Pahli Nazar ki Chuppi - 9 in Hindi Love Stories by Priyam Gupta books and stories PDF | पहली नज़र की चुप्पी - 9

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पहली नज़र की चुप्पी - 9


कभी-कभी किसी कहानी का सबसे मुश्किल हिस्सा
उसे ख़त्म करना नहीं होता —
बल्कि उसे समझना होता है।
क्योंकि कुछ रिश्ते
हमारे साथ नहीं चलते,
लेकिन हमारी रगों में
हमेशा के लिए बहने लगते हैं।
कुछ लोग
हमारे भविष्य का हिस्सा नहीं बनते,
पर हमारे वजूद की नींव बन जाते हैं। 💭
सर्द हवाओं का मौसम फिर लौट आया था।
वही ठंड,
वही सुस्ती,
वही हल्की-सी उदासी।
कॉलेज अब बीते दिनों की बात बन चुका था।
किताबें बंद हो चुकी थीं,
गलियारों की आवाज़ें ख़ामोश हो गई थीं।
पर उस café का वो कोना
आज भी वैसा ही था —
जैसे वक़्त ने उसे छूने से मना कर दिया हो।
वही मेज़,
वही खिड़की,
वही दो कुर्सियाँ।
जहाँ कभी
दो खामोश दिलों ने
बिना किसी वादे के
एक-दूसरे को समझ लिया था।
Prakhra और Aarav 
फिर वहीं मिले।
ना कोई तय मुलाक़ात,
ना कोई मैसेज,
ना कोई प्लान।
बस क़िस्मत की वही पुरानी आदत —
उन्हें टकरा देने की।
कुछ पल
दोनों ने बस एक-दूसरे को देखा।
जैसे तय कर रहे हों
कि आज क्या कहा जाए
और क्या फिर से
खामोशी में ही छोड़ दिया जाए।
आरव ने पूछा,
आवाज़ में अब पहले जैसी हड़बड़ाहट नहीं थी —
“तुम अब कहाँ तक पहुँच गई हो?”
Prakhra ने खिड़की के बाहर देखते हुए जवाब दिया —
“ज़िंदगी की उसी मंज़िल तक…
जहाँ समझना ज़रूरी है,
पर मिलना नहीं।”
उस एक वाक्य में
उसकी पूरी सच्चाई छुपी थी।
दोनों के सामने चाय रखी थी।
भाप उठ रही थी,
लेकिन किसी ने कप उठाया नहीं।
जैसे दोनों जानते हों —
आज गर्मी चाय में नहीं,
यादों में है।
वो बस एक-दूसरे को देख रहे थे —
शांत,
पर अंदर से
हज़ार बातें एक-दूसरे से टकरा रही थीं।
आरव ने धीरे से कहा —
“कभी-कभी लगता है…
अगर उस दिन हम थोड़ी और कोशिश करते,
तो आज सब कुछ अलग होता।”
उसकी आँखों में
कोई शिकायत नहीं थी,
बस एक थका हुआ सवाल था।
Prakhra ने उसकी तरफ़ देखा।
उस नज़र में
न पछतावा था,
न इल्ज़ाम।
“शायद…”
उसने कहा,
“पर कभी-कभी वक़्त
हमें वही नहीं देता जो हम चाहते हैं,
बल्कि वो देता है
जो हमें समझना होता है।”
उसके शब्द
किसी बहाने की तरह नहीं,
एक स्वीकार की तरह थे।
कुछ देर की चुप्पी छा गई।
वो चुप्पी
अब भारी नहीं थी,
बस सच्ची थी।
फिर आरव ने
धीरे से अपनी जेब में हाथ डाला।
एक मुड़ा हुआ
पुराना paper निकाला।
वही note —
जो सालों पहले लिखा गया था,
पर कभी दिया नहीं गया।
उसने कहा —
“मैंने ये तब लिखा था
जब तुम मुझसे दूर जा रही थी।
तब हिम्मत नहीं हुई थी देने की…
आज दे रहा हूँ।”
उसके हाथ
हल्के से काँप रहे थे।
Prakhra ने paper खोला।
उस पर लिखा था —
“अगर कभी हमारी खामोशियाँ
ज़्यादा बोलने लगें,
तो समझ लेना —
मैं अब भी वहीं हूँ,
बस शब्दों के बिना।”
उसकी उँगलियाँ
काग़ज़ को कसकर पकड़ गईं।
आँखें नम हो गईं।
साँस अटक गई।
वो कुछ कहना चाहती थी,
पर शब्द
गले में फँस गए।
आरव ने उसकी हालत देखी
और बहुत नरमी से कहा —
“मुझे नहीं पता
हम साथ रहेंगे या नहीं…
पर इतना ज़रूर जानता हूँ —
तुम्हारे बिना भी
मैं अधूरा नहीं रहूँगा,
बस थोड़ा शांत हो जाऊँगा।”
उस वाक्य में
प्यार भी था,
और आज़ादी भी।
Prakhra ने
हल्की-सी हँसी के साथ कहा —
“शायद यही प्यार की
असली परिभाषा है —
जहाँ साथ न हो,
पर सुकून हो।”
वो हँसी
दर्द से नहीं,
समझ से भरी हुई थी।
सूरज ढल रहा था।
शाम खिड़की से झाँक रही थी।
काँच पर
धीरे-धीरे धुंध जम गई।
आरव ने उँगली से
उस धुंध पर लिखा —
“Take care, P.”
Prakhra ने
उसी धुंध पर
उसके नीचे लिखा —
“You too, A.”
बस दो अक्षर।
पर उनमें
पूरी कहानी समाई हुई थी।
वो दोनों café से निकले।
कंधे पास थे,
पर रास्ते अलग।
ना कोई वादा,
ना कोई goodbye hug।
बस एक आख़िरी मुस्कान —
जो ये कह गई
कि कुछ रिश्ते
विदा कहकर भी
ख़त्म नहीं होते।
बाहर
बारिश की बूँदें फिर शुरू हो गईं।
हवा में
वही सुगंध थी
जो उनकी पहली मुलाक़ात में थी।
पर इस बार
वो चुप्पी अधूरी नहीं थी।
वो एक
मुकम्मल खामोशी थी —
जिसमें दर्द नहीं,
सिर्फ़ सुकून था। 🌧️
“कभी-कभी मिलन का मतलब
साथ रहना नहीं होता,
बल्कि सही वक्त पर
सही अलविदा कहना होता है।” 🌙
✨ To be continued…
Next Episode — “पहली चुप्पी – आख़िरी याद”