4 मार्च 1990 को यह शादी सम्पन्न हो गयी। शादी निपटने के बाद मैं अपने कॉलेज चला गया। अब पत्नी कभी गाँव पर रहती, कभी कॉलेज में रहती। प्रायः मैं अकेले ही कॉलेज में रहता। मेरे ही निर्देशन में जयपाल सिंह ने अपना पीएचडी का कार्य पूरा किया। प्रबन्धतंत्र ने दौड़ धूप करके इस शर्त के साथ प्रबन्धतंत्र को बहाल करा लिया कि यथाशीघ्र आडिट आपत्तियों का निराकरण करा दिया जायेगा। प्रबन्धतंत्र ने बालिकाओं का एक अलग कॉलेज चलाने की योजना बनायी किन्तु उनके पास कोई भवन नहीं था। वे चाहते थे कि डिग्री कालेज का एकाध कमरा मिल जाये जिससे वे अलग बालिकाओं का विद्यालय चला सकें । डिग्री कॉलेज में भी कमरे अधिक नहीं थे। इसलिए उनके प्रस्ताव पर मैंने भी कोई सहमति नहीं जताई। यद्यपि उन्होंने दो कमरां के पीछे टिन शेड डालकर बालिका विद्यालय की शुरुआत कर दी। प्राइमरी स्तर की थोड़ी बालिकाएँ थीं इसलिए कुछ दिनों तक उसी में पढ़ाई होती रही। 1996 में अध्यापकों के वेतनमान का पुनः पुनरीक्षण किया गया। इस बार अधिक कठिनाई नहीं हुई क्योंकि सभी अध्यापको के पत्रजात पूरे थे। इस बीच दो अध्यापक हिन्दी और प्राचीन इतिहास के अवकाश प्राप्त कर गये। दोनों की जगह पर आयोग से किसी का चयन नहीं हो सका और प्रबंधतंत्र की ओर से व्यवस्था करनी पड़ी। इतिहास में प्रदीप राव जी ने पढ़ाना शुरू किया। वे बहुत अच्छे अध्यापक थे। हिन्दी के लिए भी प्रबंधतंत्र की ओर से अध्यापक लाये गये और अध्ययन-अध्यापन का कार्य चलने लगा। पर प्रबन्धतंत्र द्वारा नियुक्त अध्यापकों को पारिश्रमिक बहुत कम मिलता था। उन्हें प्रति व्याख्यान के हिसाब से धन दिया जाता था। कुछ समय पश्चात संस्कृत के भी प्राध्यापक अवकाश प्राप्त कर गए। पर वे प्रबंधतंत्र की ओर से पुनः नियुक्त कर दिए गए। इसलिए संस्कृत पढ़ाने में कोई दिक्कत नहीं हुई। कुछ समय पश्चात संस्कृत अध्यापक के रूप में डॉ0 चन्द्रेश कुमार पाण्डेय का चयन हो गया। उन्होंने आकर कार्यभार भी ग्रहण कर लिया। इसी बीच मनोविज्ञान के अध्यापक का चयन प्राचार्य के रूप में हो गया और समाजशास्त्र के अध्यापक डॉ0 जयराम यादव ने अपना स्थानान्तरण दिग्विजयनाथ डिग्री कॉलेज में करा लिया। कॉलेज में समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के लिए भी प्रबंधतंत्र की ओर से अध्यापकों की व्यवस्था करनी पड़ी। कॉलेज में अध्ययन-अध्यापन और परीक्षा का कार्य पूरी निष्ठा और ईमानदारी से चलता रहा। अब मुझे पारिवारिक जिम्मेदारी को भी पूरा करना था। लाल बहादुर शास्त्री कॉलेज में रहते हुए दो छोटी बहनों निरुपमा और कमला का विवाह सम्पन्न कराया था। मेरे दोनों बेटों- व्रजेन्द्र और उमाकांत के विवाह का दबाव बढ़ता जा रहा था। व्रजेन्द्र ने वकालत शुरू करने का मन बनाया था और उमाकांत रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज कुरुक्षेत्र में लेक्चरर का पद छोड़कर एचबीटीआई कानपुर में प्रवक्ता के पद पर आ गए थे। संयोग ऐसा बना कि 1995 में ही फरवरी में व्रजेन्द्र और नवम्बर में उमाकांत का विवाह सम्पन्न हुआ। उमाकांत की पत्नी उनके साथ रह रही थीं और व्रजेन्द्र की पत्नी गाँव पर रहती थी। व्रजेन्द्र तब तक गाँव से ही कचेहरी आते जाते थे। सिविल लाइन में जमीन तो थी पर मकान नहीं बना था। अब सबसे छोटी बहन किरन और मेरी छोटी बेटी सीमा के विवाह का प्रश्न था। किरन पोस्ट आफिस की सेवा में आ गई थी और सीमा ने भी स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। सन् 1997 में ही 3 फरवरी को किरन और 5 फरवरी को सीमा का विवाह सम्पन्न हुआ। यद्यपि कुछ पैसा उधार हो गया था जिसे मैंने एक साल के अन्दर लौटाया। पारिवारिक दायित्वों से थोड़ी मुक्ति मिली थी इसलिए मन थोड़ा प्रसन्न हुआ। पत्नी अब गाँव पर रह रही थी और मैं अकेले भटवली बाजार डिग्री कालेज में रह रहा था। 