ब्रीफकेस मैंने मेज के नीचे रख दिया। मैंने पराठा खा कर भुगतान दिया और चलने को हुआ तो देखा कि ब्रीफकेस गायब है। मेरे लिए यह अप्रत्याशित घटना थी। ब्रीफकेस में ही पासपोर्ट, हवाई टिकट और टै्रवलर्स चेक थे। मेरी जेब में जो हवाई अड्डे पर चेक भुनाया था उसी के पैसे थे। विदेश में कोई ऐसी घटना हो जाये तो आदमी कितना परेशान होगा, इसे कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है। मैंने दुकानदार से पूछा तो उसने बताया कि उसे इस सम्बन्ध में कुछ भी पता नहीं है।
मेरे सामने यह प्रश्न था अब क्या किया जाए। मैं सड़क पर आकर खड़ा हो गया और एक सज्जन को अपनी कठिनाई बता कर पूछा कि मुझे क्या करना चाहिए। उन्होंने सलाह दिया कि मुझे सबसे पहले पुलिस में रिपोर्ट करनी चाहिए। उन्होंने पुलिस स्टेशन का नम्बर भी बताया। मैंने उनसे कहा कि आप मेरी तरफ से पुलिस स्टेशन को सूचित कर दीजिए। उन्होंने पुलिस स्टेशन को फोन कर बताया - एस.पी. सिंह लास्ट हिज ब्रीफकेस कन्टैनिंग पासपोर्ट, एयर टिकट एण्ड टै्रवलर्स चेक। इतना बताकर वे चले गये। थोड़ी देर बाद काले रंग की कार से दरोगा आ गए। वे घोषणा कर रहे थे कि एस.पी. सिंह लास्ट हिज ब्रीफकेस। मैं टेलीफोन बूथ के पास ही खड़ा था।
उन्होंने पूछा- आर यू मिस्टर एस.पी. सिंह। मैंने जैसे ही ‘एस’ कहा। उन्होंने कहा कि गाड़ी में बैठ जाइए। मुझे लेकर वे पुलिस थाने पहुँचे और पूछा कि रिपोर्ट मैं लिख दूँ या आप स्वयं लिखेंगे। मैंने कहा कि आप स्वयं लिख दीजिए मैं देखकर हस्ताक्षर कर दूँगा। उन्होंने अंग्रेजी में रिपोर्ट लिखी। मैंने उसको पढ़ा और गलतियों में सुधार करते हुए हस्ताक्षर बना दिए। उन्होंने रिपोर्ट ले ली और अपनी ओर से एक पत्र दिया और कहा कि आप गृह मंत्रालय चले जाइए। वहाँ आपको एक या दो हफ्ते रहने की परमिट मिल जाएगी।
बिना परमिट के रहने पर आपको गिरफ्तार किया जा सकता है। वहाँ से निकलकर मैं गृह मंत्रालय के कार्यालय में पहुँचा जहाँ सम्बन्धित बाबू ने आदर से बिठाया। पुलिस स्टेशन से मिली रसीद को देखा और एक हफ्ते की परमिट बना दी। यह भी कहा कि आप अपने दूतावास से सम्पर्क कीजिए। उसने यह भी टिप्पणी कि आपका दूतावास बहुत भ्रष्ट है। दूतावास का पता लगाते हुए जब वहाँ पहुँचा तो शाम के चार बज रहे थे। वहाँ एक कर्मचारी मिला जो खलीलाबाद का रहने वाला था।
उसने बताया कि आज तो दफ्तर बन्द हो चुका है, कल आप आइए। यहाँ कोई चोरी नही करता। हो सकता है कि जिसको ब्रीफकेस मिला हो वह दूतावास में भेज दे। मैंने सोचा कि मेरे पास पैसे तो बहुत कम हैं। मैंने सीधे हवाई अड्डे जाकर बैठे और लेटे रहकर रात गुजारी। सुबह वहीं नित्य क्रिया से निवृत्त होकर सोचने लगा कि मुझे टै्रवलर्स चेक के लिए कुछ करना चाहिए लेकिन मुझे टै्रवलर्स चेक के नम्बर भी नहीं मालूम थे। मैने सोचा कि कल सुबह एक पचास डालर का चेक भुनाया था। काउन्टर पर बैठी महिला से मैंने कहा कि मैंने कल सुबह छह बजे एक पचास डालर का चेक भुनाया था। मुझे उसका नम्बर चाहिए।
वह अन्दर गयी और थोड़ी देर में चेक की फोटो कापी मुझे पकड़ा दी। उसे लेकर मैं अमेरिकन एक्सप्रेस बैंक पहुँचा। उसकी मैनेजर मिस लिंडा सत्रहवीं मंजिल पर बैठी थी। यद्यपि लिफ्ट लगी हुई थी, किन्तु मैं सीढ़ी से ही सत्रहवीं मंजिल पर पहुँचा। मिस लिंडा को पुलिस रिपोर्ट और चेक की फोटो कापी दिखाई और बताया कि तीन हजार के चेक उसी के आगे थे। मिस लिंडा ने कागज देखते हुए कहा - ‘मिस्टर सिंह हैव ए गुड डे इन सिंगापुर। उसने कहा कि मैं पचास यूएस डालर आज आपको दे देती हूँ। मैं टेलेक्स कर दे रही हूँ, कहीं भी आपका टै्रवलर्स चेक भुनाया नहीं जा सकेगा। कल मैं आपको पूरा पैसा दे दूँगी।’
