umbrella of protection in Hindi Short Stories by Rinki Singh books and stories PDF | सुरक्षा-छत्र

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सुरक्षा-छत्र


गर्मी की दोपहर पूरे उन्माद पर थी। बाज़ार की चहल-पहल धीमी पड़ चुकी थी। श्यामा अपनी कपड़ों की दुकान के काउंटर पर बैठी थी। सामने शीशे के पार सड़क पर धूप बिखरी थी, पर उसके भीतर जैसे बरसों की सांझ उतरी हुई थी। दुकान में काम करने वाली दोनों लड़कियाँ बैग सँभालते हुए बोलीं, “आंटी, अब ग्राहक नहीं आएँगे… आप भी घर चली जाइए, थोड़ा आराम कर लीजिये।” शाम को पांच बजे आ जायेंगे हम...
श्यामा ने सहज स्वर में कहा, “तुम लोग जाओ। मैं थोड़ी देर और बैठती हूँ, कुछ देर में चली जाऊंगी ।”
दरवाज़ा बंद हुआ। भीतर सन्नाटा फैल गया।
श्यामा की आँखें सड़क पर टिकी थीं, पर देख अतीत रही थीं।
कभी यही जीवन कितना भरा-पूरा था। 
संजय थे... उसके पति...एक निजी संस्था में गणित के अध्यापक। संयत, धैर्यवान, और घर की रीढ़। बेटा रवि -तेजस्वी, होनहार, इंजीनियर बनने का सपना पूरा कर चुका। रात होते ही तीनों एक साथ बैठते। भोजन की मेज़ पर सिर्फ रोटी-सब्ज़ी नहीं, दिन भर की हँसी भी परोसी जाती थी,
सबसे बड़ा वैभव संध्या की वह रोटी है जिसमें स्वाद बेशक़ कम हो,पर चिंता भी कम हो | सबसे बड़ा सिंहासन वह आँगन है जहाँ हँसी की छाया दीवारों से ऊँची होती है।
श्यामा का घर छोटा था, पर संतोष से भरा हुआ।

फिर एक दिन नियति ने बिना सूचना दरवाज़ा खटखटाया। सड़क दुर्घटना ने संजय को छीन लिया। उस दिन श्यामा को लगा था जैसे उसके जीवन का आधार खिसक गया हो। पर रवि की आँखों में तैरते डर ने उसे टूटने नहीं दिया। उसने आँसू भीतर ही रोक लिए। वह सिर्फ पत्नी नहीं, माँ भी थी और माँ को गिरने की अनुमति नहीं होती।
कोरोना का वह समय था जब मृत्यु की खबरें रोज़ घरों तक पहुँचती थीं। भय हवा में घुला हुआ था। उसी समय रवि ने चुपचाप एक निर्णय लिया। उसने एक करोड़ का जीवन बीमा लिया।
जब श्यामा को पता चला तो उसने हल्की-सी झिड़की दी थी, “इतना बड़ा बीमा? क्या ज़रूरत है?”
रवि मुस्कुरा दिया था, “समय का भरोसा नहीं, माँ। कम-से-कम तुम्हें किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।”
उसने बात हँसी में उड़ा दी थी। उसे क्या पता था कि यह निर्णय एक दिन उसकी साँसों का सहारा बनेगा।
समय धीरे-धीरे बहता रहा। रवि नौकरी में स्थिर हुआ। श्यामा ने फिर से सपने बुनने शुरू किए। बहू आएगी, घर में रौनक लौटेगी। एक रिश्ता पसंद भी आ गया। पर उसी बीच रवि ने माँ से कहा, “माँ, मैं शादी नहीं करूँगा।”
उसकी आँखों में एक अजीब-सी गहराई थी। श्यामा ने बहुत पूछा, पर उसने कारण नहीं बताया।
कुछ ही दिनों बाद सच सामने आया.. ब्लड कैंसर।
यह शब्द जैसे वज्रपात था। श्यामा को लगा जैसे कानों ने सुनने से इंकार कर दिया हो। रवि ने बताया कि उसे कुछ महीनों से पता था। वह माँ को और आघात नहीं देना चाहता था। शादी से इंकार भी उसी कारण था।
इलाज़ चलने लगा। अस्पताल के सफेद गलियारे, दवाइयों की गंध, उम्मीद और भय का अनवरत संघर्ष। श्यामा हर दिन ईश्वर से सौदे करती...“मेरी उम्र उसे दे दो।”
पर कुछ युद्ध प्रार्थनाओं से नहीं जीते जाते।
एक सुबह, जब खिड़की से धूप उतरी ही थी, रवि की साँसें शांत हो गईं। जैसे किसी ने धीरे से दीपक की लौ ढँक दी हो।
श्यामा के भीतर समय उसी क्षण ठहर गया।
घर फिर से सूना हो गया..इस बार और भी गहरा। पहले पति गए थे, अब बेटा। वह मंदिर के सामने खड़ी रही, पर हाथ जुड़ नहीं पाए। उसने उस दिन मंदिर का दरवाज़ा बंद कर दिया।
 शोक स्थिर जल की तरह मन में जम गया। लोग मिलते संवेदना जताते पर इन सबसे श्यामा की वेदना कम न होती |
जो श्यामा हँसके कहती थी.. " मेरी उम्र हो चली है बेटा शादी करके घर बसा ले.. तेरे बच्चों को गोद में खिला लूँ.. तो चैन से मरूं..".|
वही उम्र अब पहाड़ जैसी लग रही थी जो बीतना नहीं चाहती थी, साँसे भारी होती जा रही थीं | अब आगे के दिन कैसे कटें.. मौत उसे क्यों नहीं आ रही.. यही सोच-सोच हर रोज थोड़ा-थोड़ा मर रही थी श्यामा |