1996 में मेरे तीन नाटकों का संकलन ‘गीत गाने दो मुझे’ नाम से प्रकाशित हुआ। इसमें तीन नाटक ‘गीत गाने दो मुझे’, ‘उन्हें नींद नहीं आती’ और ‘नशा’ संगृहीत थे। इसके पहले 1992 में सीमा साहित्य भवन दिल्ली से मेरा शोध प्रबन्ध ‘द एजूकेशनल डाक्ट्रिन्स आफ प्लेटो एण्ड श्री अरविन्दः ए कम्प्रेटिव स्टडी’ प्रकाशित हो चुका था। अब मैंने ‘कंचन मृग’ उपन्यास पर काम करना शुरू किया। इसके लिए मैंने कॉलेज के अध्यापक बाबू बलवान सिंह के साथ महोबा, खजुराहो, झांसी, छतरपुर तथा पिताम्बरा शक्तिपीठ की यात्रा की। जून 2000 में मुझे अवकाश प्राप्त करना था। अन्तिम दो वर्षो में जब भी मुझे समय मिलता ‘कंचनमृग’ पर काम करने की कोशिश करता। इसके लिए कुछ अंश को मैंने बोलकर लिखाया। लिखने का काम गोरखनाथ पाल जी ने किया। सन् 2000 तक आते-आते यह उपन्यास लगभग पूरा हो चुका था। जून 2000 में अवकाश प्राप्त करने के बाद इसे टंकित कराया और इसी वर्ष पूर्वापर प्रकाशन से इसका प्रकाशन हुआ। अवकाश प्राप्ति के पहले ही पेन्शन आदि के पत्रजात तैयार करा लिये गये थे। इसलिए 30 जून को अदेयता प्रमाण पत्र लगाकर पहली जुलाई को ही क्षेत्रीय अधिकारी के कार्यालय में जमाकर दिया। उन्होंने भी अग्रसारित करने में अधिक समय नहीं लिया। इसलिए जुलाई 2000 में ही मेरी पेन्शन का निर्धारण हो गया। मेरे जीपीएफ में अधिक पैसा नहीं बचा था क्योंकि बहनों और लड़कियों की शादी में जीपीएफ से ही न लौटाने वाला ऋण ले लिया था। जो धनराशि बची थी वह पचास हजार के आसपास थी। अपने अन्तिम वर्ष में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अगली पंचवर्षीय योजना से मिलने वाली धनराशि का निर्धारण करा दिया था। उसमें भवन पुस्तकें और प्रयोगात्मक सामग्री के लिए धन आवंटित हुआ था। मेरे अवकाश के बाद इस धन का उपयोग किया गया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जो धनराशि मिलती थी मेरे कार्यकाल में उसका सही उपयोग किया गया। आयोग की तरफ से जब भी कोई भौतिक सत्यापन के लिए कॉलेज आया तो बहुत प्रसन्न हुआ। उसने कहा कि आपने अनुदान का सही उपयोग किया है। आयोग ने रंगीन टीवी के लिए जो धन दिया था उसकी टीवी खरीद कर वाचनालय में लगा दिया गया था। वाचनालय में बच्चे पत्र-पत्रिकाएं और पुस्तक पढ़ते ही टीवी से भी शिक्षा सम्बन्धी अनेक कार्यक्रम देखते। इसका सार्थक परिणाम भी दिखने लगा था। प्राचार्य के रूप में मैंने 15 वर्ष दो दिन कार्य किया। अपने कार्यो से मैं बच्चों, स्टाफ तथा आमजन का विश्वास अर्जित कर सका। यही मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है। जब भी कॉलेज के लिए कोई खरीद करनी होती थी, उसमें स्टाफ को भी सम्मिलित किया जाता था। मैंने कोशिश की कि कॉलेज का एक एक पैसा सही जगह और सही ढंग से खर्च हो। कभी किसी तरह के कमीशन के बारे में सोचा ही नहीं। आपूर्तिकर्ता से कह देता था कि आप दूसरों को जो कमीशन देते हो मेरे कॉलेज के बिल में उसे घटा दीजिए। अपने अन्तिम वर्ष में मुझे कॉलेज में ही एक शुभ काम कराने का अवसर मिला। हमारे कॉलेज के सैन्य विभाग के प्रवक्ता पहले विवाह नहीं करना चाहते थे। कई लोगों ने सम्पर्क किया लेकिन वे हमेशा इन्कार ही करते रहे। उनकी रुचि योग में थी। वे प्रायः विपश्यना के कार्यक्रमों में जाया करते थे, घर पर भी वे शाम को ध्यान के लिए समय निकालते। एक बार वे विपश्यना के कार्यक्रम से लौटे तो मुझे बताया कि