सुबह का तारा
आज के नए ज़माने के शहरों में ज़्यादातर तालीमयाफ़्ता नौजवान अच्छी नौकरी की तलाश में घर-परिवार से दूर दूसरे शहरों या विदेशों में बसना पसंद कर रहे हैं | लिहाज़ा संयुक्त परिवार तो अब पुराने ज़माने की बात हो चुके हैं | परिवार की परिभाषा अब मियाँ-बीवी और एक बच्चे तक सिमट कर रह गई है | कई आज़ाद-ख्याल नौजवानों को तो शादी की बंदिशें भी रास नहीं आ रही हैं और वे लिव-इन रिश्ते में रहना ही पसंद करते हैं जिससे कि बग़ैर भारी-भरकम ज़िम्मेवारियों के शादी-शुदा ज़िंदगी का पूरा लुत्फ़ उठाया जा सके | शहरों की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में मियाँ-बीवी दोनों के नौकरीपेशा होने और करीबी रिश्तेदारों से दूर रहने की वजह से रिश्तों और रिवायतों की बंदिशें आहिस्ता-आहिस्ता ढीली पड़ती जा रही हैं | बच्चे अपने दादा-दादी, नाना-नानी और दूसरे करीबी रिश्तेदारों से करीब-करीब अंजान हैं | इस किस्म की तर्ज़े-ज़िंदगी का एक दु:खद पहलू यह भी है कि आज बुज़ुर्गों की एक बड़ी तादात एकाकी ज़िन्दगी जीने को मजबूर है | जिन माँ-बाप ने ताउम्र कड़ी मेहनत करके अपनी औलादों के उज्ज्वल भविष्य की ख़ातिर उन्हें अच्छी से अच्छी तालीम दिलाई और अपने हर शौक और सपनों को दरकिनार करते हुए उनकी छोटी से छोटी ज़रुरतों का ख्याल रखा, आज वही बुज़ुर्ग ख़ुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं | ऐसी सूरते-हाल में वे गंभीर अवसाद और मुख्तलिफ़ जिस्मानी बीमारियों से जूझ रहे हैं लेकिन उनकी सुध लेने वाला वहाँ कोई नहीं है |
इस कहानी के मुख्य किरदार ऐसे ही दो शहरी बुज़ुर्ग हैं जिनके बच्चे विलायत में एक आरामदेह ज़िंदगी बसर कर रहे हैं जबकि वे दोनों भोपाल शहर की एक ही हाउसिंग सोसाइटी के मुख्तलिफ फ्लैट्स में अकेलेपन की ज़िंदगी जी रहे हैं | आइए अब हम आपका तार्रुफ़ इन दोनों ख़ास पात्रों से करवाते हैं | ये हैं भोपाल विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉक्टर आशुतोष मिश्रा और सेन्ट्रल स्कूल से रिटायर्ड शिक्षिका श्रीमती शमा रिज़वी हैं | एक वक़्त था प्रोफेसर मिश्रा का एक हँसता-खेलता परिवार था लेकिन अचानक वक़्त ने एक ऐसी करवट ली कि उनका खूबसूरत आशियाना ताश के पत्तों की तरह बिखर गया | हालात इस कद्र बिगड़ गए कि मिश्रा जी को अपनी बीवी से तलाक़ लेना पड़ा | तलाक के बाद का वक़्त उनके लिए बहुत ही दुश्वारियों भरा था लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी | उनकी पूरी कोशिश रही कि मियाँ-बीवी के अलगाव का असर उनकी बेटी के भविष्य पर न पड़े | वे हमेशा बेटी के लिए एक प्रेरणास्रोत बने रहें | आखिरकार उनकी कोशिशें रंग लाईं और आज उनकी इकलौती बेटी एक सफल चार्टर्ड एकाउंटेंट है | बेटी की खुशी के लिए उन्होंने उसका ब्याह उसकी पसंद के लड़के से करना क़ुबूल किया जो उन दिनों एक मल्टी-नेशनल कम्पनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था | इन दिनों वे दोनों कनाडा में हँसी-खुशी रह रहे हैं | कुछ ही दिनों पहले उन्हें वहाँ की नागरिकता भी हासिल हो गई है | रिटायरमेंट के बाद मिश्रा जी प्रतियोगी इम्तिहानों की तैयारी के लिए एक कोचिंग चला रहे हैं | अपनी सक्रिय जीवनशैली की वजह से ज़िंदगी के इस मुकाम पर भी वे काफ़ी चुस्त-दुरुस्त दिखाई पड़ते हैं | दूसरी तरफ श्रीमती शमा के शौहर श्री इश्तियाक़ रिज़वी सरकारी महकमे में एक अच्छे ओहदे पर कार्यरत थे जबकि वे ख़ुद शहर के ही एक सेन्ट्रल स्कूल में पोस्ट ग्रैजुएट टीचर के रूप में पदस्थ थीं | बेटा भी शहर के एक नामी स्कूल में पढ़ रहा था | उनकी ज़िंदगी बड़े मज़े में चल रही थी कि अचानक एक ऐसा तूफ़ान आया कि देखते ही देखते सब कुछ बर्बाद हो गया | वह शनिवार का दिन था | दूसरे दिन सबकी छुट्टी थी | इसलिए वीकेंड इंजॉय करने के लिए उस रात वे खाने के लिए बाहर एक होटल में गए थे | वापिस लौटते वक़्त थोड़ी देर हो गई थी | शायद बारह बजे वे घर पहुँचे थे | चौके के ज़रुरी काम समेटते-समेटते शमा जी को आधा-पौन घंटा और लग गया था | दिन भर की थकी होने की वजह से वे बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद में डूब गईं | उनकी आँख लगी ही थी कि शौहर की कराहती हुई आवाज़ से उनकी नींद टूट गई | रिज़वी साहब को सीने में तेज़ दर्द हो रहा था | ज़्यादा वक़्त न गँवाते हुए वे फ़ौरन उनको कार में डालकर ख़ुद ड्राइव करती हुई अस्पताल ले गईं | अस्पताल में डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की भरसक कोशिश की लेकिन शायद खुदा को कुछ और ही मंज़ूर था | आखिरकार रिजवी साहब ने उनकी आँखों के सामने ही दम तोड़ दिया और वे चाह कर भी कुछ नहीं कर पाईं | यह सब कुछ इतनी तेज़ी से घटा कि शमा जी को तो एकाएक यक़ीन ही नहीं हो पा रहा था कि उनके शौहर उन्हें इस दुनिया में हमेशा के लिए अकेला छोड़ गए हैं | शौहर की मौत के बाद का वक़्त शमा जी के लिए काफ़ी मुश्किल था | उन्हें ऐसा एहसास हो रहा था जैसे कि उनको मौसम की मार से बचाने वाली छत अचानक उड़ गई हो और वे अकेली भारी आँधी-बारिश से जूझ रही हों | हर तरफ अँधेरा ही अँधेरा दिखाई पड़ रहा था | अब तक वे हर छोटे से छोटे काम के लिए शौहर पर निर्भर थीं लेकिन उनके जाने के बाद घर-बाहर दोनों की ज़िम्मेदारियाँ उन्हें अकेले ही उठानी थी | यह तो अच्छा था कि वे सेन्ट्रल स्कूल में पढ़ा रही थीं इसलिए उन्होंने स्कूल कैंपस में शिफ्ट होना ही बेहतर समझा | क्वार्टर छोटा ज़रुर था लेकिन यहाँ उनका छोटा सा परिवार पूरी तरह से महफूज़ था | उन्होंने अकेले ही बेटे की तमाम जिम्मेवारियाँ उठाईं और उनकी अथक कोशिशों का ही नतीजा है कि आज उनका बेटा शाहिद एक सफल डॉक्टर है | एम. डी. करने के बाद उसने माँ से अपनी साथी डॉक्टर से निकाह करने की इच्छा ज़ाहिर की | बेटे की खुशी को तरजीह देते हुए उन्होंने उसका निकाह उसकी पसंद की लड़की से कर दिया | शादी के बाद वे दोनों सिंगापुर शिफ्ट हो गए | इन दिनों वे वहाँ के एक बड़े अस्पताल में काम कर रहे हैं | अपनी मसरूफ़ियत की वजह से दोनों शादी के बाद एक बार भी माँ से मिलने नहीं आ पाए हैं | रिटायरमेंट के बाद उन्हें सरकारी क्वार्टर तो छोड़ना ही था लिहाज़ा वे हाल ही में अपने इस छोटे से फ्लैट में शिफ्ट हो गई हैं |
