The haze of identity in Hindi Short Stories by kajal jha books and stories PDF | पहचान की धुंध

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पहचान की धुंध

शीर्षक: अनाम अहसास

सब कुछ एक 'गलत नंबर' से शुरू हुआ था। आर्यन ने अपने दोस्त को फोन लगाया था, लेकिन दूसरी तरफ से एक सौम्य और ठहरी हुई आवाज़ आई— "हेलो?"

वह आवाज़ मीरा की थी। उस एक गलती ने बातों का ऐसा सिलसिला शुरू किया जो महीनों तक थमा नहीं। वे घंटों फोन पर बात करते। आर्यन उसे अपने दफ्तर की उलझनें सुनाता, और मीरा उसे अपनी अधूरी कविताओं के किस्से। उन्होंने एक-दूसरे की रूह को पढ़ लिया था, लेकिन एक-दूसरे के चेहरे से अनजान थे।

"हम कभी फोटो नहीं बदलेंगे," मीरा ने एक बार कहा था। "मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे मेरी बातों से पहचानो, मेरे चेहरे से नहीं।" आर्यन मान गया। उसके लिए मीरा की आवाज़ ही उसकी पहचान थी।

मुलाकात का दिन

छह महीने बीत गए। आखिर में उन्होंने मिलने का फैसला किया। शहर का सबसे बड़ा 'सेंट्रल पार्क', शाम के ठीक पाँच बजे। पहचान के नाम पर बस इतना तय हुआ कि दोनों के हाथ में एक-एक सफेद गुलाब होगा।

आर्यन पाँच बजने से पहले ही पहुँच गया। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसने नीली शर्ट पहनी थी और हाथ में एक ताज़ा सफेद गुलाब था। पार्क में बहुत भीड़ थी। लोग टहल रहे थे, बच्चे खेल रहे थे।

फासला बस चंद कदमों का

तभी एक लड़की उसके पास से गुजरी। उसने पीले रंग का सूट पहना था। आर्यन की नज़र उसके हाथों पर पड़ी, लेकिन वहाँ कोई गुलाब नहीं था। उसने सोचा— "शायद यह मीरा नहीं है।"

उधर, मीरा भी वहीं थी। वह एक बेंच पर बैठी सफेद गुलाब लिए आर्यन का इंतज़ार कर रही थी। उसने देखा कि एक लड़का नीली शर्ट में हाथ में गुलाब लिए खड़ा है। लेकिन तभी उस लड़के के पास एक दूसरी लड़की आई और उससे रास्ता पूछने लगी। मीरा को लगा शायद वह लड़का किसी और का इंतज़ार कर रहा है या शायद वह आर्यन नहीं है।

धुंधलका बढ़ने लगा। भीड़ बढ़ने लगी। आर्यन भीड़ में एक ऐसी लड़की को ढूँढता रहा जिसके हाथ में गुलाब हो, लेकिन मीरा ने डर और घबराहट में अपना गुलाब अपने बैग में छिपा लिया था। उसे लगा कि अगर आर्यन को वह पसंद नहीं आई तो?

अधूरा अंत

साढ़े छह बज चुके थे। दोनों को लगा कि शायद दूसरा शख्स नहीं आया। आर्यन मायूस होकर गेट की तरफ बढ़ा। ठीक उसी वक्त मीरा भी भारी कदमों से बाहर निकल रही थी।

दोनों गेट पर एक-दूसरे के बिल्कुल बगल से गुजरे। आर्यन के कंधे से मीरा का कंधा हल्का सा टकराया भी।

"सॉरी," आर्यन ने कहा।

मीरा ने बिना ऊपर देखे बस सिर हिलाया और आगे बढ़ गई।

वह आवाज़... आर्यन को वह 'सॉरी' कुछ जानी-पहचानी लगी, लेकिन शोर इतना था कि वह यकीन नहीं कर पाया। मीरा को उस अजनबी की खुशबू अपनी सी लगी, पर वह मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।

उस रात आर्यन ने मीरा को फोन किया, लेकिन मीरा का फोन बंद था। मीरा ने भी फिर कभी उस नंबर पर कॉल नहीं किया। दोनों को लगा कि शायद सामने वाले ने धोखा दिया और वह आया ही नहीं।

आज भी वे दोनों उसी शहर में हैं, शायद कभी किसी मॉल में या किसी ट्रैफिक सिग्नल पर फिर आमने-सामने होते होंगे, लेकिन एक-दूसरे के लिए वे आज भी सिर्फ एक 'रॉन्ग नंबर' की मीठी याद बनकर रह गए हैं।

निष्कर्ष

प्यार पूरा था, पर पहचान अधूरी रह गई