Nakal se Kahi Kranti nahi Hui - 15 in Hindi Biography by Dr. Suryapal Singh books and stories PDF | नकल से कहीं क्रांति नहीं हुई - 15

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नकल से कहीं क्रांति नहीं हुई - 15

इसी तरह हर वर्ष एक सप्ताह व्याख्यान एवं मंचीय कार्यक्रम का आयोजन किया जाता। बच्चे इसमें काफी रुचि लेते। बहुत से बच्चे स्वयं भी कविता-कहानी या छोटे नाटक लिखने की कोशिश करते। इससे एक रचनात्मक परिवेश निर्मित होता। कई बच्चे ऐसे निकल कर गये जिन्होंने नाटक, कविता, कहानी लिखने का क्रम जारी रखा। बहुत से बच्चे लाइब्रेरी से अधिकतम लाभ उठाने का प्रयास करते। मैं अक्सर जाँचने की कोशिश करता कि बच्चे लाइब्रेरी से कितना लाभ उठाते हैं। देखने में आया कि कुछ बच्चे साल भर में चालीस-बयालिस पुस्तकें लेकर पढ़ चुके हैं। कॉलेज हो या विश्वविद्यालय पढ़ाई के सम्बन्ध में आने वाली कठिनाई का निराकरण यदि जल्दी कर दिया जाये तो बच्चों का प्रदर्शन काफी अच्छा हो जाता है। एक बार मैंने कॉलेज में उपचारात्मक शिक्षा की व्यवस्था की। मैंने सभी विभागों से कहा कि बच्चों के पास शब्दों का ज्ञान कम है। यदि उनको कुछ शब्दों को चुन कर बता दिया जाये तो वे और सार्थक प्रदर्शन कर सकते हैं। मैंने यह प्रस्ताव रखा कि हर विभाग अपने अलग अलग प्रश्नपत्रों में कम से कम ऐसे पचास शब्दों का चयन करे और उसकी वर्तनी और अर्थ बच्चे को समझाएँ। अध्यापकों ने इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति जताई और सभी ने अपने-अपने विषय में शब्दों का चयन किया। श्याम-पट पर उसकी वर्तनी लिखकर उसका अर्थ बताया। इसके लिए उन्हें अतिरिक्त कक्षाएँ लेनी थीं जिसके लिए प्रति व्याख्यान अलग से भुगतान किया गया। इस योजना का सार्थक परिणाम निकला। बच्चे अब अपनी ओर से भी सही शब्दों का चुनाव कर उत्तर लिख सकते थे। मैं समझता हूँ कि इस तरह का प्रयोग सभी कॉलेजों को करना चाहिए। अपने कॉलेज में इस तरह के प्रयोग का सार्थक परिणाम देखकर अच्छा भी लगा। इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने धन उपलब्ध कराया था।
       अगली पंचवर्षीय योजना के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने पुस्तकालय भवन बनाने के लिए शत प्रतिशत अनुदान देने का प्रावधान किया। इसके लिए पुराना हिसाब आयोग के सामने प्रस्तुत करना था। जिस धन का उपयोग महाविद्यालय में नहीं हो पाया था उसका बैंक ड्राफ्ट बनवा कर आयोग को भेज दिया गया। इस बार लाइब्रेरी भवन के लिए आवेदन किया गया और उसकी स्वीकृति मिल गई। प्रयोगशाला सामग्री व पुस्तकों के लिए भी आयोग शतप्रतिशत अनुदान देता है। इससे प्रयोगशाला उपकरण व पुस्तकें क्रय की जाती रही हैं। भवन का निर्माण निर्धारित नक्शे के अनुसार प्रारम्भ किया गया। पचास गुणे बत्तीस फिट का हाल बनकर तैयार हुआ। इससे वाचनालय में बच्चों को बैठने की विशेष सुविधा मिली। पत्र-पत्रिकाएँ व पुस्तकें बच्चे यहाँ लेकर पढ़ते रहे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने दो कम्प्यूटर तथा रंगीन टीवी के लिए भी धन उपलब्ध कराया। उस समय कम्प्यूटर के लिए शीत कक्ष बनाना अनिवार्य था जिसके लिए एक एसी भी खरीदा गया और एसी रूम में दोनों कम्प्यूटर रखे गए। एक अध्यापक व एक बाबू को कम्प्यूटर के प्रशिक्षण के लिए भी भेजा गया। अब कुछ काम कम्प्यूटर पर भी होने लगा था। लेकिन सारा काम कम्प्यूटर पर नहीं होता था। छात्रों की संख्या बढ़ने से उनके लिए पाठ्य-पुस्तकों की खरीद अधिक होने लगी। इस लिए सन्दर्भ ग्रन्थों की खरीद में कमी आई। फिर भी लाइब्रेरी में आवश्यक सन्दर्भ ग्रन्थ उपलब्ध थे और बच्चे उनका उपयोग कर सकते थे।

 1989 के सितम्बर माह में पिताजी का देहान्त हो गया। उस समय पत्नी उनकी देखभाल के लिए गाँव में थी। गाँव के मंगल प्रसाद जी सुबह तड़के ही कॉलेज गेट पर पहुँचे, चपरासी ने गेट खोलकर उनको अन्दर किया। उन्होंने आकर सूचना दी कि पिताजी का देहान्त हो गया है। तुरन्त मैंने बड़े बाबू को बुलवाया। एक जीप की व्यवस्था करायी। कॉलेज की व्यवस्था वरिष्ठ अध्यापक को सौंपकर मंगल को भी जीप पर बिठाया और स्टेशन की ओर चल पड़ा। गोरखपुर प्लेटफार्म पर पहुँचते ही गाड़ी रेंगने लगी थी। मैं टिकट नहीं ले पाया था। मंगल प्रसाद को एक डिब्बें में बैठने को कहकर मैं गार्ड के डिब्बे में चढ़ गया। गार्ड को अपनी स्थिति बतायी और उनसे कहा कि आप टिकट बना दें। उन्होंने आदर के साथ बिठाया। मैंने रास्ते में कई बार उनसे टिकट बनाने को कहा लेकिन उन्होंने टिकट नहीं बनाया। बिना टिकट की यात्रा करने की मेरी कभी आदत नहीं रही। मेरे चाहने पर भी टिकट नहीं बना। गोण्डा स्टेशन आने पर मंगल प्रसाद के साथ मैं बाहर आया और रिक्शा कर घर की ओर चल पड़ा। चुंगी नाका तक रिक्शा गया और वहाँ से हम लोग पैदल ही घर की ओर चल पड़े। रास्ते में चचेरे भाई महीपत सिंह मिले जो अन्त्येष्टि सम्बन्घी जरूरी सामान लाने बाजार जा रहे थे। हम और आगे बढ़े तो जयपाल सिंह जी स्कूटर से मेरे घर की ओर जा रहे थे। उनके स्कूटर पर मैं भी बैठ गया। मंगल प्रसाद पैदल ही आते रहे। घर पहुँचने पर अयोध्या ले जाने की तैयारी होने लगी। मेरे पहुँचने पर पिता के शव को नहलाया गया और शववस्त्र पहनाया गया। अयोध्या के लिए गाड़ी आ गई थी। हम सभी लोगों ने उसी वाहन से अयोध्या जाकर सरयू के तट पर अन्तिम संस्कार किया। शाम तक हम लोग घर वापस लौटे। दाह-संस्कार मैंने ही किया था। इसलिए तेरहवीं तक घर पर ही रहा। तेरहवीं में कॉलेज के लोग भी आए थे, गाँव-जंवार के लोग तो थे ही। क्रिया-कर्म के बाद मैं कॉलेज गया लेकिन परिवार घर पर ही रहा। इस समय व्रजेन्द्र प्रयाग में तथा उमाकांत एचबीआईटी कानपुर में पढ़ रहे थे। किरन भी गोरखपुर में पालीटेक्निक में अध्ययन कर रही थी और छोटी बेटी सीमा लाल बहादुर शास्त्री कॉलेज में पढ़़ रही थी। 