इस तरह एक दूसरे से कमो-बेश अंजान प्रोफ़ेसर मिश्रा और श्रीमती शमा एक ही हाउसिंग सोसायटी में शांत ज़िंदगी बिता रहे हैं | जहाँ शाम के वक़्त मिश्रा जी अक्सर अपनी कोचिंग में मसरूफ रहते हैं वहीं शमा जी की दिनचर्या आमतौर पर घर की चारदीवारी के भीतर ही सिमट कर रह गई है | जब तक वे स्कूल जाती थीं वक़्त अच्छा कट जाता था लेकिन रिटायरमेंट के बाद तो उन्हें समझ ही नहीं आता कि वक़्त कैसे बिताएँ | न कहीं जाना और न कोई आने वाला | ऐसे डिब्बेनुमा फ्लैट में रहकर तो इंसान वैसे भी बाहर की दुनिया से कटकर रह जाता है | जब तक वे ज़मीनी घर में थीं तो हर वक़्त बाहर चहल-पहल दिखती रहती थी | दिन भर किस्म-किस्म के ठेले और खोंचे वाले निकलते रहते थे और शाम को तो मोहल्ले के बच्चों की भारी धमा-चौकड़ी मची रहती थी | अब हालत यह है कि सुबह दस बजे तक सुबह का सारा काम निपट जाता है फिर सामने दिखाई देता है पहाड़ जैसा ख़ाली दिन | और कोई चारा न देख उन्हें टेलीविजन या मोबाइल के सहारे ही वक़्त बिताना पड़ता है | इस किस्म की बेरंग तन्हा ज़िंदगी का सेहत पर असर पड़ना लाज़मी था | लिहाज़ा शमा जी को अब शक्कर और दिल की बीमारियों घेरने लगी हैं | इन सब विषमताओं के बावजूद मिश्रा जी और शमा जी की रोज़ाना की दिनचर्या में एक चीज़ कॉमन है और वह है सुबह की सैर | अपने जैसे कई दूसरे बुज़ुर्गों की तरह वे दोनों भी सुबह करीब छह बजे सोसायटी के बगीचे में सैर करने जाते हैं | मिश्रा जी तो क़रीब एक घंटे तक तेज़ रफ़्तार से वाकिंग ट्रैक पर बगीचे के चक्कर लगाकर और फिर हल्की-फुल्की कसरत करके घर लौट जाते हैं | वहीं दूसरी तरफ़ शमा जी हौले-हौले आठ-दस चक्कर लगाने के बाद बेंच पर बैठकर सुस्ताती हुई दूसरे लोगों को घूमते-फिरते देखती रहती हैं | इस दौरान उन दोनों का क़रीब-क़रीब रोज़ाना ही मिलना हो जाता है | अपनी आदत के मुताबिक़ मिश्रा जी हर गुज़रने वाले से मुस्कुराते हुए दुआ-सलाम करते चलते हैं वहीं दूसरी तरफ़ शमा जी हमेशा संजीदा ही दिखाई देती हैं | एक रिज़र्व स्वभाव की महिला होने की वजह से उन्हें अजनबियों से बिलावजह बात करना पसंद नहीं है लेकिन जब पहली मर्तबा मिश्रा जी ने उन्हें मुस्कुराते हुए नमस्कार किया तो उन्हें भी जवाब में हाथ जोड़ कर नमस्कार करना ही पड़ा | आहिस्ता-आहिस्ता मिश्रा जी को देखते ही हाथ जोड़ कर अभिवादन करना शमा जी की आदत में शामिल हो गया है | हालाँकि वे दोनों नमस्कार करके आगे बढ़ जाते हैं लेकिन मिश्रा जी का मुस्कुराता हुआ चेहरा और उनकी सकारात्मक बॉडी लैंग्वेज बिना कहे बहुत कुछ कह जाती है | ऐसा कहा भी जाता है A smile goes farther than a mile. जो काम सैकड़ों अल्फाज़ नहीं कर पाते हैं वह एक खूबसूरत मुस्कान आसानी से कर जाती है | शमा जी को ज़ाहिरी तौर पर वे एक शरीफ़ और खुशमिजाज़ इंसान जान पड़ते हैं – एक ऐसा शख्स जो अपनी ज़ाती ज़िंदगी से पूरी तरह संतुष्ट है |
मिश्रा जी और शमा जी दोनों की ज़िंदगी अपने जाने-पहचाने ढर्रे पर चल रही थी | बाहर से सामान्य दिखने के बावजूद दोनों अपनी ज़िंदगी में एक अजीब सा ख़ालीपन महसूस कर रहे थे | जब वे बाहर से घर में दाख़िल होते थे तो घर के हर कोने में एक मनहूस सी खामोशी उनका इंतज़ार करते मिलती थी | न घर में कोई था उनका इंतज़ार करने वाला और न ही उन्हें किसी का इंतज़ार था | ख़ुद ही खाना बनाओ और ख़ुद ही खा लो | अगर न भी खाओ तो किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता | साथ में न कोई साथी और न कोई हमदर्द जिससे वे अपने दिल की खुशियाँ, अपने जज़्बात और दर्दो-ग़म साझा कर पाते | ऐसे हालात में ख़ुदा-न-ख़ास्ता अगर कुछ अनहोनी भी हो जाए तो आसपास कोई भी पुरसाने-हाल नहीं है | यह वह मुकाम होता है जब इंसान को एहसास होने लगता है कि उसकी ज़िंदगी का सार्थक भाग ख़त्म हो चुका है और आगे आने वाले दिन बेमकसद से जान पड़ते हैं लेकिन इंसान चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता है | जितनी ज़िंदगी ईश्वर ने किस्मत में लिख दी है उतना तो गुजारनी ही होती है – चाहे हँस के गुज़ारो या रोकर |
इस तरह दिन गुज़र रहे थे | सुबह से रात होती थी और फिर रात से दिन | काल का यह चक्र हर हालात में बाकायदा चलता रहता है | ऐसे ही एक सुबह मिश्रा जी रोज़ की तरह तेज़ रफ़्तार से बगीचे के चक्कर लगा रहे थे जबकि शमा जी एक बेंच पर अपनी चिर-परिचित मुद्रा में बैठी सुस्ता रही थीं | मिश्रा जी तो अपनी धुन में चले जा रहे थे कि अचानक उन्हें दूर से दिखा कि शमा जी बेंच पर लेटी हुई हैं | जैसे ही वे दौड़ कर क़रीब गए तो देखा कि शमा जी दर्द से छटपटा रही थीं | उनको इस हालत में देखकर मिश्रा जी ने फ़ौरन क़रीब के फ़्लैट से पानी लाकर उन्हें दिया | चूँकि ऐसे हालात में वक़्त बहुत कीमती होता है इसलिए एम्बुलेंस का इंतज़ार करने के बजाए वे शमा जी को अपनी कार में नज़दीकी अस्पताल ले गए | मिश्रा जी का शक सही निकला | वह एक हल्का दिल का दौरा था | वक़्त पर मेडिकल मदद मिल जाने से शमा जी की हालत जल्द ही काबू में आ गई | तीन-चार दिन में शमा जी को कुछ ज़रुरी हिदायतों के साथ अस्पताल से छुट्टी दे दी गई | चूँकि शमा जी के साथ कोई नहीं था इसलिए उनके इलाज के दौरान मिश्रा जी लगातार उनके क़रीब बने रहे और उन्हें वक़्त पर खाना, पानी और ज़रुरी दवाएँ बाकायदा देते रहते थे |
