सुबह की पहली किरण अभी खिड़की तक पहुँची भी नहीं थी—
कि नीचे से चीख़ने–चिल्लाने की तेज़ आवाज़ें हवेली में गूँज उठीं।
संस्कृति अब भी कार्तिक की बाँहों में थी। दोनों गहरी नींद में—
जैसे दुनिया से बेपरवाह। अचानक शोर और बढ़ा। संस्कृति हड़बड़ाकर उठी।
संस्कृति (घबराकर) बोली -
नीचे… क्या हो रहा है?
कार्तिक भी चौक गया। उसने घड़ी की तरफ़ देखा, सुबह हो चुकी थी। दोनों जल्दी-जल्दी नीचे पहुँचे।
और जो देखा—
पूरा घर जैसे कटघरे में खड़ा था।
ननद नाइट ड्रेस में घबराई हुई एक कोने में खड़ी थी।
ससुर जी गुस्से से काँप रहे थे।
देवर आधी नींद में आँखें मलता हुआ।
नौकर–नौकरानियाँ सिर झुकाए चुपचाप।
और बीच में—
सास।
बस वही बोल रही थी। तेज़। कठोर। बिना रुके।
सास सीधे कार्तिक के पास गई—
और एक ज़ोरदार थप्पड़!
छप्पाक!
पूरा कमरा सन्न हो गया। कार्तिक हिल गया। संस्कृति आगे बढ़ी।
संस्कृति (काँपती आवाज़ में) बोली -
माँ जी…मेरी बात सुनिए—
पर उसका वाक्य पूरा भी नहीं हुआ—
कि उसके गाल पर भी वही थप्पड़ पड़ा। संस्कृति लड़खड़ा गई।
सास (चिल्लाते हुए) बोली -
बेशर्म लड़की!
इस घर के नियम कैसे तोड़े तूने?
फिर कार्तिक की तरफ़ इशारा करके—
सास बोली -
और मेरे बेटे को भी अपने साथ घसीट लाई!
सास (और ऊँची आवाज़ में) बोली -
जब मैंने कहा था इस घर में प्यार मना है—
तो रात-रात भर क्या करते रहते हो तुम दोनों?
कार्तिक का चेहरा पीला पड़ गया। संस्कृति की आँखों के सामने अंधेरा छा गया। दोनों एक-दूसरे को देख भी नहीं पा रहे थे।
पूरा घर उन्हीं को घूर रहा था। नज़रें सवाल नहीं, सज़ा थीं। ससुर जी दाँत भींचे खड़े थे। उनकी खामोशी सास के शब्दों से ज़्यादा डरावनी थी। कुछ पल के लिए किसी ने कुछ नहीं कहा।
बस संस्कृति की तेज़ साँसें और कार्तिक की भींची हुई मुट्ठियाँ—
संस्कृति (मन ही मन) बोली -
जिस प्यार ने मुझे ज़िंदा रखा…आज उसी को अपराध बना दिया गया।
कार्तिक (मन में) बोला -
आज अगर मैं चुप रहा—
तो खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगा।
हवेली में अब भी सन्नाटा था। लेकिन ये सन्नाटा शांत नहीं था—
ये तूफ़ान से पहले की खामोशी थी। कार्तिक अब और चुप नहीं रह सका।उसने काँपती हुई पर साफ़ आवाज़ में बोलना शुरू किया—
कार्तिक बोला -
बस कीजिए माँ…गलती अगर किसी की है तो मेरी है।
सब चौंक गए। ये वही कार्तिक था जो कभी सवाल नहीं करता था।
लेकिन कार्तिक की बात पूरी भी नहीं हुई—
कि ससुर जी एक कदम आगे आए। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर पत्थर जैसी सख़्त।
ससुर बोले -
एक शब्द और नहीं, कार्तिक।
इस घर में औरत की गलती औरत ही भुगतेगी।
कार्तिक कुछ कहना चाहता था। उसके होंठ हिले। लेकिन ससुर की कड़कती आँखों के सामने उसकी आवाज़ दम तोड़ गई। वो लाचार था। बेटा होने का बोझ उसके कंधों पर भारी पड़ गया।
सास गुस्से में संस्कृति का हाथ पकड़ लेती है। संस्कृति की चूड़ियां टूटती हैं। हाथों से खून निकलता है। पर रहम नहीं आया । संस्कृति की कलाई दुखने लगती है।
संस्कृति (रोते हुए) बोली -
माँ जी…प्लीज़ दर्द हो रहा है—
लेकिन कोई नहीं रुका। वही अंधेरा रास्ता। वही सीलन की बदबू।
वही काली कोठरी जहाँ गलती की एक ही सज़ा थी।
धड़ाम!
संस्कृति को अंदर धक्का दे दिया गया। दरवाज़ा बंद। ताला लग गया। कार्तिक बस देखता रह गया। उसकी मुट्ठियाँ कस गईं। आँखें भर आईं। लेकिन आवाज़ निकलने की इजाज़त नहीं थी। संस्कृति ज़मीन पर घुटनों के बल गिर गई। उसकी सिसकियाँ अंधेरे से टकराकर लौट आ रही थीं।
संस्कृति (टूटती आवाज़ में) बोली -
मेरा क्या कसूर था…मैंने तो सिर्फ प्यार किया था…।
वो खूब रोई। इतना रोई—
कि आँसुओं में डर घुल गया। दीवारें खामोश थीं। कोई दिलासा नहीं। बाहर कार्तिक दीवार से टेक लगाए खड़ा था। उसका सीना भारी हो रहा था।
कार्तिक (मन ही मन) बोला -
अगर आज मैंने कुछ नहीं किया—
तो मैं उससे ज़्यादा कमज़ोर हूँ जितना ये घर समझता है।
एक—
अंधेरे में बंद।
दूसरा—
रौशनी में कैद।
और बीच में रघुवंशी हवेली—
जहाँ आज भी प्यार अपराध था।
क्या ये काली कोठरी संस्कृति को तोड़ देगी?
या
यहीं से कार्तिक आख़िरी फ़ैसला लेगा?