Yashaswini - 39 in Hindi Fiction Stories by Dr Yogendra Kumar Pandey books and stories PDF | यशस्विनी - 39

Featured Books
Categories
Share

यशस्विनी - 39

आधा तू आधा मैं:- 

इसके बाद के दिनों में नेहा से व्यवहार में भी रोहित सहज होते गया और इधर साधना के क्षेत्र में वह अधिक परिपक्वता का परिचय देने लगा।

       अब स्वामी मुक्तानंद के कक्ष में सुबह के ध्यान में उसे घंटों बीतने लगे। एक बार तो आज्ञा चक्र पर ध्यान लगाने के दौरान उसे सिर में तेज दर्द शुरू हुआ और वह थोड़ी देर के लिए अचेत हो गया।

स्वामी अक्षयानंद ने उसे संभालते हुए उसके मस्तक पर हाथ फेरा और उसके सिर के एक हिस्से में हल्की मालिश की। थोड़ी ही देर में रोहित चैतन्य हो गया।

स्वामी अक्षयानंद ने उसे समझाते हुए कहा,"आवश्यकता से अधिक समय तक किसी भी चक्र पर ठहरना उचित नहीं है रोहित! इतनी तंद्रा में मत डूब जाओ कि बाहर निकल आना संभव न हो। वैसे भी बिना योग्य गुरु की उपस्थिति के,साधक को स्वयं ही योग और विशेषकर चक्रों के विशिष्ट अभ्यासों को नहीं करना चाहिए,क्योंकि इससे लाभ होने के स्थान पर हानि हो सकती है।"

"मैं इसका ध्यान रखूंगा आचार्य जी!"रोहित ने कहा।

दूसरे आसन में बैठे हुए स्वामी मुक्तानंद ने अपनी आंखें खोली और कहा,"वह समय भी आएगा रोहित जब तुम समाधि की अवस्था में पहुंच जाओगे और तब जैसे तुम्हारा जीवन और समूचा अस्तित्व इतना हल्का हो जाएगा कि सांसारिक घटनाओं को जीते हुए भी तुम उनसे अछूते रहोगे लेकिन अभी उस अवस्था को आने में समय है।"

"रोहित ने हाथ जोड़कर कहा, "जी स्वामी जी!

        कुछ ही दिनों के बाद आखिर वह दिन आया जब स्वामी मुक्तानंद ने ब्रह्मांड के रहस्यों से रोहित को अवगत कराने का कार्य शुरू किया। अपने आसन पर बैठे हुए स्वामी मुक्तानंद ने रोहित को बताया,

"सृष्टि के प्रारंभ में कुछ नहीं था रोहित!केवल परम तत्व या ईश्वर थे।उस समय प्रकृति या माया भी सत्व, रजस और तमस गुणों की साम्यावस्था में होती है। ईश्वर का इस आवरण में रहना ही हिरण्यगर्भ है, ब्रह्म का यह आवरण अंडाकार होने के कारण ब्रह्मांड कहलाता है।इस हिरण्यगर्भ से विराट पुरुष या परम पुरुष स्वयं प्रकट होते हैं।"

  रोहित के दोनों हाथ प्रणाम अवस्था में जुड़ गए क्योंकि उनकी मान्यता के अनुसार यही परम पुरुष श्री नारायण या श्री विष्णु हैं, जिनसे स्वयं श्री राम और श्रीकृष्ण ने अवतार के रूप में इस धरती पर जन्म लिया है,जिन्हें रोहित  कभी बांके बिहारी जी  तो कभी राम लला कहते हैं।रोहित सोचने लगा,दुनिया के अलग-अलग धर्म और पूजा पद्धतियों में सिद्ध महात्मा लोग जब साधना के उच्चतम बिंदु तक पहुंचते होंगे, तो उन्हें भी अपनी- अपनी आस्था के अनुसार यही ईश्वर तत्व अलग-अलग नाम और रूप में दिखाई देते होंगे।रोहित ने मन में विचार किया, स्वामी विवेकानंद ने शिकागो के अपने विश्व प्रसिद्ध उद्बोधन में आज से 130 वर्ष पूर्व पूरी दुनिया को मानवतावाद का संदेश दिया था।एक श्लोक की पंक्तियां उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा था कि जिस तरह अलग-अलग स्थानों से निकली हुई नदियां अलग-अलग रास्तों से होकर गुजरती हुईं,अंत में समुद्र में जाकर मिल जाती हैं, ठीक उसी तरह अपनी इच्छा से लोग भले ही अलग-अलग रास्ता चुनें, लेकिन अंत में सभी रास्ते उस ईश्वर तक ही जाते हैं।"  रोहित ने निष्कर्ष पर पहुंचते हुए सोचा कि जब वह विराट ब्रह्मांड पुरुष एक है तो हम सभी उन्हीं की संतान हैं।