ऐसे मुश्किल हालात में जब शमा जी पूरी तरह से बेबस थीं एक अंजान शख्स का यूँ मददगार बनकर उनके क़रीब मौजूद रहना एक सुखद एहसास दिलाता था | मिश्रा जी की शख्सियत के इस पहलू से वे अब तक पूरी तरह से अंजान थीं | कभी-कभी बुरा वक़्त भी अपने पीछे कोई खूबसूरत तोहफा छोड़ जाता है | इस हादसे के बाद से शमा जी के ज़ेहन में मिश्रा जी के लिए इज्ज़त और भी बढ़ गई थी और अब वे उन्हें एक भरोसेमंद दोस्त की तरह देखने लगी थीं | एकाएक उन्हें यह एहसास होने लगा था कि वे अब अकेली नहीं है | उनके क़रीब भी कोई है जिस पर वह भरोसा कर सकती हैं | उस दिन से अपनी हर छोटी-मोटी ज़रुरत के वक़्त उन्हें सबसे पहले मिश्राजी का ही ख्याल आता था और उनके पास भी हर मर्ज़ की दवा मौजूद रहती थी | मिश्रा जी भी गाहे-बगाहे फ़ोन करके उनकी ख़ैरियत दरियाफ़्त करते रहते थे | उनकी हलकी-फुल्की बातें और मज़ाकिया मिजाज़ संजीदे माहौल को भी हल्का बना देते थे | आहिस्ता-आहिस्ता उन दोनों के बीच एक अनकहा दोस्ताना रिश्ता कायम हो रहा था | उन्हें एक दूसरे का साथ अच्छा लगने लगा था | दोस्ती की ऐसी आबो-हवा में तकल्लुफ की चिलमन ज़्यादा देर तक टिक नहीं पाती है | शमा जी को मिश्रा जी की पसंद की डिश बना कर खिलाने में खुशी महसूस होती थी | फ़ुर्सत के लम्हों में वे अक्सर फ़ोन पर या रूबरू घंटों बतियाते रहते | यह उन दोनों के लिए एक खूबसूरत एहसास था जब वे अपने ज़ेहन में एक अरसे से दफ़न जज़्बात, अपनी छोटी-छोटी खुशियाँ और रंजो-ग़म किसी हमदर्द से साझा कर रहे थे |
एक दिन सुबह से ही शमा जी का मन बेचैन हो रहा था | उस दिन वही यादगार तारीख़ थी जब चालीस बरस पहले उनका इश्तियाक़ के साथ निकाह हुआ था | उनके ज़ेहन में रह-रह कर मरहूम शौहर के साथ बिताए गए खूबसूरत लम्हे घूम रहे थे | वह सुन्दर वक़्त एक ख्व़ाब की तरह कितनी जल्दी बीत गया एहसास ही नहीं हुआ | उनसे निकाह से लेकर उनके दर्दनाक इंतकाल तक की सभी खट्टी-मीठी यादें एक फिल्म की तरह आँखों के सामने गुज़र रही थीं | उनके जाने के बाद से वे पूरी तरह तन्हा हो गई थीं | अपने सीमित संसाधनों में उन्होंने बेटे को अच्छी सी अच्छी तालीम दिलवाई | अपने इकलौते बेटे के बेहतर मुस्तकबिल के लिए उन्होंने न जाने कितनी बार अपने शौक और ख़्वाबों को अपने ज़ेहन में ही दफ़न कर लिया था | आज उसी बेटे के पास माँ से मिलने लिए वक़्त ही नहीं मिल रहा है | ज़ेहन में इस तरह उमड़ रहे जज़्बातों से उनकी आँखें नम हो रही थीं | दुपट्टे के एक कोने से किसी तरह इन आँसुओं को पोंछते हुए वे अपना काम करती जा रही थीं | अचानक दरवाज़े की घंटी बज उठी | घंटी की तेज़ आवाज़ से उनकी यादों का सिलसिला अचानक टूट गया और वे हकीकत की दुनिया में वापिस आ गईं | “अब इस वक़्त सुबह-सबह कौन आ गया है ?” बड़बड़ाती हुई वे दरवाज़ा खोलने के लिए बढ़ीं | दरवाज़ा खोलते ही देखा कि मिश्रा जी हाथ जोड़े सामने खड़े हैं | उन्हें देखते ही अपने संजीदे चेहरे पर नकली मुस्कान लाते हुए वे बोलीं, “नमस्कार | आइए, तशरीफ़ रखिए |” ऐसा कहकर वे मेहमान के लिए पानी लाने भीतर चली गईं | फिर एक गिलास पानी लाकर वे करीब ही रखी कुर्सी पर बैठ गईं | लाख कोशिशों के बावजूद भी शमा जी के ज़ेहन में चल रहे तूफान के निशाँ उनके चेहरे पर साफ़ नज़र आ रहे थे | उनकी मन:स्थिति भाँप कर मिश्रा जी ने हौले से पूछा, “आप कुछ परेशान नज़र आ रही हैं | क्या इस बारे में आपकी कोई मदद कर सकता हूँ ? अगर आप मुनासिब समझें तो आप अपनी परेशानी मुझसे साझा कर सकती हैं |” शमा जी वैसे ही भरी हुई बैठी थीं | मिश्रा जी के शमा जी के सवाल पूछते ही वह एकाएक फट पड़ीं | उनके जज़्बात एकाएक बाँध तोड़ते हुए बाहर उमड़ पड़े | आँखों में आँसू भरे हुए वे भर्राई आवाज़ में बोलीं, “नहीं, इस मामले में कोई भी मेरी मदद नहीं कर सकता है | जब खुदा ने ही मेरी किस्मत काली स्याही से लिख दी हो तो इंसान भला कर भी क्या सकता है | अब तो खुदा पर से भी मेरा भरोसा उठ चुका है | मैंने तो ताउम्र अपने सभी फ़र्ज़ पूरी शिद्दत से निभाए हैं, कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, जहाँ तक हो सका गरीबों और मज़लूमों की मदद ही की है | समझ में नहीं आता है कि फिर भी उसने मेरे साथ ऐसी नाइंसाफी क्यों की है ? चालीस बरस की कम उम्र में ही उसने मेरे शौहर को मुझसे जुदा कर दिया | हमारा हँसता-खेलता परिवार बर्बाद हो गया | बेटे शाहिद को बड़ा करने में मुझे क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े हैं मुझे ही मालूम है | उसकी ऊँची पढ़ाई की ख़ातिर मैंने बैंक से अपनी हैसियत से बढ़कर कर्ज़ा लिया और उसके भारी-भरकम सूद को चुकाने के लिए सारी ज़िंदगी किफ़ायत से बसर की जिससे कि बेटे के सारे ख्व़ाब पूरे हो सकें | लेकिन बदले में मुझे क्या हासिल हुआ – सिफ़र | एक बेटा है लेकिन वह भी अब अजनबी हो गया है | दस-पन्द्रह दिन में फ़ोन करके रस्म अदायगी कर लेता है | पिछले महीने मेरी तबियत इतनी ख़राब हुई थी लेकिन उसने फोन पर ही हाल-चाल पूछकर ही अपना फ़र्ज़ निभा दिया | थोड़े दिन पहले मैंने शाहिद को इस साल ईद पर आने के लिए कहा था लेकिन वहाँ से टका सा जवाब मिला, “काम में बहुत मशगूल हूँ, आना मुमकिन नहीं है |” उस एहसान फ़रामोश को एक बार भी अपनी बदनसीब माँ का ख्याल नहीं आया कि वह अकेले किस तरह से जी रही होगी | मैं जीऊँ या मरूँ उसको कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला है | अगर मैं अल्लाह को प्यारी भी हो जाऊँ तो भी उसे आने का वक़्त नहीं मिलेगा |” शमा जी की बातें सुनकर मिश्रा जी बुरी तरह से सकपका गए | शमा जी को इतना गुस्से में उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था | किसी तरह बात को सँभालते हुए वे बोले, “माफ़ कीजिएगा, मेरा मकसद आपका दिल दुखाना नहीं था | सुख-दुःख तो ज़िंदगी का हिस्सा होते हैं | आज अच्छा है तो कल बुरा हो सकता है | भगवान राम भी जब इंसान के रूप में आए तो उन्हें भी नाना प्रकार के दुःख और तकलीफें झेलनी पड़ीं |” मिश्रा जी को बीच में ही काटते हुए शमा जी गुस्से में बोल पड़ीं, “मिश्रा जी, दूसरों को सीख देना बहुत आसान होता है लेकिन जब अपने सिर पर मुसीबत पड़ती है तो समझ में आता है | आप की ज़िंदगी तो बहुत सुख से बीती है इसलिए आप आदर्श भरी बातें कर रहे हैं | मेरी ज़िंदगी तो जहन्नुम जैसी हो चुकी है, मुझे ये प्रवचन अच्छे नहीं लगते |” उनकी बातें सुनकर मिश्रा जी को भी एहसास हो गया कि शमा जी की मौजूदा मन:स्थिति में उनसे कुछ भी कहना बेमतलब है | यह सोचकर वे शमा जी को नमस्कार करके बाहर निकल गए |
रात तक जब शमा जी का गुस्सा ठंडा हुआ तो उन्हें मिश्रा जी से किए गए अपने तल्ख़ बर्ताव के लिए पछतावा होने लगा | इस पूरे जहाँ में मिश्रा जी ही तो उनके एक हमदर्द हैं जो हर सुख-दुःख में उनके साथ खड़े रहते हैं | हार्ट अटैक के वक़्त उनके द्वारा वक़्त पर की गई मदद की बदौलत ही वे आज सही-सलामत हैं | ऐसे भलेमानस शख्स का शुक्रगुज़ार होने के बजाय वे उनसे बदतमीज़ी से पेश आई हैं | इस वाक्ये के बाद तो शायद वह उनसे बात भी करना पसंद न करें | ज़ेहन में ऐसा ख्याल आते ही उन्हें ख़ुद पर शर्म आने लगी | हालाँकि उस वक़्त रात के दस बज रहे थे और शायद मिश्रा जी सो चुके होंगे | फिर भी शमा जी से रहा नहीं जा रहा था और वे उनसे ख़ुद के बर्ताव के लिए माफी माँगना चाहती थीं | ऐसी घड़ी में उन्होंने मिश्रा जी को फ़ोन लगा दिया | दो घंटी के बाद ही बाद ही दूसरी तरफ से “हैलो” की आवाज़ सुनाई दी | कॉल जुड़ते ही शमा जी बोल पड़ीं, “मिश्रा जी, आज सुबह के बुरे बर्ताव के लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूँ | हालाँकि मेरी हरकत माफ़ी के काबिल तो नहीं है फिर भी मेरी आपसे हाथ जोड़ कर इल्तिजा है कि हो सके तो इस नासमझी के लिए मुझे माफ़ करें |” दूसरी तरफ़ से अपने चिर-परिचित अंदाज़ में मिश्रा जी ने हँसते हुए कहा, “शमा जी, आप बेवजह परेशान न हों | मैं आपकी स्थिति अच्छी तरह समझ सकता हूँ | आप जिस मन:स्थिति से गुज़र रही हैं उसमें कभी-कभी ऐसा होता है जब इंसान अपने जज़्बातों पर काबू नहीं रख पाता है | शायद आपको ऐसा महसूस होता होगा कि मेरी ज़िंदगी में सब अच्छा ही अच्छा हुआ है लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है | सच मानिए मैं ख़ुद ऐसे भयावह हालात से गुज़र चुका हूँ जब ऐसा लगता था जैसे कि मैं एक अँधेरे कुएँ में उतरता जा रहा हूँ | दूर-दूर तक कोई उम्मीद की किरण नहीं दिखाई देती थी | कई मर्तबा तो ज़ेहन में यह ख्याल आता था कि ऐसी ज़िंदगी जीने से बेहतर है कि ख़ुदकुशी कर लूँ | लेकिन शायद खुदा को कुछ और ही मंज़ूर था | एक लम्बे इलाज और बहुत कोशिशों के बाद ही मैं उस अवसाद के मुश्किल दौर से उबर सका हूँ | वक़्त के थपेड़े खा-खाकर मैंने यह सबक सीखा है कि ज़िंदगी में ज़्यादातर मौकों पर हमारा हालात पर काबू नहीं रहता है लेकिन कम से कम हम चीज़ों को सकारात्मक रूप से तो ले सकते हैं | जब हालात को नहीं बदला जा सकता है तो क्यों न उन्हें देखने के अपने नज़रिए को ही बदल लें जिससे कि उनका बुरा असर कम से कम हो | ज़्यादा परेशान हो कर अपनी सेहत ख़राब करने से कोई फ़ायदा तो होने वाला है नहीं तो क्यों न ख़ुश रहने की ही कोशिश करें | अब मैंने अपना नज़रिया ऐसा ही कर लिया है कि केवल आज की ही सोचो, कल की परेशानी से कल ही निपटेंगे | मेरी आपसे भी इल्तिजा है कि ख़ुद तजुर्बा करके सीखने से बेहतर है कि आप मेरे जैसे भुक्तभोगी के तजुर्बे से सबक लें और ज़िंदगी को हँसी-खुशी जीना शुरू करें | हर हालात में मुस्कुराने की कोशिश करिए |” मिश्रा जी की मानीखेज़ बातें सुनकर शमा जी थोड़ी देर तक ख़ामोश हो गईं और फिर मुलायमियत से बोलीं, “हर मर्तबा आपसे बात करके मैं बहुत कुछ सीखती हूँ | आज ऐसा एहसास हो रहा है कि आपके चेहरे पर हमेशा तैरने वाली मुस्कराहट के पीछे कितना गहरा दर्द छुपा है | आप हमेशा सभी के साथ खुशियाँ बाँटते चलते हैं लेकिन अपना दुःख अपने भीतर ही छुपा कर रखते है | अगर आप मुनासिब समझें तो आज अपना दर्द भी हमारे साथ बाँट कर देखिए | ऐसा कहा जाता है कि बाँटने से परेशानियाँ ख़त्म तो नहीं होती हैं लेकिन उनकी ख़लिश कुछ कम ज़रुर हो जाती है |” शमा जी की बात सुनकर मिश्राजी थोड़ा सोचते हुए संजीदे आवाज़ में बोले, “बहुत लंबी कहानी है मेरी | समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू करूँ | एक वक़्त था जब मैं अपने परिवार के साथ एक सुखी ज़िंदगी जी रहा था | हमारे छोटे से परिवार में बुज़ुर्ग पिताजी, ख़ूबसूरत धर्मपत्नी जानकी और बेटी मिताली थी जिसे हम प्यार से मिष्ठी कहते थे | मैं और जानकी कॉलेज के दिनों से एक दूसरे से मुहब्बत करते थे | एक ही बिरादरी के होने की वजह से हमारी शादी में कोई ख़ास रूकावटें नहीं आई | जानकी को शुरू से ही नौकरी की बंदिशों में बँधकर रहना पसंद नहीं था | लिहाज़ा उसने एक गृहिणी के रूप में ही रहना पसंद किया | मुझे यूनिवर्सिटी से अच्छी-ख़ासी तन्ख्वाह मिलती थी जिससे कि हमारे सभी शौक पूरे हो जाते थे और साथ ही थोड़ी-बहुत बचत भी हो जाती थी | मिष्ठी भी एक अच्छे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ रही थी | शादी के करीब पाँच बरस बाद पिताजी का एक लंबी बीमारी के बाद इंतकाल हो गया | पिताजी के जाने से मुझे बहुत गहरा झटका लगा था | बचपन से ही मुझे उनसे ख़ास लगाव था | माँ की असमय मृत्यु होने के बाद