बहुत अच्छा,
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बचपन का दोस्त
लेखक: विजय शर्मा एरी
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गाँव की गलियाँ और पहली दोस्ती
गाँव की संकरी गलियाँ, मिट्टी की खुशबू और तालाब किनारे की ठंडी हवा—यही हमारी दुनिया थी। मैं नया-नया दाख़िल हुआ था स्कूल में। डर और संकोच से भरा हुआ। तभी राजू आया और बोला—
राजू: “अरे, तू नया आया है? चल, मैं तुझे सब दिखाता हूँ।”
उसकी आँखों में अपनापन था। उसी दिन से हमारी दोस्ती की डोर बंध गई।
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खेलों का संसार
हमारे खेलों की दुनिया रंग-बिरंगी थी।
- कंचे: राजू की उँगलियों में जादू था। हर बार जीतता।
- गिल्ली-डंडा: मैं गिल्ली मारता, वह दौड़कर पकड़ लाता।
- पतंगबाज़ी: हम दोनों छत पर चढ़कर पतंग उड़ाते। जब राजू की पतंग कटती, वह हँसकर कहता—
राजू: “हार में भी मज़ा है, बस दोस्त साथ हो।”
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मास्टर जी और शरारतें
हमारी शरारतें मशहूर थीं।
- कभी मास्टर जी की साइकिल की हवा निकाल देना।
- कभी क्लास में चुपके से आम खाना।
- कभी घंटी बजने से पहले ही भाग जाना।
मास्टर जी (गुस्से में): “तुम दोनों गाँव के सबसे बड़े शैतान हो।”
हम दोनों हँसते हुए भाग जाते।
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सपनों की बातें
गर्मियों की दोपहर में आम के पेड़ के नीचे बैठकर हम सपनों की बातें करते।
राजू: “मैं पुलिस अफ़सर बनूँगा। वर्दी पहनूँगा।”
मैं: “और मैं कवि बनूँगा। अपनी कविताओं से लोगों के दिल जीतूँगा।”
दोनों के सपने अलग थे, लेकिन दोस्ती की राह एक ही थी।
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कठिन समय में साथ
जब मेरे पिता बीमार पड़े, राजू रोज़ मेरे घर आता।
राजू: “चल, आज मैं तुझे कहानी सुनाता हूँ।”
वह मुझे हँसाने की कोशिश करता। अपना टिफ़िन साझा करता। उसकी निस्वार्थ मित्रता ने मेरे दिल में अमिट छाप छोड़ी।
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बिछड़ना
दसवीं के बाद मेरा परिवार शहर चला गया। स्टेशन पर विदाई का दृश्य आज भी आँखों में ताज़ा है।
राजू (आँखों में आँसू): “दोस्ती कभी मत भूलना।”
मैं (गले लगाते हुए): “तू हमेशा मेरे दिल में रहेगा।”
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शहर की ज़िंदगी
शहर में पढ़ाई, प्रतियोगिता और भाग-दौड़ शुरू हो गई। लेकिन हर रात जब मैं अकेला होता, राजू की याद आती। उसकी हँसी, उसकी बातें, उसका साथ।
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राजू का संघर्ष
गाँव में राजू ने कठिनाइयों का सामना किया। खेतों में काम, घर की ज़िम्मेदारी और पढ़ाई। लेकिन उसने हार नहीं मानी।
राजू (खुद से): “मुझे अफ़सर बनना है। चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ।”
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पुनर्मिलन
पंद्रह साल बाद गाँव लौटा। पुलिस चौकी के सामने एक वर्दीधारी अफ़सर खड़ा था। उसकी आँखों की वही चमक थी।
मैं (आवाज़ भर्राई हुई): “राजू!”
वह पलटा, और हमारी आँखें भर आईं।
राजू: “देखा, मेरा सपना पूरा हो गया। और तू भी कवि बन गया।”
हम दोनों गले मिले। तालाब, कंचे, गिल्ली-डंडा, मास्टर जी की डाँट – सब यादें फिर से जीवित हो उठीं।
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दोस्ती का नया अध्याय
अब हम दोनों अपने-अपने सपनों को जी रहे थे। लेकिन बचपन की दोस्ती ने हमें फिर से जोड़ दिया।
राजू: “दोस्ती वही होती है जो समय की धूल में भी चमकती रहे।”
मैं: “और कविता वही होती है जो दिल की गहराई से निकले।”
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निष्कर्ष
बचपन का यार जीवन की सबसे बड़ी पूँजी होता है। समय चाहे कितना भी बदल जाए, वह दोस्ती दिल के कोनों में हमेशा ताज़ा रहती है। राजू और मेरी दोस्ती ने यह साबित किया कि सच्चा यार कभी नहीं भूलता।
सच्चा प्यार जीवन की सबसे बड़ी दौलत है। इसलिए प्यार सदा सच्चा होना चाहिए। यह जीवन का सच है।
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