               उधर स्वामी मुक्तानंद आगे समझा रहे थे,"ब्रह्मांड की साम्यावस्था में विक्षोभ या असंतुलन उत्पन्न होने से बुद्धि तत्व बना। इससे अहंकार और फिर पाँच तन्मात्राएँ (रूप,रस,गंध, स्पर्श और शब्द) और पाँच महाभूत(आकाश,वायु, अग्नि,जल और धरती) उत्पन्न  होते हैं।ये पंचमहाभूत अपने भौतिक अर्थ के स्थान पर अलग-अलग अर्थ लिए हुए हैं।

सबसे पहले आकाश बना, फिर वायु तत्व उसके बाद वायु तत्व में घर्षण होने से अग्नि तत्व। ब्रह्मांड के अग्नि तत्व अर्थात अग्नि के गुणों से ही जल तत्व बना। इसी जल तत्व से धरती तत्व बना और धरती पर जीवन की उत्पत्ति हुई

आकाश तत्व अर्थात स्थान,चेतना,अंतर्ज्ञान। इसकी तन्मात्रा है-ध्वनि।

वायु तत्व अर्थात विस्तार,गति,सूक्ष्म उपस्थिति। इसकी तन्मात्रा है-स्पर्श ।

अग्नि तत्व अर्थात ऊर्जा और तेज जिसकी तन्मात्रा दृष्टि या रूप है।

जल तत्व अर्थात अनुकूलनशीलता,बंधन और तरलता। इसकी तन्मात्रा है-स्वाद या रस।

भूमि तत्व अर्थात दृढ़ता,सघनता और स्थिरता। इसकी तन्मात्रा है-गंध।

ये पंच महाभूत ब्रह्मांड के सभी पदार्थों की उत्पत्ति के आधार हैं। सुदूर अंतरिक्ष और ब्रह्मांड के संबंध में इसरो,नासा और दुनिया की अनेक वैज्ञानिक संस्थाओं की ब्रह्मांड की रचना और इसके स्वरूप,ईथर तत्व और धरती पर जीवों के विकास के संबंध में की गई अधुनातन खोजें जिन निष्कर्षों पर पहुंच रही हैं,उनके स्पष्ट संकेत हजारों वर्ष पहले लिखे गए भारतीय ग्रंथों में हैं।"                     

   रोहित प्रतिदिन एक-एक कर अपनी जिज्ञासाएं सामने रखता गया और स्वामी मुक्तानंद जी उनका समाधान करते गए। अंत में वह स्थिति आ गई जब रोहित समाधि में डूबने लगे। उनके जीवन में महाआनंद छा गया।इसी बीच विवेक और प्रज्ञा का आश्रम में आगमन हुआ था और स्वामी मुक्तानंद ने उन्हें धर्म ग्रंथो का अध्ययन कर कुछ सूत्र तलाशने का कार्य सौंप दिया था।..................

          आज सामूहिक योग अभ्यास के अवसर पर इन चारों साधकों की एक साथ उपस्थिति रही। योग अभ्यास पूरा होने के बाद रोहित,नेहा, विवेक और प्रज्ञा; स्वामी मुक्तानंद जी के साधना कक्ष में उपस्थित हैं।आज स्वामी मुक्तानंद और स्वामी अक्षयानंद के मुखों पर दमक है।रोहित,नेहा, विवेक और प्रज्ञा आपस में मिलकर अत्यंत प्रसन्न है और सभी एक दूसरे के उद्देश्य तथा पूर्वजीवन से परिचित हो चुके हैं। इन सभी में एक गहरी आपसी समझदारी उत्पन्न हो गई है।

  स्वामी जी ने सबसे पहले विवेक और प्रज्ञा से पूछा।

"आप दोनों ने पिछले कई दिनों में हमारे धर्म ग्रंथो के हजारों पन्ने खंगाले हैं। क्या कोई समाधान हाथ लगा?"

विवेक ने जानकारी देते हुए कहा,"सीधे कोई समाधान तो ज्ञात नहीं हुआ स्वामी जी लेकिन च्यवन ऋषि तथा सुकन्या के प्रकरण से यह ज्ञात हुआ कि भारतीय आयुर्वेद तथा साधना पद्धति में इतनी शक्ति है कि वह मनुष्य का कायाकल्प कर सकती है।"

यह सुनकर स्वामी मुक्तानंद जी मुस्कुरा उठे। उन्होंने प्रज्ञा की ओर देखा।

प्रज्ञा ने आगे बताना शुरू किया,"हां स्वामी जी! इसके अतिरिक्त एक और विशेष प्रसंग की ओर हमारा ध्यान गया है।श्रीमद्भागवत के एक विवरण के अनुसार गुरु वसिष्ठ ने वैवस्वत मनु की इला नाम की पुत्री को सुद्युम्न नाम के पुत्र में बदल दिया था।अगर प्राचीन काल में ऐसा संभव है तो आज के युग में पुरुषों की लोलुप दृष्टि का शिकार होती नारियों को भी किसी खतरे का समय आने पर उस समय तक के लिए स्वयं को इला नारी के स्थान पर सुद्युम्न जैसे पुरुष के शरीर में बदल लेना चाहिए।"

  

क्रमशः 

योगेंद्र