(रात के 2:34 बजे। कमरे में हल्की पीली रोशनी।
(सुनीति चश्मा लगाए खड़ी है। कौशिक उसके सामने बैठा है — पहली बार पूरी तरह साफ़ दिखाई देता हुआ।)
(दोनों चुप हैं।)
कभी-कभी जब कोई सपना सच होता है…
तो इंसान डरता है कि कहीं आँख झपकते ही टूट न जाए।
सुनीति (धीरे से) बोली -
“तुम… ऐसे सामने बैठकर
मुझसे बात करोगे…
मैंने कभी सोचा भी नहीं था।”
कौशिक (मुस्कुराकर)। बोला -
“मैं भी नहीं।
मैं तो भूल ही चुका था कि
कोई मुझे इस तरह देख पाएगा।”
(सुनीति उसे ध्यान से देखती है।)
सुनीति बोली -
“तुम थके हुए लगते हो।”
कौशिक (सच्चाई से) बोला -
“क्योंकि दो साल से…
मैं बस मौजूद था,
पर ज़िंदा नहीं।”
(सुनीति पानी का गिलास उठाती है, फिर रुक जाती है।)
सुनीति (संकोच से) बोली -
“मैं तुम्हें पानी तो नहीं दे सकती ना?”
(कौशिक हल्का हँसता है।)
कौशिक बोला -
“नहीं…
पर तुम कोशिश करोगी,
इतना ही काफ़ी है।”
(सुनीति भी पहली बार मुस्कुराती है।)
(दोनों फर्श पर बैठ जाते हैं। दीवार से टेक लगाकर।)
सुनीति बोली -
“मुझे अकेले रहने की आदत नहीं थी।
दिल्ली आई, सब नया…
और फिर तुम…”
कौशिक (धीरे से) बोला -
“और फिर मैं तुम्हारी आदत बन गया।”
(सुनीति चुप हो जाती है।)
सुनीति (आँखों में नमी लेकर) बोली -
“मैं डर गई थी।
पर सच कहूँ…
जिस दिन से तुम्हारा एहसास हुआ
मैं पूरी तरह अकेली कभी नहीं रही।”
कौशिक (गंभीर होकर) बोला -
“और मैं…
जिस दिन से तुम आईं
मैं पहली बार
खुद को इंसान महसूस करने लगा।”
(घड़ी 3:45 दिखाती है।)
(दोनों चुप हैं।
पर ये चुप्पी भारी नहीं…
सुकून भरी है।)
(सुनीति धीरे से अपना सिर दीवार से हटाकर कौशिक की ओर कर लेती है।)
सुनीति (धीरे से) बोली -
“अगर मैं थक जाऊँ…
तो क्या मैं…?”
(कौशिक बिना शब्दों के सिर हिला देता है।)
(सुनीति अपना सिर उसके कंधे पर टिका देती है।)
कोई स्पर्श नहीं…
कोई वादा नहीं…
फिर भी दिल को
पहली बार पूरा सुकून मिला।
(कौशिक बस वहीं बैठा है। हिलता भी नहीं।)
कौशिक (फुसफुसाकर) बोला -
“मैं यहीं हूँ।
सो जाओ।”
(सुबह के 5 बजे। खिड़की से हल्की रोशनी आने लगती है।)
(सुनीति की आँख खुलती है।)
(कौशिक अब भी वहीं है।)
सुनीति (धीमी मुस्कान के साथ) बोली -
“तुम गए नहीं?”
कौशिक बोला -
“जब तक तुम देख सकती हो…
मैं कहीं नहीं जाऊँगा।”
वो रात
न डर की थी,
न सवालों की।
वो रात थी
दो टूटे हुए दिलों के
पहली बार
एक-दूसरे के सामने
पूरी तरह ज़िंदा होने की।
(शाम का वक्त। दरवाज़ा खुलता है।)
(सुनीति सोफ़े पर बैठी है। चेहरे पर हल्की घबराहट, आँखों में एक अजीब-सा आत्मविश्वास।)
(उसके भाई-बहन अंदर आते हैं — राकेश, राधिका और गुंजन।)
राधिका (चिंता से) बोली -
सुनीति… कल रात हम सब बाहर थे।
तू ठीक तो है ना?
सुनीति (धीमी आवाज़ में) बोली -
“मैं ठीक हूँ…
पर अब और चुप नहीं रह सकती।”
(सब उसकी तरफ़ देखते हैं।)
(सुनीति टेबल से अपना नंबर वाला चश्मा उठाती है।)
सुनीति बोली -
“जो मैं कहने जा रही हूँ…
वो सुनकर तुम सब चौंक जाओगे।”
(वो चश्मा पहन लेती है।)
सुनीति (सामने देखते हुए) बोली -
“कौशिक…
वो यहीं है।”
(कमरे में सन्नाटा।)
गुंजन (हँसने की कोशिश करती है) बोली -
सुनीति… ये मज़ाक है ना?
सुनीति (सख़्त स्वर में) बोली -
“नहीं गुंजन।
मैं उसे देख सकती हूँ।”
राकेश (गंभीर होकर) बोला -
“तू कहना क्या चाहती है?
वो इंसान… जो अदृश्य है…
वो तुझे दिखता है?”
सुनीति (आँखों में भरोसा लेकर) बोली -
“हाँ।
सिर्फ़ मुझे।”
(वो खाली कुर्सी की ओर इशारा करती है।)
सुनीति बोली -
“वो वहीं बैठा है…
मुझे देख रहा है।”
(टेबल पर रखा पेन अचानक अपने आप हिलने लगता है।)
(डायरी खुलती है।)
डायरी पर लिखावट (कौशिक) बोला -
“डरो मत…
मैं सच में यहाँ हूँ।”
(तीनों भाई-बहन पीछे हट जाते हैं।)
सुनीति (भावुक होकर) बोली -
“कल रात…
मैंने पहली बार उसे पूरी तरह देखा।”
राकेश बोला -
“कैसे?”
