Deewane Ki Diwaniyat - Episode in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | दीवाने की दिवानियत - एपिसोड 5

Featured Books
Categories
Share

दीवाने की दिवानियत - एपिसोड 5

एपिसोड 5: नई आग के सुरनई सुबह की उम्मीदसूरज की पहली किरणें दरभंगा के स्टेशन इलाके पर पड़ रही थीं। मशीनें गरजने लगी थीं, और मजदूर काम में जुटे थे। सनाया अभी भी उसी पत्थर पर बैठी थी, जहां कल शाम पृथ्वी ने उसका हाथ थामा था। उसकी आंखें सूजी हुई थीं, लेकिन दिल में एक अजीब शांति थी। 25 साल की दुश्मनी खत्म हो चुकी थी, पर उसके पिता की हथकड़ी उसके सीने पर भारी पड़ रही थी।पृथ्वी जिप्सी से उतरा और उसके पास आया। उसके चेहरे पर थकान थी, लेकिन आंखों में चमक। "सनाया, चलो। IG साहब बुला रहे हैं। तेरे पापा के केस की रिपोर्ट करनी है।"सनाया ने सिर झुकाया। "मैं जा नहीं सकती, पृथ्वी। वो मेरे पापा हैं। जेल में बंद हैं, और मैं... मैंने ही उन्हें वहां पहुंचाया।"पृथ्वी ने उसका कंधा थपथपाया। "तूने उन्हें बचाया है, सनाया। अगर वो आज भी वही रास्ता चुनते, तो दरभंगा का खून बहता। चल, सबूत तेरे ही हैं। IG साहब तुझे सम्मान देंगे।"जेल की साजिशदरभंगा सेंट्रल जेल के अंदर भानु प्रताप ठाकुर की आंखें लाल थीं। हथकड़ियां उनके हाथों को जकड़ रही थीं, लेकिन उनका अहंकार अब भी बरकरार था। सेल के बाहर कालिया खड़ा था, जिसे जमानत पर छोड़ दिया गया था।"ठाकुर साहब, बाहर सब गड़बड़ है। स्टेशन का काम जोरों पर है। वो राठौर का बेटा दिन-रात तैनात है। और सनाया... वो उसके साथ घूम रही है," कालिया ने फुसफुसाते हुए कहा।भानु प्रताप ने लोहे की सलाखों को मुट्ठी से पकड़ा। "सनाया? मेरी अपनी खून की गद्दार? सुन, कालिया। बाहर जाकर मेरे पुराने दोस्त रघुनाथ सिंह को बुला। वो MLA हैं, और मेरे कर्ज में डूबे हुए हैं। बता उन्हें, अगर उन्होंने मेरी मदद नहीं की, तो उनके काले कारनामे सामने आ जाएंगे। स्टेशन की जमीन पर हमला बोलना है। इस बार आग लगा देंगे।"कालिया ने सिर हिलाया और बाहर निकल गया। भानु प्रताप ने दीवार पर थूक दिया। "पृथ्वी राठौर, तूने मेरा घर तोड़ा। अब मैं तेरी जिंदगी जला दूंगा। सनाया को भी सबक सिखाऊंगा।"आईजी ऑफिस का सम्मानIG ऑफिस में सनाया और पृथ्वी के सामने IG रावत बैठे थे। फाइलें मेज पर बिखरी हुई थीं—भानु प्रताप के तहखाने से निकले नकली दस्तावेज, हथियारों की लिस्ट, और पुराने लैंड स्कैम के सबूत।"मिस ठाकुर, आपने साहस दिखाया," IG ने कहा। "आपके पिता के खिलाफ ये सबूत शहर को बचा लेंगे। हम कोर्ट में मजबूत केस बनाएंगे।"सनाया ने सिर झुकाया। "सर, वो मेरे पापा हैं। सजा हो, लेकिन इंसाफ हो।"IG ने मुस्कुराया। "इंसाफ ही होगा। और पृथ्वी, तुम्हारी टीम को प्रमोशन मिलेगा। स्टेशन प्रोजेक्ट पूरा करो।"बाहर निकलते हुए पृथ्वी ने सनाया से कहा, "देखा? तू हीरो बनी। अब घर चल, आराम कर।"सनाया रुकी। "घर? वो हवेली अब खाली है। नौकर चले गए, पापा जेल में। मैं कहां जाऊं?"पृथ्वी ने गहरी सांस ली। "मेरे साथ चल। मेरी छोटी सी कोठी है। कम से कम आज रात तो।"रात की बातेंपृथ्वी की कोठी में चाय की चुस्कियां लेते हुए दोनों बालकनी में बैठे थे। नीचे शहर की लाइटें जगमगा रही थीं। सनाया ने पहली बार खुलकर बात की।"पृथ्वी, याद है बचपन में हम स्टेशन पर खेलते थे? तू घुटने से गिरा था, मैंने रुमाल बांधा था। फिर पापा ने तुझे धक्का दिया, और दुश्मनी शुरू हो गई।"पृथ्वी ने हंसा। "हां, और तू रोई थी। मैंने सोचा था, ये लड़की मेरी दोस्त बनेगी। लेकिन ठाकुर साहब ने सब बदल दिया। आज तूने उनसे लड़कर मेरी जान बचाई।"सनाया की आंखें नम हो गईं। "मैंने पापा को खो दिया। लेकिन तुझे पाकर... शायद कुछ नया मिला।"पृथ्वी ने उसका हाथ थामा। हवा में पुरानी दोस्ती नई मोहब्बत बन रही थी। तभी पृथ्वी का फोन बजा। "हैलो? क्या? स्टेशन पर आग लग गई? मजदूर घायल?"आग का हमलारात के 11 बजे स्टेशन साइट पर धुआं छा गया था। आग की लपटें आसमान छू रही थीं। पृथ्वी और सनाया मौके पर पहुंचे। फायर ब्रिगेड आ रही थी, लेकिन पृथ्वी को शक हो गया।"ये आग नहीं, साजिश है," पृथ्वी ने कहा। एक घायल मजदूर ने बताया, "कुछ मास्क वाले आए, पेट्रोल डाला और भगा दिए।"सनाया का चेहरा सफेद पड़ गया। "पापा... ये उनका काम है।"तभी दूर से काफिला दिखा। रघुनाथ सिंह के गुंडे, भानु प्रताप के इशारे पर हमला करने आए थे। पृथ्वी ने पुलिस टीम को अलर्ट किया। गोलीबारी शुरू हो गई।"सनाया, पीछे हट!" पृथ्वी चिल्लाया। लेकिन सनाया ने एक गुंडे को पकड़ लिया। "बोल, किसने भेजा?"गुंडा हंसा। "ठाकुर साहब। वो जेल से ही राज करेंगे।"पृथ्वी ने सटीक शॉट मारा, गुंडे सरेंडर कर दिए। आग बुझ गई, लेकिन प्रोजेक्ट को झटका लगा।सनाया का संकल्पसुबह IG ऑफिस में सनाया ने कहा, "सर, अब मैं चुप नहीं रहूंगी। पापा को पत्र लिखूंगी। उनसे कहूंगी, रघुनाथ को रोकें। ये दुश्मनी खत्म हो।"पृथ्वी ने सहमति में सिर हिलाया। "हम साथ हैं, सनाया। स्टेशन बनेगा, और हमारी कहानी भी।"दरभंगा की हवाओं में अब बगावत के सुर साफ सुनाई दे रहे थे—न्याय के सुर। लेकिन जेल में भानु प्रताप मुस्कुरा रहे थे। "ये तो शुरुआत है, बेटी। असली खेल अब बाकी है।"अंत