पिताजी ने ही मेरा पालन-पोषण किया था | माँ-बाप दोनों के फ़र्ज़ अकेले निभा पाना आसान नहीं होता है लेकिन फिर भी पिताजी ने मुझे कभी भी कोई तकलीफ महसूस नहीं होने दी | मेरी खुशी के लिए ही उन्होंने ताउम्र दूसरी शादी नहीं की | एक मामूली क्लर्क की तन्ख्वाह में उन्होंने मुझे एक अच्छी तालीम दिलाई जिससे कि मैं प्रोफ़ेसर जैसे बड़े ओहदे तक पहुँच पाया था | वे हमेशा से ही मेरे उस्ताद और प्रेरणा स्रोत रहे थे | ज़िंदगी के हर एक मुक़ाम पर मैंने उनसे कुछ न कुछ सीखा था | उनके चले जाने के बाद मैं ख़ुद को नितांत अकेला महसूस कर रहा था लेकिन इंसान को नियति के आगे सिर झुकाना ही पड़ता है और यही कुदरत का नियम है | मैंने भी इसे ईश्वर की मर्ज़ी के रूप में तस्लीम कर लिया | थोड़े दिन बाद ज़िंदगी फिर अपने पुराने ढर्रे पर लौटने लगी थी | मेरे अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए यूनिवर्सिटी ने मुझे कम उम्र में ही हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट के अहम ओहदे पर तरक्की दे दी | तरक्की मिलने के साथ मेरी ज़िम्मेवारियों में भी कई गुना इज़ाफा हो गया | महीने में करीब आठ-दस दिन तो मैं सरकारी टूर पर शहर के बाहर रहता था और जब भी मैं शहर में रहता तो सुबह जल्दी ही घर से निकल जाता और शाम को काफ़ी देर से घर लौटता | दिन भर की भागम-भाग के बाद मुझमें इतनी भी ताकत बाक़ी नहीं बचती थी कि बीवी-बच्ची के साथ कुछ वक़्त बिता पाऊँ | खाना खाते ही बस बिछौना ही नज़र आता था | बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद में सो जाता था और सुबह से फिर शुरू हो जाती वही भागम-भाग | शुरुआत में तो जानकी को यह सब सामान्य लगा लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता उसे ऐसी ज़िंदगी से उकताहट होने लगी थी | एक वक़्त था जब मैं उसके हर छोटी से छोटी खुशी का ख्याल रखता था और हर शनिवार की शाम को हम बाकायदा होटल में खाना खाने जाया करते थे | अक्सर इतवार को सिनेमा देखने का प्रोग्राम बन जाता था | लेकिन तरक्की के बाद मुझे घर-गृहस्थी की तरफ़ देखने की फ़ुर्सत ही नहीं थी | यहाँ तक कि छुट्टी के दिन भी कोई न कोई मीटिंग निकल आती थी | अगर छुट्टी के दिन ख़ाली भी रहता तो दिन भर आराम करके अपनी थकान उतारता रहता था | इस मुतल्लिक जानकी से मेरी कई बार तकरार हो जाती थी | उसका कहना होता कि दुनिया में सभी अपना काम-धंधा करते हैं लेकिन वे अपने बीवी-बच्चों के लिए तो वक़्त निकाल ही लेते हैं | अगर ऐसी ही ज़िंदगी बसर करनी थी तो ब्याह किया ही क्यों ? बाज़ दफ़ा उसे मेरे डिपार्टमेंट में ही काम करने वाले चपरासी के परिवार को देखकर भी ईर्ष्या होने लगती थी | उसकी नज़र में कम आमदनी के बावजूद भी वह एक सुखी ज़िंदगी बिता रहा था | शाम को ठीक पाँच बजे वह घर पहुँच जाता था और शाम को सात-आठ बजे दोनों मियाँ-बीवी तसल्ली से घूमते और बतियाते हुए नज़र आते थे | आज मुझे एहसास होता है कि उसकी शिकायत पूरी तरह से जायज़ थी और मैं कितना ग़लत था | उन दिनों जानकी की दिनचर्या केवल वक़्त पर खाना बनाना, घर की साफ़-सफ़ाई, बेटी की पढ़ाई की निगरानी और परिवार के लोगों की ज़रूरतों का ख्याल रखने तक सिमट कर रह गई थी - न कहीं आना और न ही कहीं जाना | उसका दिन भर मैक्सी में ही निकल जाता था | ऐसे हालात में जानकी का यह कहना कि उसकी ज़िंदगी एक नौकरानी की तरह होकर रह गई है एक कड़वा सच था | आहिस्ता-आहिस्ता ये नकारात्मक एहसास अवसाद की शक्ल लेने लगे | हमेशा हँसने-मुस्कुराने वाली जानकी अब चिड़चिड़ी और गुस्सैल जान पड़ती थी |
लेकिन उस वक़्त मेरे पास कहाँ फ़ुर्सत थी बीवी की सुध लेने की | मैं तो अपनी ही दुनिया में मग्न था | काम के अलावा और कुछ नज़र ही नहीं आता था | वक़्त तेज़ी से बीतता जा रहा था, सुबह से रात और रात से सुबह कब होती थी मुझे ख़बर ही नहीं थी | अचानक एक दिन मुझे उड़ती-उड़ती ऐसी ख़बर मिली जिससे कि मेरे होश ही उड़ गए | ऐसा लगा जैसे कि पाँवों तले ज़मीन खिसक गई हो और मैं सैकड़ों फिट गहरे अँधे कुएँ में गिर गया हूँ | मुझे अच्छी तरह से याद है वह दिन जब मैं सुबह के वक़्त डिपार्टमेंट में दाख़िल हो रहा था और मेरी मौजूदगी से अंजान कुछ ड्राइवर और चपरासी मेरे मुत्तलिक चकल्लस करने में मशगूल थे | बातों का मजमून कुछ यूँ था कि जानकी का डिपार्टमेंट के ही एक नौजवान लैब असिस्टेंट शिवा के साथ ताल्लुकात हैं | उस वक़्त तो मैं उनकी बातों को नज़रंदाज़ करता हुआ आगे बढ़ गया लेकिन रह-रह कर वे बातें मेरे कानों में गूँज रही थीं | ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने मेरे कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया हो | पूरी ज़िंदगी में यह पहला मौक़ा था जब किसी ने मेरी बीवी के बारे में ऐसे घटिया अल्फाज़ों का इस्तेमाल किया था | मुझे जानकी पर ख़ुद से भी ज़्यादा भरोसा था | मैं ख्व़ाब में भी तस्सवुर नहीं कर सकता था कि उसके किसी ग़ैर मर्द के साथ ताल्लुकात हो सकते हैं | मैंने कई मर्तबा उन बातों को झटककर दरकिनार करना चाहा लेकिन मैं जितना उनसे भागने की कोशिश करते उतना ही वे मेरा पीछा करते जाते | यह मसला भी कुछ ऐसा था कि इस बारे में दूसरों से दरियाफ़्त नहीं किया जा सकता था | दिमाग़ी तनाव से मेरा सिर फटा जा रहा था और मैं चाह कर भी काम पर फोकस नहीं कर पा रहा था | उस दिन मैं दफ्तर में ज़्यादा वक़्त बैठ नहीं पाया और आधे दिन की छुट्टी लेकर घर आ गया |