तभी एक दिन भाई किशोर ने फाइल उसके सामने रखी। 
शांत स्वर में बोला..
“दीदी, रवि ने जो बीमा लिया था… उसकी राशि मिल जाएगी। बीमारी के बाद जब नौकरी छूट गई थी, तो बाकी किश्तें मैंने भर दी थीं। शायद उसे पहले से ही तुम्हारी चिंता थी।”
श्यामा देर तक कागज़ों को देखती रही।
उसके बेटे को अपनी मृत्यु का भय नहीं था..उसे अपनी माँ के अकेलेपन का भय था।
कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई। कुछ दिनों बाद एक करोड़ की राशि मिली।
उसी धन से यह शो-रूम खुला। जीवन ने जैसे नया आकार लिया। लोग आते हैं, रंग-बिरंगे कपड़े देखते हैं, हँसी की आवाज़ें उठती हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है।
पर भीतर…
जब भी दोपहर का सन्नाटा उतरता है, श्यामा की आँखें अनायास दरवाज़े की ओर उठ जाती हैं। उसे लगता है जैसे अभी कहीं से रवि पुकारेगा “माँ…थक गया आज चाय मिलेगी क्या "
“हेलो मैम, सूट दिखाइए।”
आवाज़ उसे वर्तमान में ले आई..
उसने आँसू पोंछते हुए मुस्कान ओढ़कर कहा..
“जी, आइए न कैसा सूट दिखाऊं?

जीवन ने उससे बहुत कुछ ले लिया, असहाय कर दिया, पर उसके बेटे ने जाते-जाते भी उसे असहाय नहीं छोड़ा..
निःसंदेह उसका जीवन खाली हो गया था.. पर वो खाली हाथ नहीं थी.. जो किसी के आगे पसरे.. उसे किसी और का सहारा ढूंढना पड़े |
कुछ लोग सचमुच चले जाते हैं,
पर उनका प्रेम... एक सुरक्षा-छत्र की तरह..
हमारे सिर पर बना रहता है।
और श्यामा आज रवि के बनाए छत्र के नीचे खड़ी है |

रिंकी सिंह