प्रतिदिन की तरह उस दिन भी विद्यालय का वातावरण शांत, अनुशासित और पवित्र था। सुबह की हल्की धूप विद्यालय के विशाल प्रांगण में फैली हुई थी। पक्षियों की मधुर चहचहाहट वातावरण को और भी सौम्य बना रही थी। प्रार्थनासभा का समय हो चुका था। विद्यालय के सभी छात्र अपने-अपने वर्गों की पंक्तियों में खड़े थे। किसी ने आँखें बंद कर रखी थीं, तो कोई आधी खुली आँखों से इधर-उधर झाँक रहा था। बच्चों की मासूमियत और अनुशासन दोनों साथ-साथ दिखाई दे रहे थे।
प्रार्थनासभा का मैदान विद्यालय की शान माना जाता था। उसके एक कोने में वर्षों पुराना गुलमोहर का विशाल पेड़ खड़ा था। गर्मियों में उसकी लाल-नारंगी फूलों से लदी शाखाएँ पूरे परिसर को सौंदर्य से भर देती थीं। वही पेड़ विद्यार्थियों के लिए छाया और सौंदर्य का प्रतीक था। किसी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वही पेड़ एक दिन भय और साहस की कहानी का केंद्र बन जाएगा।
प्रार्थना आरंभ होने ही वाली थी कि अचानक पाँचवीं कक्षा का एक छात्र, रोहन, घबराया हुआ-सा इधर-उधर देखने लगा। उसकी दृष्टि बार-बार गुलमोहर के पेड़ की ऊँची टहनी पर जा रही थी। उसने ध्यान से देखा—वहाँ एक काला, चमकीली चमड़ी वाला साँप कुंडली मारे बैठा था। उसका फन आधा फैला हुआ था और उसकी जीभ बार-बार बाहर आ-जा रही थी।
रोहन का हृदय तेज़ी से धड़कने लगा। डर के बावजूद उसने साहस जुटाया और अपने पीछे खड़े अध्यापक को धीरे से सूचना दी। अध्यापक ने भी स्थिति को गंभीरता से समझा। बिना घबराहट फैलाए, उन्होंने तुरंत संकेतों के माध्यम से अन्य अध्यापकों को सूचित किया। कुछ ही क्षणों में जिन छात्रों की पंक्तियाँ पेड़ के नीचे थीं, उन्हें शांतिपूर्वक वहाँ से हटा दिया गया।
प्रार्थनासभा को संक्षिप्त रूप में समाप्त कर दिया गया। किसी को भी यह आभास नहीं होने दिया गया कि मैदान में खतरा मंडरा रहा है। सभी छात्र अनुशासनपूर्वक अपनी-अपनी कक्षाओं में चले गए। विद्यालय प्रशासन ने तुरंत सुरक्षा रक्षक को सूचना दी।
विद्यालय का सुरक्षा रक्षक, रामू काका, वर्षों से विद्यालय में सेवा दे रहे थे। उनका शरीर भले ही उम्र के कारण झुक गया था, पर मन में कर्तव्यनिष्ठा अब भी अडिग थी। सूचना मिलते ही वे एक लंबी-सी लाठी लेकर मैदान में पहुँचे। उनके चेहरे पर आत्मविश्वास था—मानो यह काम उनके लिए नया न हो।
रामू काका पेड़ के नीचे खड़े होकर ऊपर देखने लगे। साँप अब भी टहनी पर मौजूद था। उन्होंने मन ही मन भगवान का स्मरण किया और लाठी से टहनी को हिलाने लगे। टहनी आगे-पीछे झूलने लगी। उसके साथ ही साँप भी असंतुलित होने लगा। अचानक एक तेज़ झटके के साथ साँप नीचे गिर पड़ा।
पर दुर्भाग्यवश, यह दृश्य रामू काका की दृष्टि से ओझल रहा। वे अब भी ऊपर ही देख रहे थे, यह सोचते हुए कि साँप अभी टहनी पर ही होगा। साँप घास में सरकता हुआ धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रहा था। उसका फन फैल चुका था। उसकी आँखों में आक्रोश और भय दोनों झलक रहे थे।
थोड़ी दूरी पर खड़े एक अध्यापक—श्री जाधव—यह सब देख रहे थे। उन्होंने स्थिति की गंभीरता तुरंत भाँप ली। साँप अब रामू काका पर हमला करने ही वाला था। एक क्षण भी गँवाने का समय नहीं था। श्री देशमुख ने बिना अपने जीवन की परवाह किए, दौड़ते हुए छलाँग लगाई।
उनका उद्देश्य था साँप के फन पर पैर रखकर उसे निष्क्रिय करना। परंतु नियति को कुछ और ही स्वीकार था। उनका पैर फन से कुछ इंच की दूरी पर पड़ा। अगले ही क्षण साँप ने पलटकर उनके जूते को अपने दाँतों में जकड़ लिया। जहर का तरल अंश जूते की सतह पर स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
रामू काका यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। जिनकी रक्षा करने वे आए थे, उनकी रक्षा स्वयं एक अध्यापक ने कर दी थी। कुछ क्षणों बाद अन्य अध्यापक और कर्मचारी भी दौड़ते हुए पहुँचे। साँप को सुरक्षित तरीके से दूर किया गया। श्री जाधव को तुरंत चिकित्सा सहायता के लिए ले जाया गया। सौभाग्यवश, जूते की मोटी परत के कारण विष उनके शरीर में प्रवेश नहीं कर पाया।
विद्यालय में उस दिन पढ़ाई नहीं हो सकी। पर छात्रों ने जीवन का एक ऐसा पाठ सीख लिया, जो किसी पाठ्यपुस्तक में नहीं लिखा होता। उन्होंने देखा कि सच्चा रक्षक वही होता है, जो अपने कर्तव्य से बढ़कर मानवता को महत्व देता है।
श्री जाधव की आँखों में न तो भय था, न ही गर्व—केवल संतोष था। रामू काका की आँखों में कृतज्ञता के आँसू थे। वे बार-बार यही कहते रहे—
“आज रक्षक की रक्षा रक्षक ने नहीं, एक गुरु ने की है।”
उस दिन के बाद विद्यालय में श्री जाधव केवल अध्यापक नहीं रहे—वे साहस, त्याग और मानवता के प्रतीक बन गए। और यही कारण था कि यह घटना वर्षों बाद भी “रक्षक का रक्षक” के नाम से याद की जाती रही।