उस वक़्त दोपहर का करीब एक बजा था और मिष्ठी की स्कूल बस को आने में चार घंटे बाक़ी थे | घर का दरवाज़ा बंद था | चूँकि दरवाज़े पर अंदरूनी ताला लगा था इसलिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि जानकी घर के भीतर है या कहीं बाहर गई हुई है | बहरहाल बीवी को बिलावजह परेशान न करने के इरादे से मैं बैग में ही रखी हुई डुप्लीकेट चाभी से ताला खोलकर भीतर दाख़िल हुआ | घर में घुसते ही बेडरूम से आ रही जानकी और एक मर्दानी आवाज़ सुनकर मैं चौंक गया | दिल किसी अनहोनी की आशंका से जोर-जोर से धड़कने लगा | बेडरूम का दरवाज़ा सिर्फ़ भिड़ा हुआ था | जैसे ही मैंने दरवाज़े को हौले से धक्का दिया तो कमरे के भीतर मैंने जो देखा वह मैं कभी ख्व़ाब में भी तसव्वुर नहीं कर सकता था | अपनी आँखों के सामने अपनी जान से प्यारी बीवी को ग़ैरमर्द की बाहों में पाकर मैं कुछ लम्हों के लिए जड़वत रह गया था | हाथ का बैग छूटकर नीचे फ़र्श पर गिर गया था | शौहर को अचानक अपने सामने देखकर जानकी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी थीं | सकपकाकर वह फ़ौरन शिवा से झटक कर अलग हो गई | रँगे हाथों पकड़े जाने की वजह से वह मुझसे नज़रें नहीं मिला पा रही थी | वह सिर झुकाए अपना पल्लू ठीक करती रही जबकि शिवा बेशर्मी से मुझे नमस्कार करते हुए फुर्ती से घर के बाहर चला गया | उस वक़्त तो मेरा दिमाग़ सुन्न हो गया था और कुछ भी समझ नहीं पड़ रहा था | मेरी दशा एक ऐसे प्रेमी की थी जिसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी जान से प्यारी प्रेमिका ने क्यों उसकी पीठ पर यूँ छुरी भोंक दी थी | अपनी बेवफा प्रेमिका को न तो वह अपना कह सकता था और न ही उसे नुकसान पहुँचा सकता था क्योंकि वह अभी भी उससे मुहब्बत करता था | अगर मेरी जगह कोई और मर्द होता तो शायद उसने मौके पर ही अपनी बीवी और उसके आशिक का क़त्ल कर दिया होता लेकिन शायद मेरी शिक्षा और संस्कारों ने हाथ-पैरों में जंजीरें डाल दी थीं | सदमे की वजह से मेरे अल्फाज़ हलक से बाहर नहीं निकल पा रहे थे | जिस्म में खड़े रहने लायक ताकत भी नहीं बची थी | ज़ेहन के भीतर उफ़न रहे ज्वालामुखी को किसी तरह दबाते हुए मैंने जानकी को कमरे से बाहर जाने का इशारा किया और ख़ुद निढाल होकर पलंग पर गिर पड़ा | मौके की नज़ाकत को भाँपते हुए जानकी फ़ौरन ही कमरे से बाहर निकल गई |
इस हादसे के बाद से हम मियाँ-बीवी के बीच एक दीवार सी खड़ी हो गई थी | बार-बार ज़ेहन में यह ख्याल आता कि शादी के पन्द्रह साल बाद भी मैं अपनी बीवी को पहचान नहीं सका था | जिस औरत के सुन्दर चेहरे पर मैं दिलो-जान से फ़िदा था उसकी सीरत इतनी ज़हरीली हो सकती है इसका मुझे ख्व़ाब में भी ग़ुमान नहीं था | उन दिनों मैं पूरी तरह से टूट चुका था | नाउम्मीदी ने मुझे बुरी तरह से जकड़ रखा था | हर तरफ अँधेरा ही अँधेरा दिखाई पड़ता था | कई दिनों तक मैंने ख़ुद को एक छोटे से कमरे में कैद कर लिया था | न कहीं आना-जाना, न किसी से मिलना और न ही किसी से बातचीत | फोन भी स्विच ऑफ कर रखा था | इस तरह से मैं बाहरी दुनिया से बिलकुल कटा हुआ था | नाउम्मीदी के उस दौर में एक दिन ऐसे ही ख्याल आया कि आख़िर मैं इस तरह कब तक मातम मनाता रहूँगा | करीब एक महीने का वक़्त गुज़र चुका था | इस दौरान न तो मैंने दफ्तर से छुट्टी ली थी और न ही किसी किस्म की इत्तिला दी थी | हो सकता है कि दफ़्तर से फ़ोन और ईमेल वगैरह से पैग़ाम आए हों लेकिन मैंने तो हर तरफ़ से ख़ुद को अलग-थलग कर रखा था | अगर ऐसे हालात कुछ वक़्त और बने रहे तो नौकरी भी हाथ से छूटने का ख़तरा था | ज़िंदगी की हक़ीकत जज्बातों से नहीं बदला करती है | यहाँ इंसान को अपनी हर छोटी से छोटी ज़रुरत पूरी करने के लिए पैसों की ज़रुरत पड़ती है | मरने के बाद भी इंसान का अंतिम संस्कार मुफ़्त नहीं होता है, वहाँ भी अच्छी-ख़ासी रक़म खर्च हो जाती है | बिना आमदनी के कुछ महीने तो बैंक में जमा पैसों से काम चल सकता था लेकिन उसके बाद क्या ? घर का किराया, खाना-पीना, कपड़े-लत्ते, बेटी की पढ़ाई, बिजली, गैस, पेट्रोल, फ़ोन, केबल, टूट-फूट की मरम्मत आदि सैकड़ों ज़रुरी खर्चे आख़िर कैसे पूरे होंगे | घर को तो हर सूरत में चलाना ही था | ज़ेहन में यह ख्याल आते ही मैंने दूसरे दिन से ही दफ़्तर जाने का इरादा कर लिया | दफ़्तर जाने से दिन भर तो काम की गहमा-गहमी में निकल जाता था लेकिन घर में घुसते ही उसी तनाव भरे माहौल से सामना होता था | हम मियाँ-बीवी एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अजनबी हो चुके थे | एक वक़्त वह भी था जब हम मिलने के लिए बेकरार रहते थे लेकिन आज हमें आपस में बात किए हुए कई महीने निकल गए थे |
इस दौरान कई मर्तबा ज़ेहन में यह ख्याल आता था कि ऐसे मुर्दा रिश्ते को ढोए जाने का क्या मतलब है लेकिन मेरे दिल के किसी कोने में यह मृतप्राय रिश्ता अभी भी साँसें ले रहा था | इतना सब गुज़र जाने के बावजूद भी मैं कभी जानकी से नफ़रत नहीं कर सका | दूसरी तरफ जानकी के दिल में कुछ और ही चल रहा था | एक दिन शाम को जैसे ही मैं घर में दाख़िल हुआ तो वहाँ जानकी के साथ शिवा को देखकर मेरा पारा अचानक चढ़ गया | मैं एक लम्हे के लिए भी उसे बर्दाश्त नहीं कर सकता था | उस दिन हमारी जमकर तू-तू-मैं-मैं हुई | ज़ाहिर है कि जानकी भी शिवा का साथ दे रही थी | इसी गहमा-गहमा में जानकी ने घोषणा कर दी कि अब वह मेरे साथ मियाँ-बीवी की तरह नहीं रह सकती है | उसे तलाक चाहिए था | मैंने उसे बेटी का हवाला देते हुए लाख समझाना चाहा कि कम से कम बेटी के भविष्य की ख़ातिर इस रिश्ते को यूँ न तोड़े लेकिन वह अपने फैसले पर अडिग थी | हारकर मुझे उसके सामने हथियार डालने पड़े और आखिकार एक दिन हमारा तलाक़ हो गया |
