कुंवारी माँ
लेखक: विजय शर्मा एर्री
गाँव के बाहर पीपल के नीचे बैठी वह अक्सर दूर तक ताकती रहती—जैसे किसी आने वाले का इंतज़ार हो। लोग उसे अनामिका कहते थे, पर उसके जीवन की सबसे बड़ी पहचान थी—बिन ब्याही माँ। यह शब्द गाँव की हवा में ऐसे घुला था कि उसके नाम से पहले ही आ जाता। कोई फुसफुसाता, कोई आँखें चुराता, और कोई सीधे सवाल दाग देता—“ब्याह कब हुआ था?”
अनामिका मुस्कुरा देती। मुस्कान के पीछे दर्द था, पर आँखों में हार नहीं।
उसका बेटा अंश अब आठ साल का हो चुका था—चंचल, तेज़, और माँ की तरह ही शांत साहसी। स्कूल जाते वक्त जब कोई बच्चा ताना मार देता, “तेरे पापा कहाँ हैं?” तो अंश सिर ऊँचा कर कहता, “मेरी माँ ही मेरे पापा हैं।” यह वाक्य अनामिका के दिल को एक साथ तोड़ता भी था और जोड़ता भी।
अनामिका कभी इसी गाँव की सबसे होनहार लड़की थी। कॉलेज में हिंदी साहित्य पढ़ती, कविताएँ लिखती, और सपने बुनती। शहर में नौकरी करने का सपना—अपने पैरों पर खड़े होने का सपना। तभी राहुल उसकी ज़िंदगी में आया—शब्दों का जादूगर, वादों का सौदागर। प्यार हुआ, भरोसा हुआ, और भरोसे की कोख में एक नई ज़िंदगी पनपी।
जब सच सामने आया, राहुल पीछे हट गया। समाज के डर से, परिवार के दबाव से। “अभी समय ठीक नहीं,” कहकर वह हमेशा के लिए ग़ायब हो गया। अनामिका के सामने दो रास्ते थे—या तो सच को मार दे, या सच के साथ जीना सीख ले। उसने दूसरा चुना।
घर वालों ने मुँह मोड़ लिया। “हमारे खानदान में यह कलंक?” पिता का काँपता हुआ गुस्सा आज भी उसके कानों में गूँजता था। माँ रोई, पर चुप रही। अनामिका ने शहर का रुख किया—एक छोटे से कमरे में नई शुरुआत। सिलाई सीखी, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया, और रातों में कविताएँ लिखीं—उन कविताओं में वह अपने आँसू सहेजती।
अंश के जन्म के दिन उसने खुद से एक वादा किया—“तुझे किसी कमी का एहसास नहीं होने दूँगी।” और उसने निभाया। सरकारी स्कूल में दाख़िला, हर शाम कहानी, हर सुबह दुलार। जब पैसे कम पड़ते, अनामिका अपनी किताबें बेच देती, पर अंश की फीस नहीं रुकी।
समाज की नज़रें सबसे भारी थीं। मकान-मालिक ने किराया बढ़ाया, पड़ोसन ने दूरी बनाई, और रिश्तेदारों ने सलाह दी—“किसी से शादी कर लो, बच्चे का भविष्य सँवर जाएगा।” अनामिका हर बार एक ही जवाब देती—“मेरे बच्चे का भविष्य मेरी ईमानदारी से सँवरेगा।”
एक दिन स्कूल में मदर्स डे था। अंश ने मंच से कविता पढ़ी—
“मेरी माँ के पास नाम नहीं,
पर हिम्मत का ताज है।
वह अकेली है,
पर उसकी बाहों में मेरा सारा संसार है।”
हॉल तालियों से गूँज उठा। अनामिका की आँखें भर आईं। उस दिन उसने पहली बार महसूस किया कि उसका संघर्ष बेकार नहीं गया।
समय बदला। अनामिका की कविताएँ सोशल मीडिया पर पढ़ी जाने लगीं। एक साहित्यिक पत्रिका ने छापा। फिर एक एनजीओ ने संपर्क किया—“आप सिंगल मदर्स के लिए काउंसलिंग करें।” अनामिका ने हाँ कहा। वह अब अपने दर्द को दूसरों की ताक़त बना रही थी।
गाँव से एक चिट्ठी आई—माँ बीमार थीं। अनामिका अंश को लेकर लौटी। वही पीपल, वही गलियाँ, वही ताने—पर अब उसकी चाल में झिझक नहीं थी। माँ ने उसे गले लगाया—लंबे अरसे बाद। पिता चुप रहे, पर आँखों में स्वीकार की नमी थी।
गाँव की चौपाल पर पंचायत बैठी। किसी ने कहा, “लड़का बिना बाप के कैसे पलेगा?” अनामिका ने शांत स्वर में कहा, “बाप एक भूमिका है, जिम्मेदारी है। जो निभाए, वही बाप। मैंने निभाई है।” चौपाल में सन्नाटा छा गया।
कुछ दिनों बाद स्कूल में अंश ने प्रथम स्थान पाया। प्रधानाचार्य ने कहा, “आपने मिसाल कायम की है।” पिता ने पहली बार उसके सिर पर हाथ रखा—“माफ़ कर दो।” अनामिका ने कहा, “माफ़ी नहीं, अपनापन चाहिए।”
शहर लौटते वक्त अनामिका ने पीपल की छाँव में बैठकर सोचा—समाज धीरे-धीरे बदल रहा है, पर बदलाव की कीमत कोई न कोई चुकाता है। उसने कीमत चुकाई थी—आँसुओं से, मेहनत से, अकेलेपन से। पर बदले में उसे मिला था—आत्मसम्मान।
आज अनामिका अपनी किताब लिख रही है—“बिन ब्याही माँ”। वह जानती है, हर पाठक उसके साथ नहीं होगा। पर अगर एक भी लड़की उसके शब्दों से हिम्मत पाए, तो उसकी कहानी सफल होगी।
अंश अब पूछता नहीं कि उसके पापा कहाँ हैं। वह जानता है—उसकी माँ ही उसकी दुनिया है। और अनामिका जानती है—माँ होना किसी वैवाहिक प्रमाणपत्र का मोहताज नहीं, यह प्रेम, साहस और जिम्मेदारी का नाम है।
पीपल के नीचे बैठी अनामिका अब किसी का इंतज़ार नहीं करती। वह आगे देखती है—खुले आकाश की ओर, जहाँ उसकी और अंश की उड़ान तय है।
बिन ब्याही माँ—एक टैग नहीं, एक पहचान।