रघुवंशी हवेली में नियम पत्थर की लकीरों जैसे थे—
दिखते नहीं थे, पर हर साँस में महसूस होते थे।
और अब…वो लकीरें धीरे-धीरे मिट रही थीं।
कार्तिक और संस्कृति दोनों ने मिलकर घर के नियम तोड़ दिए थे।
बिना आवाज़। बिना ऐलान। बिना किसी को बताए।
इस घर को अब भी लगता था, सब वैसा ही है। पर एक कमरा झूठ बोल रहा था।
जैसे ही घर की लाइटें बुझतीं—
कार्तिक संस्कृति के और करीब आ जाता।
कार्तिक (मुस्कुराकर) बोला -
दिन भर कितनी चुप रहती हो…थक नहीं जाती?
संस्कृति उसके सीने पर सिर रखकर धीरे से बोलती—
आपके पास आकर सब ठीक हो जाता है।
कार्तिक उसे बच्चों की तरह चिढ़ाता। कभी उसकी नाक पर उँगली रख देता।
कभी उसके कान के पास धीरे से फुसफुसाता—
पता है…तुम्हारी हँसी बहुत प्यारी है।
पर अफसोस मैं तुम्हे सुबह हंसते हुए नहीं देख सकता।
नियम हैं ना।
संस्कृति मुस्कुरा देती पर आवाज़ नहीं निकालती।
कार्तिक बार-बार उसके माथे को चूमता।
फिर गालों को। फिर बहुत हल्के से होठों को—
जैसे डरता हो कहीं खुशी टूट न जाए। हर रात वो संस्कृति को अपने सीने में छिपा लेता। जैसे दुनिया से बचा रहा हो। संस्कृति उसकी धड़कन सुनते-सुनते सो जाती।कार्तिक के लिए ये सब नया था। खुशी… जिसमें डर नहीं था। साथ…जिसमें समझौता नहीं था।
कार्तिक (खुद से) बोला -
अगर यही प्यार है…तो मैं गलत था।
सुबह होते ही वो फिर वही सख्त कार्तिक बन जाता।
नज़रें झुकी। आवाज़ कड़ी। भावनाएँ बंद।
संस्कृति समझ जाती—
ये दो ज़िंदगियाँ हैं। एक दिन की। एक रात की।
संस्कृति (मन ही मन) बोली -
रात जीत रही है…दिन भी एक दिन हार जाएगा।
जहाँ हँसना मना था—
वहाँ मुस्कानें छुपकर जन्म ले रही थीं।
जहाँ प्यार मना था—
वहाँ प्यार रोज़ ज़िंदा था।
कहते हैं ना—
खुशी अगर छुपकर जी जाए तो किसी ना किसी मोड़ पर नज़र लग ही जाती है। उनकी खुशी भी ज़्यादा दिन छुपी नहीं रह पाई।
रात का तीसरा पहर था। पूरी हवेली गहरी नींद में डूबी हुई। तभी कार्तिक की माँ पानी भरने के लिए उठी।
हाथ में मग था, और मन में हमेशा की तरह नियम।
जैसे ही वो कार्तिक के कमरे के पास से गुज़री—
उन्हें कुछ आवाज़ें सुनाई दीं। बहुत हल्की। बहुत धीमी।
पर उस घर में इतनी भी आवाज़ें अपराध थीं।
सास ठिठक गई। उसका दिल तेज़ धड़कने लगा।
उसने धीरे से दरवाज़े की दरार से अंदर झाँका—
और उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जो उसने देखा वो उसका बेटा था।
वही नीरस। सख्त। पत्थर दिल कार्तिक रघुवंशी। और उसकी बाँहों में संस्कृति।कार्तिक संस्कृति के होठों पर अपने होठ रखे हुए था।
कोई जल्दबाज़ी नहीं। कोई डर नहीं। बस महसूस करना। जैसे उसे साँस लेना याद आ गया हो। सास की मुट्ठियाँ कस गईं। आँखों में गुस्सा। अपमान। डर सब एक साथ।
सास (मन ही मन) बोली -
ये कैसे हो सकता है?
इस घर में…मेरे बेटे ने…प्यार?
उसने देखा—
कार्तिक संस्कृति को सीने से लगाए हुए था। उसके बालों को सहलाते हुए। उसके माथे पर चुम्बन रखते हुए। वो कोई मजबूर बेटा नहीं था। वो खुश था। बहुत खुश। उसने दरवाज़े से पीछे हटते हुए दाँत भींच लिए।
सास (खुद से, ठंडी आवाज़ में) बोली -
अभी नहीं…सुबह देखूँगी तुम दोनों को।
उसने मग वहीं रखा और चुपचाप अपने कमरे में चली गई।
पर उसकी आँखों में नींद नहीं थी।
वहीं कार्तिक संस्कृति को और कसकर सीने से लगा लेता है।
संस्कृति उसकी बाहों में सुरक्षित थी। दोनों को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था—
कि जिस प्यार को उन्होंने रात की चादर में छुपाया था—
वो अब सुबह की आग बनने वाला है।
सुबह सास क्या करेगी?
क्या कार्तिक माँ के सामने झुकेगा ?
या
पहली बार अपने प्यार के लिए खड़ा होगा?