अवसाद के इस लम्बे दौर का मेरी सेहत पर असर पड़ना लाज़मी था | किस्म-किस्म की बीमारियों ने मुझे घेर लिया था | मुझे रोज़ सुबह-दोपहर-शाम कई तरह की रंग-बिरंगी गोलियाँ और टेबलेट्स निगलनी पड़ती थी | कम उम्र में ही मैं काफ़ी कमज़ोर और उम्रदराज़ दिखने लगा था | एक लम्बे इलाज के बाद ही मैं ख़ुद अपनी क़ैद से आज़ाद हो पाया था | आहिस्ता-आहिस्ता मेरा खोया हुआ आत्म-विश्वास वापिस मिल गया | इस हादसे ने मेरे ज़िंदगी के प्रति नज़रिए को ही बदल कर रख दिया है | आज मैं सिर्फ़ वर्तमान में जीता हूँ | हमारी ज़िंदगी में हज़ारों दुश्वारियाँ हो सकती हैं लेकिन इसके बावजूद भी कम से कम एक-दो तो ऐसी सकारात्मक बातें होंगी जो हमारे चेहरों पर मुस्कराहट ला सकती हो | हमें इन्हीं को ध्यान में रखते हुए ख़ुश रहने की कोशिश करनी चाहिए | अगर आपको मायूसी से बचना है तो कभी किसी से किसी किस्म की कोई उम्मीद मत रखिए | अगर सामने वाले ने कुछ नहीं किया तो कोई ग़म नहीं और कभी कुछ कर दिया तो यह आपके लिए बोनस होगा | अब यही मेरी ज़िंदगी का मूलमंत्र बन गया है | आपके बेटे की तरह मेरी बेटी भी विलायत में जा कर बस गई है लेकिन अपने इस नए नज़रिए की बदौलत ही मैं अकेलेपन के बावजूद एक शांत और सेहतमंद ज़िंदगी जी पा रहा हूँ | तो यह है मेरी राम कहानी | बातों ही बातों में बहुत वक़्त गुज़र गया, एहसास ही नहीं हुआ | अब बहुत देर हो चुकी है इसलिए आज की सभा यहाँ ही ख़त्म करते हैं | कल सुबह फिर बगीचे में मुलाक़ात होगी |” थोड़ा ठहर कर शमाजी ने जवाब दिया, “आपकी कहानी ने तो आज मुझे बहुत रुलाया है | मैं ख्वाब में भी नहीं सोच सकती थी कि एक हँसते-मुस्कुराते हुए इंसान के दिल में इतना दर्द छुपा हो सकता है | माफ़ी चाहती हूँ कि मैंने नाहक आपके ज़ख्मों को फिर से ताज़ा कर दिया | शब्बा ख़ैर |”
दूसरे दिन सुबह जब शमा जी सोकर उठीं तो वे काफ़ी तारो-ताज़ा महसूस कर रही थीं | मिश्रा जी के कहे हुए अल्फाज़ रह-रहकर उनके ज़ेहन में गूँज रहे थे | उन्हें भी एहसास होने लगा था कि चौबीसों घंटे फ़िक्र में डूबे रहने से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला है | इससे केवल उनकी ही सेहत पर बुरा असर होगा जिसे ख़ुद उनको ही भुगतना पड़ेगा | जब उनके साथ कोई नहीं है तो क्यों न वे ख़ुद अपना ख्याल रखें और बाक़ी बचे हुए दिन हँसते-मुस्कुराते हुए गुज़ारें |
वह ईद का मुबारक दिन था | शमा जी नमाज़ पढ़ कर उठी ही थीं कि दरवाज़े की घंटी बज उठीं | दरवाज़ा खोलते ही देखा कि सामने मिश्रा जी खड़े मुस्कुरा रहे थे | शमा जी उन्हें बाइज्ज़त भीतर ले गईं | सोफे पर बैठते हुए मिश्रा जी ने हाथ जोड़ते हुए उन्हें ईद की दिली मुबारकबाद दी | जवाब में शमा जी ने भी मुस्कुराते हुए उन्हें त्योहार की मुबारकबाद दी | थोड़ी देर में शमा जी भीतर चौके से एक ट्रे में सेवियाँ और पानी का गिलास रखकर कमरे में दाख़िल हुई और मेज़ पर ट्रे रखते हुए बोलीं, “एक ज़माना था जब ईद के दिन घर में ढेर सारी सेवियाँ बनती थीं | खाने वाले भी कई थे | उनको मीठा खाने का बहुत शौक़ था | अब इस अकेली जान के लिए इतना सब झंझट फैलाने का मन नहीं करता है | इस बार बहुत हिम्मत करके थोड़ी सी सेवियाँ बनाई हैं | ज़रा चख कर तो बताइए कि कैसी बनी है ?” मिश्रा जी तो पहले ही सेवियों की ख़ुशबू से बेचैन हो रहे थे | मुँह में पहला लुख्मा डालते ही एकाएक उनके मुँह से निकला, “लाजवाब | भई, बहुत लज़ीज़ बनी है | मज़ा आ गया | अब तो हर ईद पर आपके घर पर धावा बोलना पड़ेगा |” फिर बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने पूछा, “इस बार ईद के मौके पर आपने खुदा से क्या दुआ माँगी ?“ जवाब में शमा जी हौले से बोलीं, “उम्र के इस आख़िरी पड़ाव पर ऊपरवाले से बस इतनी सी इल्तिजा है कि वे आख़िरी साँस तक मुझे चलता-फिरता बनाए रखे जिससे कि मैं अपनी छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिए कभी किसी की मोहताज न रहूँ | लेकिन ख़ुद के चाहने से क्या होता है | वही होता है जो मंज़ूरे-खुदा होता है | वह जिस हाल में रखेगा, उसी में रहना पड़ेगा |” मिश्रा जी का दूसरा सवाल पहले से भी कहीं ज़्यादा अप्रत्याशित था | उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा, “आप दूसरी शादी के बारे में क्यों नहीं सोचती हैं ?” मिश्रा जी के इस अप्रत्याशित सवाल से शमा जी भौंचक्की रह गईं | उनके इस बेतुके सवाल का एकाएक उन्हें कोई जवाब नहीं सूझ रहा था | थोड़ी देर ठहर कर शमा जी ने क़रीब-क़रीब झुँझलाते हुए थोड़ी ऊँची आवाज़ में उत्तर दिया, “आपका दिमाग़ तो ठिकाने पर है जो इस तरह के उल-जुलूल सवाल कर रहे हैं | साठ बरस की उम्र में शादी का भला क्या तुक है ? क्या बिरादरी और जान-पहचानवालों के सामने तमाशा बनवाना चाहते हैं मेरा ? भला लोग क्या कहेंगे – बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम |” मिश्रा जी को उनसे कुछ ऐसे ही जवाब की उम्मीद थी | उन्होंने मुलायम आवाज़ में कहा, “आप मुझे ग़लत समझ रही हैं | आपको तकलीफ देने का मेरा कोई इरादा नहीं था | मेरी समझ के मुताबिक़ तो उम्र बस एक नंबर है जिसमें हर बरस एक का इज़ाफा हो जाता है | हम नाहक बढ़ती उम्र को एक बोझ समझ बैठते हैं और जीने की इच्छाशक्ति खोने लगते हैं | ज़िंदगी तो जिंदादिली का नाम है, मुर्दादिल क्या ख़ाक जिया करते हैं | इस ज़िंदगी को तो आख़िरी दम तक जिया जाना चाहिए | क्या साठ बरस का होते ही इंसान ख़ुश रहने का हक़ खो बैठता है ? क्या उसे सिर्फ़ मौत का इंतज़ार करते हुए अपने बाक़ी के दिन गुज़ार देने चाहिए ? दरअसल एक क़रीबी साथी की सबसे ज्यादा ज़रुरत इसी उम्र में होती है, एक ऐसे साथी की जिसके साथ वह अपनी खुशियाँ, अपने ग़म, अपने ख्यालात साझा कर सके और मुस्कुराते हुए बाक़ी के दिन गुज़ार सके | आप किस बिरादरी और किन जान-पहचानवालों का ज़िक्र कर रही हैं ? क्या इनमें से कोई मुश्किल वक़्त में आपके साथ खड़ा हुआ था ? जब ज़माने को आपकी फ़िक्र नहीं है तो आप क्यों ज़माने को ज़रुरत से ज़्यादा तवज्जो दे रही हैं ? अगर फिर भी आपको लगे कि मेरे अल्फाज़ों से आपको तकलीफ पहुँची है तो मैं सच्चे दिल से आपसे माफ़ी माँगता हूँ और यदि आप मेरे नज़रिए से इत्तफाक़ रखती हैं तो बताइएगा कि क्या हम दोनों आगे के सफ़र में साथ-साथ चल सकते हैं ? आपके जवाब का मुझे इंतज़ार रहेगा |”
