संस्कृति अब वर्क फ्रॉम होम में नहीं… बल्कि नियमों के बीच काम करने लगी थी। अकेलापन अब सिर्फ़ घर तक सीमित नहीं था। वो उसके साथ ऑफिस तक चला जाता।
सुबह-सुबह सास की आवाज़ उसके कानों में गूँजती रहती।
सास (सख्त लहजे में) बोली -
ऑफिस जाना है तो ये बात दिमाग़ में रखना—
संस्कृति चुपचाप साड़ी की पल्लू ठीक करती।
सास बोली -
साड़ी पहनकर जाना।
ज्यादा मेकअप नहीं।
लिपस्टिक हल्की।
बाल खुले नहीं रहने चाहिए।
संस्कृति ने सिर हिला दिया।
सास बोली -
किसी से ज़्यादा बात नहीं करोगी। खासतौर पर मर्दों से।
एक और नियम।
सास बोली -
हँसना नहीं है। ऑफिस घूमने की जगह नहीं है।
संस्कृति का दिल और सिकुड़ गया।
लेकिन सबसे बड़ा सच तो उसने बाद में जाना।
उसका पति… कार्तिक…वही उसका बॉस था।
जब ये बात उसे पता चली, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
संस्कृति (मन में) बोली -
तो अब घर ही नहीं…ऑफिस भी जेल है।
ऑफिस में कदम रखते ही सब नज़रें उसकी तरफ उठीं।
वो सिर झुकाए अपनी सीट तक पहुँची। लैपटॉप खोला, फाइल्स ओपन की।
लेकिन उसे एहसास था—
किसी की नज़र हर वक्त उस पर थी।
काँच के केबिन से कार्तिक उसे देख रहा था।
हर मुस्कान पर—
हर शब्द पर—
हर हरकत पर।
कार्तिक (मन में) बोली -
कोई नियम न टूटे।
वो जानता था घर के नियम क्या हैं। और वो चाहता था ऑफिस में भी वही चले।
कॉफ़ी मशीन के पास एक कलीग ने पूछा—
संस्कृति, सब ठीक है?
संस्कृति ने बस सिर हिलाया।
जवाब में हल्की सी मुस्कान आ ही गई थी—
उसी पल काँच के केबिन से एक तेज़ नज़र पड़ी।
संस्कृति ने तुरंत चेहरा सख्त कर लिया।
मीटिंग में संस्कृति ने शानदार आइडिया दिया।
सब इम्प्रेस थे।
लेकिन कार्तिक ने सिर्फ़ इतना कहा—
कार्तिक (रूखे स्वर में) बोला -
ठीक है। अगला पॉइंट?
न तारीफ़। न मुस्कान।
संस्कृति के अंदर कुछ और टूट गया।
पूरा दिन वो ऐसा महसूस करती रही जैसे वो काम नहीं… परीक्षा दे रही हो।
संस्कृति (मन में) बोली -
अगर मैं यहाँ भी खुद नहीं रह सकती…तो मैं कहाँ रहूँ?
शाम को वो थकी हुई घर लौटी। काम से नहीं… नज़र से।
कार्तिक उससे पहले पहुँच चुका था।
दोनों एक ही कमरे में थे, लेकिन दो अलग दुनिया।
बिस्तर पर लेटे-लेटे संस्कृति ने पहली बार खुद से पूछा—
क्या मैं इस शादी में सिर्फ़ एक कर्मचारी हूँ?
आँखों में पानी आया… लेकिन आँसू नहीं गिरे।
क्योंकि वो जानती थी—
इस घर में रोना भी एक अपराध है।
संस्कृति के मन में एक सवाल रोज़ बड़ा होता जा रहा था।
संस्कृति (मन में) बोली -
ये घर ऐसा क्यों है?
इतना बड़ा नाम…रघुवंशी।
राम जी का वंश। मर्यादा, प्रेम, त्याग का प्रतीक।
फिर इस घर में प्रेम गुनाह क्यों है?
एक दोपहर संस्कृति बालकनी में बैठी लैपटॉप पर काम कर रही थी। नीचे आँगन में दो नौकरानियाँ बातें कर रही थीं।
वो ध्यान नहीं दे रही थी… लेकिन अचानक एक नाम उसके कानों से टकराया।
नौकरानी 1 (धीमी आवाज़ में) बोली -
अरे, उस वक़्त के बाद से ये घर ऐसा हो गया…
संस्कृति की उँगलियाँ कीबोर्ड पर रुक गईं।
नौकरानी 2 बोली -
बड़े ठाकुर की छोटी बहन… यानी कार्तिक की बुआ…
संस्कृति ने साँस रोक ली।
नौकरानी 1 बोला -
उसी ने तो शिड्यूल्ड कास्ट के लड़के से शादी कर ली थी।
संस्कृति का दिल ज़ोर से धड़क उठा।
नौकरानी 2 बोली -
समाज ने इनका जीना हराम कर दिया था।
नौकरानी 1 बोली -
जहाँ जाते, वहाँ ताने।
नौकरानी 2 बोली -
कोई शादी में नहीं बुलाता, कोई त्योहार में नहीं।
नौकरानी 1 बोली -
लोग कहते—
‘देखो रघुवंशी, बेटी ने खानदान डुबो दिया।’
संस्कृति की आँखें भर आईं।
नौकरानी 2 बोली -
गलती तो बुआ की थी…
नौकरानी 1 (कटु हँसी लिए) बोली -
पर सज़ा पूरे घर ने भुगती।
नौकरानी 2 बोली -
तभी तो हँसी-खुशी सब बंद।”
नौकरानी 1 बोली -
बड़े ठाकुर ने घर में फरमान जारी कर दिया—
प्यार नाम की चीज़ यहाँ नहीं होगी।
संस्कृति समझ गई।
यही वजह थी—
हर मुस्कान पर पाबंदी, हर भावना पर ताला।
सब लोग धीरे-धीरे पत्थर बन गए थे।
संस्कृति (मन में) बोली -
एक औरत के प्यार की सज़ा…पूरे खानदान ने चुकाई।
उसे कार्तिक याद आया।
वो प्यार से नफरत क्यों करता है—
अब समझ में आ रहा था।
उसने बचपन में समाज का ज़हर देखा था। घर का टूटना देखा था।
उस दिन संस्कृति देर तक बालकनी में बैठी रही।
अब उसे इस घर से डर नहीं लग रहा था… दया आ रही थी।
संस्कृति (खुद से) बोली -
गलती एक की…सज़ा सबको।
पहली बार संस्कृति के दिल में कार्तिक के लिए गुस्से के साथ-साथ
दर्द भी आया।
और शायद…यही वह पल था जहाँ उसके अंदर कुछ बदलने लगा।
क्या संस्कृति इस जमे हुए घर में पहली गर्माहट बनेगी?
या समाज का डर उसे भी पत्थर बना देगा?