रात…एक बार फिर पूरी हवेली नींद में डूबी हुई थी। पर इस बार कार्तिक नहीं सोया था। उसकी आँखों में नींद नहीं फ़ैसला था।
जैसे ही सबके कमरों की लाइटें बुझीं—
कार्तिक सीधे उस काली कोठरी की ओर गया। उसके हाथ काँप नहीं रहे थे।
धड़ाम!
एक ही वार में ताला टूट गया।
कार्तिक जैसे ही अंदर घुसा—
उसका दिल फट पड़ा। संस्कृति ज़मीन से टेक लगाए बैठी थी।
मुँह पर टेप चिपका हुआ। आँखें डर से फटी हुई। शरीर थरथरा रहा था।
कार्तिक (टूटती आवाज़ में) बोला -
संस्कृति…
वो भागकर उसके पास पहुँचा। काँपते हाथों से तुरंत उसके मुँह से टेप हटाया। टेप हटते ही संस्कृति एक पल के लिए साँस भी नहीं ले पाई। फिर वो डर के मारे कार्तिक के सीने से चिपक गई।
उसकी सिसकियाँ बिना आवाज़ के थीं—
क्योंकि रोने की हिम्मत अब बची ही नहीं थी। कार्तिक ने उसे कसकर थाम लिया।
उसकी पीठ सहलाते हुए बोला—
बस…अब बहुत हो गया।
हम एक पल भी यहाँ नहीं रहेंगे।
उसकी आवाज़ अब डर से नहीं गुस्से से काँप रही थी।
कार्तिक बोला -
हम कहीं दूर चले जाएँगे।
जहाँ कोई नियम नहीं होगा।
कोई ताला नहीं।
कोई डर नहीं।
कार्तिक ने संस्कृति को अपनी गोद में उठा लिया। संस्कृति उसकी गर्दन में बाँहें डालकर खामोश सिसकती रही। वो धीरे-धीरे हवेली से बाहर की ओर बढ़ा। दरवाज़ा बस कुछ कदम दूर था। हवा जैसे उनका इंतज़ार कर रही हो।
अचानक—
“रुको!”
कड़कती आवाज़। कार्तिक ठिठक गया।
उसके सामने—
उसके माँ और पिता खड़े थे। सास की आँखों में आग थी।
ससुर की आवाज़ पत्थर जैसी।
सास (चिल्लाकर) बोली -
कहाँ ले जा रहे हो मेरी बहू को?
ससुर (सख़्ती से) बोले -
इस घर से कोई ऐसे नहीं जाता।
सास ने आगे बढ़कर संस्कृति का हाथ पकड़ा। संस्कृति और ज़ोर से कार्तिक से लिपट गई।
कार्तिक (पहली बार दहाड़कर) बोला -
बस! अब एक शब्द भी नहीं!
ये मेरी पत्नी है।
और मैं इसे यहाँ मरने के लिए नहीं छोड़ूँगा!
पूरा आँगन खामोश हो गया।
इतनी ऊँची आवाज़ में कार्तिक पहली बार बोला था।
एक तरफ़ प्यार। दूसरी तरफ़ खूनी नियम।
और बीच में—
दो पीढ़ियों की जंग।
आँगन में अब कोई नहीं सो रहा था। शोर ने पूरी हवेली को जगा दिया था। ननद। देवर। नौकर। नौकरानियाँ। सब वहाँ आ चुके थे।
आज पहली बार—
पूजा जो कि संस्कृति की ननद थी चुप नहीं रही। वो सीधे आगे आई। आँखों में गुस्सा। आवाज़ में सच।
पूजा (काँपती लेकिन दृढ़ आवाज़ में) बोली -
बस बहुत हो गया!
जो भी यहाँ हो रहा है—
वो गलत है!
उसने कार्तिक और संस्कृति के पास खड़े होकर खुद को उनके साथ खड़ा कर लिया।
पूजा बोली -
भाभी ने कुछ भी गलत नहीं किया!
अगर प्यार गुनाह है—
तो इस घर में सबसे बड़े गुनहगार आप हैं!
पूरा आँगन सन्न। किसी ने ऐसी बात पहले कभी नहीं कही थी।
सास हँसी। वो हँसी डरावनी थी।
सास (ज़हर भरी आवाज़ में) बोली -
इस लड़की ने मेरे बच्चों पर काला जादू कर दिया है!
एक-एक करके सब मेरे ख़िलाफ़ हो गए!
फिर पूजा की तरफ़ घूरते हुए—
और तू पूजा…लगता है बहुत दिनों से तुझे सज़ा नहीं मिली।
इसलिए इतना फुदक रही है।
सास ने पास रखा डंडा उठाया। किसी ने रोकने की हिम्मत नहीं की।
पूजा (चिल्लाकर) बोली -
भैया—!
डंडा पूजा पर बरसा। एक बार। फिर दूसरी बार। पूजा दर्द से चीख पड़ी। कार्तिक का सब्र टूट गया।उसने संस्कृति को धीरे से नीचे रखा। और पूजा की ओर भागा।
कार्तिक (गुस्से से दहाड़ते हुए) बोला -
बस! हाथ मत उठाइए!
लेकिन सास तेज़ थी।उसने एक हाथ से संस्कृति को झपट लिया—
और दूसरे हाथ से पूजा को।
सास (पागलपन भरी आवाज़ में) बोली -
तुम दोनों को अक़्ल सिखानी पड़ेगी!
संस्कृति और पूजा दोनों को घसीटते हुए वो उसी रास्ते पर ले गई—
जहाँ अंधेरा सज़ा बनकर खड़ा था।
वही काली कोठरी
एक नहीं—
दो लड़कियाँ।
धड़ाम!
दरवाज़ा बंद।
ताला लगा दिया गया।
बाहर…
कार्तिक बस खड़ा रह गया। उसकी साँसें तेज़ थीं। आँखों में आँसू नहीं आग थी।
कार्तिक (मन ही मन) बोला -
अब नहीं…अब एक और रात नहीं।
अंदर…अंधेरे में संस्कृति पूजा को सीने से लगाए हुए थी।
पूजा (रोते हुए) बोली -
भाभी…माफ़ करना…मैं आपको बचा नहीं पाई।
संस्कृति (धीरे से) बोली -
तुमने सच बोला…इतना ही काफ़ी है।
दो लड़कियाँ एक अंधेरे में—
और एक आदमी जो अब फैसला कर चुका था।
क्या कार्तिक अब घर के नियम तोड़ेगा—
या
पूरा घर?