Meri ho Tum - 3 in Hindi Thriller by Pooja Singh books and stories PDF | मेरी हो तुम - 3

Featured Books
Categories
Share

मेरी हो तुम - 3

💖 विवेक – अदिति | गहरा रिश्ता

रात का सन्नाटा चारों ओर फैला था।

घर सो चुका था… लेकिन अदिति की आँखों में नींद नहीं थी।

छत पर बैठी वो आसमान देख रही थी।

तारों के बीच कहीं उसे अपना डर भी दिख रहा था।

तभी पीछे से परिचित-सी आवाज़ आई—

“अब से छत पर अकेले नहीं बैठा करो।”

अदिति ने बिना पलटे कहा—

“जानती थी… तुम आओगे।”

विवेक पास आकर बैठ गया।

दोनों के बीच बस एक हाथ का फासला था।

“तुम्हें पता है,”

विवेक ने धीरे से कहा,

“जब तुम्हें उस दिन बेहोश देखा था…

मुझे लगा जैसे मेरी पूरी दुनिया रुक गई हो।”

अदिति ने पहली बार अपनी कमजोरी जाहिर की—

“और मुझे डर लगा था…

कि अगर मेरी वजह से तुम्हें कुछ हो गया तो?”

विवेक ने उसकी ओर देखा।

“तो फिर तय रहा…”

“तुम्हारा डर मेरा होगा,

और मेरी ताक़त तुम्हारी।”

अदिति की आँखें भर आईं।

उसने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।

कोई जल्दबाज़ी नहीं थी…

बस सुकून।

विवेक ने हिचकिचाते हुए उसकी उँगलियाँ थाम लीं।

इस बार कोई शरारत नहीं…

सिर्फ़ वादा।

“मैं तुमसे ये नहीं कहूँगा कि तुम्हें कभी कुछ नहीं होगा,”

विवेक बोला।

“लेकिन ये ज़रूर कह सकता हूँ…

कि जो भी होगा, हम साथ झेलेंगे।”

अदिति ने उसकी हथेली को कसकर पकड़ लिया।

“और अगर फिर कभी वो वनदेवी जागी?”

उसने धीमे से पूछा।

विवेक मुस्कुराया।

“तो मैं उससे भी प्यार कर लूँगा…

क्योंकि वो भी तुम ही हो।”

अदिति की आँखों से एक आँसू गिरा—

लेकिन वो डर का नहीं था।

पहली बार उसे लगा…

कि देवत्व से ज़्यादा ताक़तवर

किसी का साथ होता है।

दूर कहीं मंदिर की घंटी बजी।

और उसी पल,

अदिति के अंदर सफ़ेद ज्योति हल्की-सी चमकी—

जैसे वनदेवी भी इस रिश्ते को स्वीकार कर रही हो।

लेकिन हवा में एक फुसफुसाहट रह गई—

“जब प्रेम गहरा होता है…

तब उसका इम्तिहान भी सबसे कठिन होता है।”

अदिति ने विवेक का हाथ और मज़बूती से थाम लिया।

क्योंकि अब वो सिर्फ़ प्रेम नहीं था…

वो बंधन बन चुका था। 💫

🏰 विवेक का चौधरी मेंशन लौटना…

सुबह की पहली किरण चौधरी मेंशन की ऊँची खिड़कियों से टकराई।

कई महीनों बाद विवेक फिर उसी देहरी पर खड़ा था।

सब कुछ वैसा ही था—

लेकिन वो खुद वैसा नहीं रहा था।

दरवाज़ा खुलते ही उसके पिता, चौधरी साहब, सामने खड़े थे।

आँखों में सख़्ती थी… लेकिन भीतर कहीं राहत भी।

“लौट आए?”

बस इतना ही कहा उन्होंने।

विवेक ने सिर झुकाकर जवाब दिया—

“हाँ… अब हमेशा के लिए।”

चौधरी साहब की नज़रें उसके चेहरे पर ठहर गईं।

उन्हें दिख गया था—

ये वही बेटा नहीं था जो गया था…

ये अब किसी का सहारा बन चुका था।

💍 सगाई का ऐलान…

देविका जी और चौधरी परिवार की रज़ामंदी से

दो सगाइयों का ऐलान हुआ—

विवेक ❤️ अदिति

आदित्य ❤️ चेताक्क्षी

घर फूलों से सज गया।

ढोलक, हँसी, और रिश्तों की गर्माहट।

अदिति लाल साड़ी में आई तो

विवेक की नज़रें ठहर गईं।

“क्या हुआ?”

अदिति ने शरारत से पूछा।

विवेक धीमे से बोला—

“डर लग रहा है…”

“किस बात का?”

“इतनी खुशियाँ…

कहीं नज़र न लग जाए।”

अदिति ने उसकी कलाई पकड़ ली।

“जब डर आए… मेरा हाथ थाम लेना।”

🌸 आदित्य – चेताक्क्षी | शांत प्रेम

आदित्य ने जब चेताक्क्षी को अंगूठी पहनाई,

तो मंदिर की घंटी अपने आप बज उठी।

चेताक्क्षी ने मुस्कुराकर कहा—

“ये रास्ता आसान नहीं होगा।”

आदित्य ने बिना सोचे कहा—

“लेकिन सही होगा।”

दोनों की आँखों में डर नहीं—

स्वीकार था।

👰🤵 विवाह की तैयारियाँ…

मेहंदी, हल्दी, गीत—

घर सपनों जैसा लग रहा था।

अदिति की हथेलियों पर मेहंदी रच रही थी।

लेकिन अचानक उसका सिर तेज़ दर्द से घूम गया।

उसकी आँखों के सामने

काले धुएँ जैसा साया लहराया।

एक फुसफुसाहट—

“बंधन बन रहे हैं…

तोड़ने का समय भी पास है…”

विवेक ने उसे संभाल लिया।

“क्या हुआ?”

उसकी आवाज़ काँप गई।

अदिति ने मुस्कुराकर झूठ कह दिया—

“कुछ नहीं… बस थक गई हूँ।”

लेकिन चेताक्क्षी दूर खड़ी सब देख चुकी थी।

उसकी आँखों में चिंता उतर आई।

🌑 छुपा खतरा…

उसी रात—

चौधरी मेंशन के पुराने तहखाने में

किसी ने काले चिन्ह बना दिए।

एक साया हँसा—

“दो विवाह…

एक वनदेवी…

और एक बलिदान…”

हवा ठंडी पड़ गई।

अदिति की नींद टूट गई।

उसके हाथ अपने आप चमक उठे—

सफ़ेद ज्योति।

वो समझ गई—

खतरा अब दूर नहीं…

घर के भीतर है।

उसने सोते हुए विवेक की ओर देखा।

धीरे से उसका माथा छूते हुए फुसफुसाई—

“इस बार…

तुम्हें सच बताना ही पड़ेगा।”

और बाहर…

काली हँसी फिर गूँज उठी।