1986 में विश्वविद्यालय व कॉलेज के अध्यापकों के ग्रेड का पुनरीक्षण हुआ था। पुनरीक्षण का बकाया 1989 के अंत तक मिल गया। इससे यह सोचा गया कि बड़ी बेटी के विवाह के लिए प्रयास किया जाये। पुष्पा एम.ए. कर चुकी थी। जाड़े की छुट्टियों में मैंने बाबू काशी सिंह को साथ लिया। एक दो लड़कां के बारे में जानकारी प्राप्त हुई थी। उनके बारे में बात करने के लिए हम लोग लखनऊ गए। लखनऊ के सैन्य विद्यालय में अमरेन्द्र सिंह के यहाँ रुके। उन्होंने बाराबंकी के मुजीबपुर के एक लड़के के बारे में बताया। उसने फूड टेक्नालोजी में एचबीटीआई से डिग्री प्राप्त की थी। लड़के के पिता यूनियन इण्टर कॉलेज रामनगर में अध्यापक थे। हम लोग रामनगर पहुँचे। संयोग से उसी कॉलेज में मेरे दो छात्र भी अध्यापक थे जिनकी घनिष्ठता लड़के के पिता से थी। मेरे दोनों शिष्य के पिता लालता सिंह भी मेरे परिचित थे। धूप नहीं निकल रही थी। मौसम काफी ठंडा था। शाम को हम लोग लालता सिंह के घर गये और लड़के के पिता को भी उन्होंने अपने यहाँ बुला रखा था। थोड़ी बहुत बातचीत हुई । सुबह लालता सिंह भी तैयार हुए और हम लोग मुजीबपुर पहुँचे। लड़के के पिता भी आ गये थे। लड़का बाराबंकी की एक केमिकल फैक्ट्री में अस्थायी रूप से काम कर रहा था। बातचीत करते हुए शादी तय हुई। लड़के के बाबा ने कहा कि हम चाहते हैं कि एक मारुति वैन हमको मिले। उस समय मारुति वैन एक लाख पद्रह सोलह हजार में मिल जाती थी। यद्यपि हमारे पास इतना पैसा नहीं था पर मैंने स्वीकार कर लिया। वहाँ से लौटकर घर आया। फिर गोरखपुर अपने कॉलेज चला गया। वहाँ जीपीएफ से चालीस हजार का ऋण मिल सका। वहाँ से लौटकर फिर घर आया और लाल बहादुर शास्त्री कॉलेज में जो पैसा जीपीएफ में जमा था उसमें से मात्र तेरह हजार ही निकल पाया इस तरह मेरे पास 53 हजार रुपये हो गया। पच्चीस तीस हजार का इंतजाम अपने रिश्तदार के माध्यम से किया। कुछ अपने खाते में था सब मिलाकर एक लाख रुपया हो गया। उसी को लेकर हम और श्रीमान सिंह दिल्ली गये वहां चचेरे भाई के यहाँ रुके। उन्होंने भी कुछ पैसा इकट्ठा किया और हम लोगां ने एक लाख सोलह हजार रुपये में मारुति वैन खरीदा। उसे लेकर घर आये। अगले दिन तिलक का कार्यक्रम था। एक परिचित दुकान से तिलक के कपड़े लिये। थाल घर पर था उसी को साफ करा लिया गया और अगले दिन हम लोग तिलक के कार्यक्रम को सम्पन्न कराने गये। तिलक चढ़ाकर हम लोग लौटे। अब हमें शादी का प्रबन्ध करना था। कुछ काम श्रीमान सिंह व काशी सिंह को सौंपकर मैं कॉलेज चला गया। वहाँ से जल्दी लौटा और विवाह की तैयारियों में जुट गया। बारात लाल बहादुर शास्त्री कॉलेज में टिकने की व्यवस्था की गई थी। वहाँ चारपाई बिस्तर की व्यवस्था की गई। कॉलेज के सहयोगी अध्यापकों ने यहाँ की व्यवस्था संभाल ली। श्रीमान सिंह के घर के सामने ही अपनी जमीन भी थी और कुछ प्लाट भी खाली थे। वहीं टेंट लगाकर भोजन- जलपान की व्यवस्था की गई। रिश्तेदारों व इष्ट मित्रों ने पूरा सहयोग किया।