इस आदत को छुड़ाने के लिये गीता बहन ने काफ़ी कोशिश की थी, लेकिन उन्हें नाकामी हाथ लगी थी. 

         मुझे उम्मीद थी.. म्युझिका मेरी आदत छुड़वायेगी. मैंने उसे कहां भी था:

         " ज़ब मुझे नाख़ून चबाते देखो, मुझे थप्पड़ मारना! "

         उस पर म्युझिका ने मुझे कहां था.

         " मैं आप को कैसे मार सकती हूं. "

                  0000000000 ( क्रमशः)