वहाँ पति-पत्नी भी ध्यान के लिए आये थे। अब मैं सोच रहा हूँ कि विवाह करके भी योग और ध्यान में संलग्न रहा जा सकता है। हम दोनां आदमियों ने आपस में चर्चा की। बलवान सिंह जी की उम्र चालीस पहुँच रही थी। इसलिए उनकी इच्छा थी कि विवाह ऐसी लड़की से किया जाए जिसकी उम्र तीस-पैंतीस से कम न हो। हम लोगों ने विचार करना प्रारम्भ किया। ध्यान में एक लड़की आयी। वह लड़की अपनी बहनों में सबसे बड़ी थी। उसके पिता गोरखपुर विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग से सेवानिवृत हुए थे। इस लड़की की छोटी बहन का विवाह हो गया था। उसकी उम्र भी पैंतीस-छत्तीस के आस पास थी। उसने एक तरह से शादी न करने का मन बना लिया था। वह एक एनजीओ में कार्यरत थी। कॉलेज में एक दो बार आ भी चुकी थी। उसे संदेश भेजकर बुलवाया। मेरे संदेश पर वह कॉलेज आयी। आफिस में उसे बिठाया। बलवान सिंह भी आये। मैंने कहा कि आप दोनों आदमी बात कीजिए। मैं बाहर काम देखता हूँ और मैं बाहर आ गया। आपस में दोनों ने बातचीत की। इससे यह लगने लगा कि संभव है कि दोनों का विवाह सम्पन्न हो जाए। उसने अपने घर पर भी चर्चा की होगी। उसके पिताजी कॉलेज आए और मुझसे चर्चा की। वे अक्सर यह शंका प्रकट करते थे कि क्या दोनों का समायोजन हो सकेगा। इस सन्दर्भ में वे अपने अध्यक्ष का सन्दर्भ ले आते जिन्होंने पैंतीस वर्ष की अवस्था में शादी की थी। मैंनें उन्हें आश्वस्त किया कि बलवान सिंह जी एक चरित्रवान व्यक्ति हैं। वे कभी गलत काम नहीं करते। आपकी बेटी के साथ उनका समायोजन हो सकेगा। दो एक बैठकों के बाद दोनां तरफ से सहमति बनी कि विवाह किया जाए। अब सवाल यह उठता था कि विवाह कैसे किया जाए। बलवान सिंह जी हर तरह से तैयार थे। बलवान सिंह की तरफ से प्रस्ताव आया कि यदि पारम्परिक ढंग से विवाह करना है तो आधा व्यय मैं कर लूँ और आघा व्यय लड़की वाले वहन कर लें। वे बिना खर्च मन्दिर में भी शादी करने के लिए भी तैयार थे। दो तीन वार्त्ताओं के बाद भी जब खर्च के सवाल पर सहमति नही बनी तो बलवान सिंह जी ने यह प्रस्ताव किया कि लड़की पक्ष कोई भी खर्च नहीं करेगा। बलवान सिंह जी सारा खर्च वहन करेंगे। इसी पर सहमति बनी। बलवान सिंह ने जब फोन पर अपनी माता से बताया कि मैं विवाह कर रहा हूँ, लड़की देख लिया है तो माँ को विश्वास नहीं हुआ। उनको लगा कि लड़का मज़ाक कर रहा है। बलवान सिंह के बड़े भाई महोबा में वकालत करते थे। उनको सारी स्थिति बताई गई और बड़े भाई ने माँ को सारी स्थिति से अवगत कराया तब उन्हें विश्वास हुआ। यह विवाह आर्य समाज पद्धति से डिग्री कॉलेज परिसर में दिन में सम्पन्न हुआ। विवाह में गोरखपुर विश्वविद्यालय के कई प्राध्यापक भी सम्मिलित हुए। तिलक की व्यवस्था भी बलवान सिंह ने ही किया था। बारात के खाने पीने की सम्पूर्ण व्यवस्था उन्हीं की ओर से थी। कॉलेज के लड़के-लड़कियाँ भी विवाह में सम्मिलित हुए। उनके जलपान की व्यवस्था भी की गई थी। विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद लड़की के पिता ने मुझसे कहा कि मैं चाहता हूँ कि बारात के लोग भी शाम को भोजन मेरे यहाँ कर लें। मैनें बलवान सिंह के भाई से बात की। वे भी सहमत हो गए। हम सभी लोग शाम को लड़की के घर पर भोजन करने पहुँचे। भोजन के बाद लड़की को रात में ही होटल पहुँचा दिया गया क्योंकि बारात भोर में ही महोबा के लिए प्रस्थान करने वाली थी। मैं इस वैवाहिक कार्यक्रम का शुरू से ही साक्षी और सहभागी रहा, यही मेरे लिए एक उपलब्धि रही। डॉ0 बलवान सिंह भी पिछले वर्ष अवकाश ग्रहण कर चुके हैं। उन दोनों की एक लड़की भी है। दोनो प्रसन्नता पूर्वक रह रहे हैं।