उस वक़्त तो शमा जी ने मिश्रा जी की बातों पर कोई टिप्पणी नहीं की | उनके रुख से ऐसा जान पड़ता था जैसे कि उन्हें मिश्रा जी की इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी लेकिन कुछ घंटों बाद मिश्रा जी के अल्फाज़ों ने एक बार फिर शमा जी को सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या उनका नज़रिया सही है | उस रात वे सुकून से सो भी न पाई थीं | दिमाग़ में ख्यालों की आवा-जाही का सिलसिला बराबर चलता रहा | रह-रहकर मिश्राजी के अल्फाज़ उनके कानों में गूँज रहे थे | उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कि वे एक ऐसे दोराहे पर खड़ी हैं जहाँ दिल और दिमाग़ के नज़रियों में एक सौ अस्सी डिग्री का फ़र्क था | एक तरफ़ दिल उन्हें एहसास करा रहा था कि उनकी मौजूदा ज़िंदगी कितनी तन्हा और तकलीफदेह है | आगे के दिन जाने कैसे होंगे अल्लाह ही जानता है | अगर ख़ुदा-न-ख़ास्ता भविष्य में वे बिस्तर पर आ गईं तो कौन उनकी तीमारदारी करेगा | हो सकता है कि वे बिना इलाज के ही अल्लाह को प्यारी हो जाएँ | ऐसी सूरत में कम से कम दो-तीन दिन तक तो किसी को ख़बर भी नहीं लगेगी | जब मुर्दा जिस्म की सड़ाँध फैलने लगेगी तब ही लोग दरवाज़ा तोड़ कर भीतर आएँगे | ऐसे सूरते-हाल में अगर दो तन्हा बुज़ुर्ग एक दूसरे का सहारा बनना चाहते हैं तो ज़ाहिरी तौर पर इसमें कुछ भी ग़लत नज़र नहीं आता है | दूसरी तरफ दिमाग का कहना था कि इस ख्याल को अमली जामा पहनाना इतना आसान नहीं है | क्या ज़माना ऐसे रिश्तों को तस्लीम करेगा ? उनके बेटा-बहू, बिरादरीवाले और जान-पहचानवाले उनके इस अजीबो-ग़रीब कदम पर रज़ामंद होना तो दूर, उनका मखौल उड़ाने से भी पीछे नहीं हटेंगे | शाहिद कभी भी माँ की दूसरी शादी क़ुबूल नहीं करेगा ? हो सकता है कि वह मिश्रा जी के साथ बदतमीज़ी से भी पेश आए | हाथा-पाई की भी नौबत आ सकती है | नुक्कड़ पर खड़े शोहदे आते-जाते उन पर बेहूदा फब्तियाँ कसेंगे | बुजुर्गों की देखभाल करने के लिए तो कोई आगे आता नहीं है लेकिन मज़ाक उड़ाने वालों की यहाँ कोई कमी नहीं है | आज के ज़माने में जहाँ एक ओर कई नौजवान शादी के बजाए लिव-इन रिश्ते में रहना पसंद कर रहे हैं और बहुत से माँ-बाप इसे स्वीकार भी कर रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ़ बुज़ुर्गों के शादी करने को अभी भी लोग हिकारत की नज़र से देखते हैं | वे ताउम्र इज्ज़त से जीती आई हैं और आज तक किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उनसे बदतमीज़ी से पेश आए | अब ज़िंदगी के इस मुकाम पर आकर उनके लिए ऐसी ज़िल्लत बर्दाश्त करना आसान नहीं होगा | मर्द तो किसी तरह ज़माने से टकरा सकते हैं लेकिन औरतों के लिए समाज अभी भी इतना आज़ाद-ख्याल नहीं है | ऐसा सोचते-सोचते कब उनकी आँख लग गई पता ही नहीं चला |
रात में ठीक से न सो पाने की वजह दूसरे दिन सुबह शमा जी की आँख कुछ देर से खुली और ऊपर से सिर भी भारी हो रहा था | देर हो जाने की वजह से उन पर सुस्ती हावी होने लगी थी | इसलिए उन्होंने सैर पर जाने का ख्याल छोड़ दिया और चाय का प्याला व अखबार लेकर बालकनी में बैठ गईं | बालकनी में सूरज की किरणें पसरी हुई थीं | मौसम की गुलाबी ठंड में गुनगुनी धूप का एहसास बहुत भला लग रहा था | इतवार का दिन होने की वजह से सामने बगीचे में अभी भी कुछ लोग सैर कर रहे थे जबकि कुछ जोड़े बेंच पर बैठे हुए बतिया रहे थे | मियाँ-बीवी का यूँ साथ-साथ सुकून के लम्हे गुज़ारना एक बहुत ही सुखद एहसास दे रहा था | उनके ज़ेहन में भी शौहर के साथ बिताए गए ऐसे वक़्त की यादे ताज़ा हो आईं | जब तक वे साथ थे तो ज़िंदगी कितनी हसीं जान पड़ती थी | घर के कोने-कोने में ज़िंदगी का उल्लास दिखाई देता था लेकिन उनके जाते ही वही दुनिया इतनी बदरंग दिखाई देने लगी है | वे आज भी पहली की तरह सुबह जल्दी उठती हैं, वैसे ही खाना पकाती हैं, घर की सफ़ाई करती हैं, कपड़े धोती हैं, वगैरह-वगैरह लेकिन अब वह पुरानी गर्माहट महसूस नहीं होती है | सब कुछ मशीनी जान पड़ता है | आज घर में पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा विलासिता के सामान मौजूद हैं लेकिन यहाँ हर तरफ़ एक अजीब सी ख़ामोश मनहूसियत पसरी रहती है | न कोई बोलने वाला, न कोई सुनने वाला और न ही कोई आपके जज्बातों को महसूस करने वाला | तन्हाई के इस दर्द का एहसास वही कर सकता है जो इस दौर से गुज़रता है | औरों को आपकी दुश्वारियों से कोई वास्ता नहीं है | इस तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में सभी अपनी-अपनी जिंदगियों में इतने मशग़ूल हैं कि उन्हें दूसरों की सुध लेने की फुर्सत ही कहाँ है | साहिर लुधियानवी ने भी क्या ख़ूब लिखा है:
“कौन किसकी ख़ातिर रोता है ऐ दोस्त,
हर एक को अपनी ही किसी बात पर रोना आया |”
शायद मिश्रा जी का कहना दुरुस्त है कि जब ज़माने को हमारी फ़िक्र नहीं तो हम नाहक उसके बारे में सोच-सोच कर क्यों दुबले हुए जाते हैं | अगर हम वास्तव में अपनी दशा बदलना चाहते हैं तो इसके मुत्तलिक कदम तो बढ़ाना ही पड़ेगा | अल्लाह भी उनकी मदद करता है जो ख़ुद अपनी मदद करते हैं |
ज़ेहन में ऐसा ख्याल आते ही शमा जी काफ़ी सुकून महसूस कर रही थीं | उनका सिरदर्द अब काफ़ूर हो चुका था | दिल की खुशी ख़ुद-ब-ख़ुद ही एक पुराने गीत की शक्ल में उनके होठों पर छलक पड़ी -
“गया अन्धेरा हुआ उजारा,
चमका-चमका सुबह का तारा |
टूटे दिल का बँधा सहारा,
चमका-चमका सुबह का तारा |”