सुनीति बोली -
“मेरे चश्मे की वजह से।
उसी नंबर वाले चश्मे से
वो मुझे साफ़ दिखाई देता है।”
(वो राकेश को चश्मा देती है।)
राकेश (पहनकर) बोला -
“मुझे तो कुछ नहीं दिख रहा...
बल्कि धुंधला धुंधला दिख रहा है सब।”
सुनीति (धीरे से) बोली -
“क्योंकि ये चश्मा…
सिर्फ़ मेरे लिए काम करता है।”
(पेन फिर चलता है।)
डायरी पर लिखावट (कौशिक):
“मैं सुनीति को नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।
मैं सिर्फ़ इंसान बनकर
फिर से जीना चाहता हूँ।”
(गुंजन की आँखों में डर के साथ-साथ दया है।)
राकेश (निर्णय लेते हुए) बोला -
“अगर तू उसे देख सकती है…
तो इसका मतलब
ये सब किसी वजह से हो रहा है।”
(वो सुनीति के कंधे पर हाथ रखता है।)
राकेश बोला -
“हम तुझे अकेला नहीं छोड़ेंगे।”
(सुनीति की आँखों से आँसू बहने लगते हैं।)
उस दिन
सुनीति ने सिर्फ़ एक राज़ नहीं बताया…
उसने अपने डर, अपने विश्वास
और एक अदृश्य प्रेम को
परिवार के सामने रख दिया।
अब कहानी
और भी ख़तरनाक मोड़ लेने वाली थी…
(कमरा शांत है। सुनीति खिड़की के पास खड़ी है। चेहरे पर उलझन, आँखों में एक अलग चमक।)
सुनीति अब भी कन्फ्यूज़ थी।
ये सब सही है या ग़लत —
वो नहीं जानती थी।
पर एक सच वो मान चुकी थी…
वो कौशिक को पसंद करने लगी थी।
सुनीति (मन में) बोली -
“वो अदृश्य हो या दिखाई दे…
मेरे साथ तो है।”
(कौशिक पास खड़ा है, उसे देख रहा है — बिना छुए भी बहुत पास।)
(टेबल पर टूटा हुआ चश्मा, केमिकल्स और राकेश की नोट्स।)
राकेश (थका लेकिन उम्मीद से भरा) बोला -
“इस चश्मे की लेंस को पिघलाकर
हमने जो कंपाउंड बनाया है…
यही आख़िरी चांस है।”
राधिका (डरते हुए) बोली -
“अगर ये भी फेल हो गया तो?”
सुनीति (दृढ़ता से) बोली -
“तो भी कोशिश अधूरी नहीं रहेगी।”
(कौशिक सुनीति की तरफ़ देखता है।)
कौशिक (धीरे से) बोला -
“अगर कुछ हो जाए…
तो खुद को दोष मत देना।”
(सुनीति उसकी तरफ़ देखकर सिर हिला देती है।)
(राकेश एक छोटी शीशी में बना एंटीडोट उठाता है।)
राकेश बोला -
“ये… कौशिक के ऊपर डालना होगा।”
(सुनीति खुद आगे बढ़ती है।)
सुनीति (काँपती आवाज़ में) बोली -
“मैं करूँगी।”
(वो शीशी खोलती है और कौशिक के सिर से लेकर कंधों तक धीरे-धीरे एंटीडोट डाल देती है।)
(तेज़ रोशनी। हवा चलती है।)
(धीरे-धीरे कौशिक की परछाई गाढ़ी होने लगती है।)
गुंजन (हैरानी से) बोली -
“देखो… वो दिख रहा है!”
(कुछ सेकंड बाद कौशिक पूरी तरह सामने खड़ा है — साफ़, असली, ज़िंदा।)
राधिका (आँखों में आँसू लिए) बोली -
“ये… ये सच में इंसान है!”
(सुनीति स्तब्ध। फिर मुस्कुराती है।)
सुनीति बोली -
“कौशिक…”
(वो पहली बार उसे सच में छूती है।)
कौशिक (मुस्कुराकर) बोला -
“मैं वापस आ गया।”
(सब खुश हैं। हँसी, राहत, सुकून।)
राकेश बोला -
“अब सब ठीक हो गया।”
गुंजन बोली -
“अब कोई अदृश्य नहीं!”
(सुनीति कौशिक को देखती है — पर उसकी मुस्कान थोड़ी अधूरी है।)
(रात। सब सो चुके हैं।)
(सुनीति जागती है। उसे वही पुराना एहसास होता है…
पर इस बार कुछ अलग।)
(वो bed से हाथ बढ़ाकर जमीन पे लेटे कौशिक को छूती है…)
(उसका हाथ हवा में रुक जाता है।)
सुनीति (घबराकर) बोली -
“कौशिक…?”
(लाइट हल्की-सी फ्लिकर करती है।)
(कौशिक की बॉडी कुछ सेकंड के लिए हल्की-सी धुंधली हो जाती है।)
कौशिक (चौंककर) बोला -
“सुनीति…
मैं… मैं फिर से…”
एंटीडोट ने उसे दिखाई देने लायक़ तो बना दिया था…
पर क्या वो असर स्थायी था?
या फिर
कौशिक का अदृश्य होना
उसकी ज़िंदगी से
हमेशा जुड़ा रहने वाला था?
सुनीति (आँखों में डर और प्यार के साथ) बोली -
“अगर तुम दिखो या न दिखो…
मैं तुम्हारा हाथ नहीं छोड़ूँगी।”