(सुबह की हल्की रोशनी कमरे में फैल रही है।)
(सुनीति की आँख खुलती है।)
(वो हाथ बढ़ाकर बिस्तर के दूसरे हिस्से को टटोलती है…
खाली।)
सुनीति (घबराकर) बोली -
“कौशिक जी…?”
(वो उठकर चारों तरफ़ देखती है।)
कमरा वैसा ही सजा हुआ…
पर पति ग़ायब।
(सुनीति की साँसें तेज़ हो जाती हैं।)
सुनीति (टूटती आवाज़ में) बोली -
“नहीं… फिर से नहीं…।”
(उसकी नज़र टेबल पर रखे चश्मे पर पड़ती है।)
(हाथ काँपते हैं।)
(सुनीति जल्दी से चश्मा पहन लेती है।)
(एक पल सन्नाटा…)
(फिर…)
(बिस्तर पर कौशिक दिखाई देता है — चैन से सोता हुआ।)
सुनीति (आँखों में आँसू लेते हुए) बोली -
“यहीं हो आप…”
(वो गहरी साँस लेती है।)
(सुनीति धीरे-धीरे बिस्तर पर बैठती है।)
(वो कौशिक के पास लेट जाती है।)
(उसके सीने पर सिर रख देती है।)
(धड़कनें महसूस होती हैं — बिल्कुल असली।)
वो दिखता नहीं था…
पर मौजूद था।
पति होकर भी
दुनिया से छुपा हुआ।
(सुनीति उसके सीने पर ही लेटी है।)
सुनीति (धीरे से) बोली -
“मैं सब सह लूँगी…
बस तुम गायब मत होना।”
(कौशिक नींद में हल्का-सा करवट बदलता है।)
(उसका हाथ सुनीति के सिर पर आ टिकता है।)
सुनीति अब समझ चुकी थी —
ये शादी सामान्य नहीं थी।
पर उसका प्यार किसी चश्मे का मोहताज नहीं था।
(चश्मे के बिना —
बिस्तर खाली दिखता है।)
(चश्मे के साथ —
पति-पत्नी एक-दूसरे में सिमटे हुए।)
(कुछ देर बाद)
(सुनीति अब भी कौशिक के सीने से सिमटी हुई है।)
(वो चैन से सो रही है।)
सुनीति को ज़रा भी एहसास नहीं था
कि जिस पल वो कौशिक की बाहों में जाती…
उसी पल वो खुद भी दुनिया की नज़रों से ओझल हो जाती थी।
(बिस्तर… खाली।)
(कोई नहीं दिखता।)
(लेकिन कमरे में दो साँसों की आवाज़ है।
दो दिलों की धड़कन।)
जब वो एक-दूसरे के बेहद क़रीब होते,
तो जैसे उनकी मौजूदगी एक ही परछाईं में बदल जाती।
(सुनीति नींद में हल्का-सा हिलती है।)
(वो कौशिक से थोड़ा दूर होती है।)
(अचानक —)
(सुनीति फिर से दिखाई देने लगती है।)
(कुछ सेकंड बाद कौशिक भी…पर सिर्फ़ चश्मे से।)
ना कौशिक जानता था
कि सुनीति भी उसके साथ ग़ायब हो जाती है…
ना सुनीति को अंदाज़ा था कि उनका प्यार उन्हें एक ही वजूद में बाँध रहा है।
(फ्लैशबैक जैसा एहसास।)
(हर बार जब वो एक-दूसरे के क़रीब आते…)
(उनकी आँखें अपने आप बंद हो जातीं।)
ना सवाल, ना डर, बस सुकून।
शायद आँखें इसलिए बंद होती थीं… ताकि वो सच देख न पाएं।
(कौशिक नींद में बुदबुदाता है।)
कौशिक बोला -
“सुनीति…”
(सुनीति उसके और पास सिमट जाती है।)
(दोनों पूरी तरह अदृश्य।)
विज्ञान का नियम टूट चुका था।
अब जो बचा था…
वो सिर्फ़ प्यार का नियम था।
(सुबह की रोशनी कमरे में भरती है।)
(जैसे ही दोनों अलग होते हैं…)
(सुनीति दिखाई देती है।)
(कौशिक — फिर से अदृश्य।)
ये कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं था।
ये किसी बड़े सच की शुरुआत थी।
जब दो आत्माएँ सच में एक हो जाती हैं…
तो दुनिया उन्हें अलग-अलग देख ही नहीं पाती।
(कमरा शांत है।)
(सुनीति पलंग के किनारे बैठी है। हाथ में कौशिक की शादी की अंगूठी है।)
सुनीति के सामने सवाल सिर्फ़ एक था —
वो अपने पति को कैसे ठीक करे।
दिखने वाला पति… और दुनिया से छुपा हुआ पति…
दोनों के बीच जीना आसान नहीं था।
(सुनीति की नज़र टेबल पर रखे चश्मे पर जाती है।)
(वो चश्मा उठाती है।)
सुनीति (खुद से) बोली -
“जब मैं इसे लगाती हूँ,
तो कौशिक जी दिखते हैं…”
(वो रुकती है।)
सुनीति (धीरे से) बोली -
“तो अगर ये चश्मा कौशिक जी लगायें तो…?"
(उसकी आँखों में उम्मीद की चमक आ जाती है।)
वैसे भी… कौशिक और सुनीति का चश्मे का नंबर एक ही था।
शायद यही कुदरत का इशारा था।
(कौशिक पास खड़ा है — अदृश्य।)
कौशिक (मुस्कुराकर) बोला -
“तुम जानती हो…
मुझे चश्मा बिल्कुल पसंद नहीं।”
सुनीति (मुस्कान के साथ चिंता लेकर) बोली -
“मुझे पता है।
आपको उसमें अजीब लगता है।”
कौशिक बोला -
“सर भारी हो जाता है… और मुझे… अजीब-सा महसूस होता है।”
(सुनीति चश्मे को हाथ में लिए खड़ी रहती है।)
सुनीति बोली -
“पर अगर यही रास्ता हुआ तो?”
(कौशिक कुछ नहीं बोलता।)
वो कोशिश करना चाहती थी…
पर डर भी उतना ही था।
(सुनीति चश्मे को वापस टेबल पर रख देती है।)
सुनीति (धीरे से) बोली -
“मैं आपको मजबूर नहीं करूँगी।”
(कौशिक उसके पास आकर
उसके कंधे पर हाथ रखता है।)
काशिक बोला -
“तुम जो भी करोगी…
मेरे भले के लिए ही करोगी।”
चश्मा अब सिर्फ़ चश्मा नहीं था…
वो एक उम्मीद बन चुका था।
पर सवाल वही था —
क्या कौशिक उसे पहन पाएगा?
या फिर
दिखने की कीमत बहुत ज़्यादा होगी?