उसने कहा कि तेरहवीं मंजिल पर एकाउन्टेन्ट से पचास डालर प्राप्त कर लीजिए। लिंडा के व्यवहार ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मैंने तेरहवी मंजिल पर जाकर पचास डॉलर प्राप्त किया। यहाँ से दूतावास जाना था। जेब में कुछ पैसे हो जाने पर चिंताए कुछ कम हुइंर्। मैं दूतावास की ओर बढ़ गया। वहाँ पुलिस रिपोर्ट दिखाने पर कहा गया कि पचास डॉलर जमा करो तो यहाँ से भारत टेलेक्स जाएगा। मैंने पचास सिंगापुरी डॉलर जमा किया। अब यह प्रश्न था कि हवाई टिकट का क्या किया जाए। मैं मलेशियन एयरलाइन्स के दफ्तर पहुँचा। अन्दर काउन्टर की ओर बढ़ने पर आवाज आयी- मीट द सेक्रेटरी। वहाँ आस पास कोई आदमी नहीं दिख रहा था। मैंने देखा कि एक मशीन से नम्बर मिल रहा था। नम्बर लेकर मैं सोफे पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद मुझे बुलाया गया।
मैंने नम्बर की पर्ची दी और बताया कि मैंने मलेशियन एयरलाइन्स का टिकट लिया था लेकिन वह चोरी हो गया है और मुझे लौटने के लिए टिकट की दूसरी प्रति चाहिए। इस महिला ने तपाक से उत्तर दिया कि सिंगापुरी चोरी नहीं करते। ये किसी टूरिस्ट की करतूत हो सकती है। उसने बताया कि जहाँ से टिकट निर्गत हुआ था वहाँ मैं टैलेक्स कर रही हूँ जैसे ही वहाँ से रिपोर्ट आ जाएगी आपको लौटने का टिकट मिल जायेगा। वहाँ से निकला। मेरे पास सिंगापुर के एक परिवार का पता था। वह परिवार पूर्वी उत्तर प्रदेश से आकर सिंगापुर में बस गया था। लड़का सिंगापुर एयरलाइन्स में सर्विस कर रहा था। उसकी पत्नी गोण्डा की थी और लाल बहादुर शास्त्री कॉलेज की पढ़ी हुई थी।
उसके पिता से भी हमारी मित्रता थी। मै उसके आवास को खोजने की कोशिश में पैदल ही जा रहा था। मुझे बहुत प्यास लगी हुई थी। मैं अनुमान लगा रहा था कि भारत की तरह यहाँ कहीं टोटी वगैरह में पानी मिल जायेगा। पर ऐसा कहीं नहीं दिखा। इसी बीच एक व्यक्ति से भेंट हुई। उसको लगा कि मैं भारतीय हूँं और मैंने भी अनुमान लगाया कि हो सकता है कि वह उत्तर भारत का हो। बातचीत में मालूम हुआ कि वह संत कबीर नगर का रहने वाला है। उसने बताया कि वह नौकरी करने के लिए यहाँ चला आया था। अब तक पाँच लाख रुपया घर भेज चुका हूँ। मैं तीन पारियों में काम करता हूँ। दिन में कपड़े की दुकान पर नौकरी करता हूँ।
उससे जो समय बचता है उससे गलियों में जाकर कपड़े बेच लेता हूँ और रात में चौकीदारी करता हूँ। खाना बनाता नहीं, बाजार में खा लेता हूँ। एक कोठरी किराये पर ले रखी है। वहाँ केवल शौच और स्नान आदि के लिए ही जाता हूँ। उस कोठरी में भी चार अन्य भारतीय रहते हैं। उसी व्यक्ति ने जिसको मैं खोज रहा था उसकी सही लोकेशन के बारे में बताया। मैंने उससे पूछा कि मुझे प्यास लगी है पर यहाँ पानी कहीं नहीं दिख रहा है। उसने बताया कि यहाँ सिर्फ पानी पीने का रिवाज नहीं है। उसकी जगह पर ठंडा गर्म पेय, फलों का रस, दूघ आदि लोग पीते हैं। इतना कहने के साथ उसने एक दुकान पर ले जाकर मुझे ठंडा पेय पिलाया। उनसे विदा लेकर मैं उस आवास की ओर बढ़ गया जिसे मैं काफी देर से खोज रहा था। पहुँचने पर उसी लड़की ने दरवाजा खोला जो मुझसे परिचित थी।
उसने आश्चर्य भाव से कहा कि सर आप! मैंने कहा कि मैं सिंगापुर आया था तो तुम्हारा पता नोट कर लाया था। उसके पति सिंगापुर एयरलाइन्स में पाइलेट थे। वे अपनी ड्यूटी पर गए हुए थे। घर में वही और उसके दो छोटे बच्चे थे। उसने मुझे ड्राइंगरूम में बिठाकर चटपट दाल चावल सब्जी बनाया। यह भी बताया कि यहाँ मसाले का प्रयोग कम होता है। इसलिए हो सकता है कि आपको यह भोजन थोड़ा फीका लगे। भोजन करके जब हम बैठे तो हमने अपनी समस्या बतायी। उसने कहा कि अस्थायी पासपोर्ट मिलने में हो सकता है कि समय लग जाये। मेरे पति यदि यहाँ घर पर होते तो मैं आपको अपने यहाँ ही रख लेती लेकिन मैं आर्य समाज के सचिव राय साहब की पत्नी को फोन कर दे रही हूँ। आपको निःशुल्क वहाँ रहने की व्यवस्था हो जाएगी। उसने मुझे आर्य समाज का पता भी दिया।
वहाँ से चलकर मैं आर्य समाज मंदिर आ गया। सायंकाल राय साहब आए और कहा कि मुझे पता हो चुका है। आप यहाँ निश्चिन्त होकर रहिए। अभी तक मैं रात्रि हवाई अड्डे पर ही चला जाया करता था। आर्य समाज में रहते हुए मैं कई बार भारतीय दूतावास गया। वहाँ जब भी जाता यही उत्तर मिलता कि अभी भारत से कोई उत्तर नहीं आया है। आर्य समाज में ही मेरी मुलाकात एक अवकाश प्राप्त तमिल प्राचार्य से हुई। वे पति पत्नी यहाँ रहते थे। उनका बेटा फ्रांस में काम कर रहा था। उन्होंने बताया कि मैं एक बार भारत गया था। गोरखपुर में मेरा बैग चोरी हो गया, जिसमें दवाएं पर्चे वगैरह थे। मै सीधे वहाँ से दिल्ली आया और दिल्ली से सीधे यहाँ आ गया।
लेकिन मैं चाहता हूँ कि अब जब जाऊँ तो वहाँ के लोगो से हिन्दी में बात करूँ। मैं गीता भी पढ़ना चाहता हूँ और उसके अंग्रेजी अनुवाद से उसे अच्छी तरह समझ सकता हूँ। वे एक हिन्दी की पुस्तक ले आए और मुझसे कहा कि आप जब तक यहाँ हैं मुझे हिन्दी सिखा दीजिए। मैं उन्हें रोज एक घंटे हिन्दी पढ़ाता रहा। एक कविता में भारत की बड़ी प्रशंसा की गई थी। उन्होंने पढ़ते हुए कहा कि क्या भारत ऐसा है। एक बार एक शब्द का अर्थ पानी बताया। उनकी समझ में नहीं आया। जैसे ही मैंने कहा- जल, वे बोल पड़े ‘जलम्’ और उनकी समझ में आ गया। मुझे लगा कि तमिल और संस्कृत आपस में घनिष्ठता से सम्बद्व हैं। वे कभी कभी अपने घर से कुछ बनवा कर लाते।
मेरे साथ दूतावास भी जाते। दूतावास से कोई काम न हो पाने पर हम दोनो बहुत दुःखी होते। जब दूसरी परमिट का भी समय समाप्त हो गया तो फिर मैं नई परमिट के लिए गृह मंत्रालय गया। सम्बद्ध बाबू ने कहा कि आपका आने जाने में समय नष्ट होता है। इसका मुझे दुःख है। मैंने उनसे कहा कि हवाई जहाज से उतरते समय यात्रियों को एक प्रोफार्मा भरना होता है जिसमें यात्री को सम्पूर्ण विवरण लिखना होता है। आप मेरी मदद करें। मैंने जो विवरण भरा है, उसकी फोटो प्रति उपलब्ध करा दें।
आप कोलालम्पुर से लोकल फ्लाइटस से आए हैं, यह उड़ान आधे-आधे घंटे पर आती है। आप जिस उड़ान से आए हैं उसका नम्बर भी ज्ञात नहीं है। इसलिए उस दिन की सुबह की कई उड़ानों को मुझे चेक करना होगा फिर भी मैं कोशिश करूँगा कि आपकी मदद कर सकूँ। इस बीच मैं घर और दिल्ली में चचेरे भाई के पास तथा लाल बहादुर शास्त्री डिग्री कालेज के बड़े बाबू को पत्र भेज चुका था जिसमें सारा विवरण लिख दिया था। बड़े बाबू को यह भी लिखा था कि आप लखनऊ के पासपोर्ट आफिस में जाकर मेरा विवरण भिजवाने की कोशिश करें।
दिल्ली से चचेरे भाई को यह लिखा था कि आप उस एजेंट से मिलकर टिकट सम्बन्धी टेलेक्स भिजवाने की कोशिश करें। दिल्ली में भाई ने एजेंट से मिलकर जवाब भिजवा दिया। लेकिन बड़े बाबू ने जब पासपोर्ट आफिस में सम्पर्क किया तो देखा टेलेक्स पासपोर्ट अधिकारी की मेज पर लगा हुआ था। सत्रह दिन हो रहे थे और मुझे बहुत चिन्ता हो रही थी।