Hanging in Singapore in Hindi Short Stories by Devendra Kumar books and stories PDF | सिंगापुर में फांसी

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सिंगापुर में फांसी

मेरी बेटी अपर्णा सिंगापुर में कोई बीस वर्ष से रह रही है अतः यहाँ हर वर्ष आना होता रहता है, मेरे देखते देखते यह सुन्दर से और सुन्दर होता जा रहा है. पहले तो हम जानते थे कि इतनी हरियाली है इसे ‘गार्डन सिटी’ कह सकते हैं, पर अब तो इतना और इस तरह से विकसित होता जा रहा है, इसे ‘सिटी इन ए गार्डन’ कहना बेहतर होगा. यहाँ अपराध न के बराबर हैं, अपराध करने वाला सजा ही नहीं बेहद सख्त सजा पाता है, मुकदमें लटकते नहीं है फटाफट होते हैं, दुर्दांत सीरियल किलर चार्ल्स सोबराज जो अन्य जगह के अलावा दिल्ली की जेल में बरसों रहा, अगर कहीं जाने से खोफ खाता था वह सिंगापुर था. यहाँ भी उसने एक अपराध किया था यहाँ आते ही उसको फांसी लगती. जिससे बचने के लिये. दिल्ली की जेलों में रहने में उसने अपनी जान कि खैर समझी. सबको मुकदमों में उलझाता रहा देर पर देर करता रहा था. वह जेल कर्मचारियों को रिश्वत देकर तिहाड़ जेल में ही ठाठ करता रहा, सिंगापुर आने से बचता रहा क्योंकि जानता था कि सिंगापुर में तुरत फुरत मुकदमा चलेगा, सबके सामने पब्लिक में कौड़े पड़ेंगें और फांसी पर लटका दिया जायेगा.


सिंगापुर के निवासी और आने वाले डंडे के जोर से नियम पालन करने के इतने आदि हो चुके हैं. अब हर कोई बाहर से आते ही नियम का पालन करना शुरू कर देता है. जिन्दगी यहाँ बहुत आसान भी है साथ साथ मुश्किल भी और महेंगी भी. कोई चीज़ यहाँ बनती नहीं खेती यहाँ होती नहीं फिर भी हर चीज़, हर सब्जी, फल सब कुछ मिलता है. पर अगर आप यह कहें कि कुछ भी कर सकने कि स्वतंत्रता है वह नहीं है सब को कानून और नियम के दायरे में रहना पड़ेगा. इसलिये यहाँ क़ानून व्यवस्था बेहद अच्छी है, इतनी बार यहाँ आ चुका हूँ किसी को भी लड़ते झगड़ते देखने का ‘सुख’ प्राप्त नहीं हुआ, जो हमारे भारत में खूब मिलता है. कई बार यहाँ के बहुत से लोग मनुष्य न लग कर मुझे रोबोट लगते हैं. यह अच्छा पर नीरस स्थान भी है फिर भी टूरिज्म में सबसे आगे है.

दुनिया में ड्रग तथा नशीले पदार्थों का जितना चलन भारत समेत अधिकतर देशों में देखने को मिलता है सिंगापुर में नहीं के बराबर भी नहीं है. कारण फांसी और पब्लिक में पड़ने वाले कौडे हैं. पर मुझे इन बातों से कुछ लेना देना न होता अगर मैंने एक भुक्त भोगी परिवार की बातें परिवार की माँ बेटी से न सुनी होती.

असल में हम तीन चार भारत से सिंगापुर में अपने बच्चों के पास आये सीनियर सिटीजन शाम को साथ घूमने जाया करते हैं, रास्ते में एक एचडीबी हैं जो यहाँ के सिटीजन के लिये घटी दरों के उम्दा घर होते हैं जहाँ सभी सुविधाएँ हैं और स्थान बेहद खुले खुले रहते हैं, वहां एक बुजुर्गों की हलकी कसरत के लिये पब्लिक जिम है, वहां एक बुज़ुर्ग चीनी मूल कि महिला को एक मैड व्हील चेयर पर लाया करती थी, वह थोडी बहुत हलकी कसरत अपनी मैड की मदद से करती थी और फिर पास बनी कुर्सीयों पर काफी देर बैठी रहती बतियाती रहती. वह अंग्रेज़ी भी अच्छा खासी बोलती और समझती थी. हमारी बात ‘गुड इवनिंग’ से शुरू हुई, वह कभी कई भारतीय परिवार में हेल्पर का काम कर चुकी थी इसलिये धीरे धीरे हमारे बारे में पूछ लेती थी अपने बारे में बताती रहती थी.

उसने अपने बारे में अपने पति और बेटी के बारे में बताया कि थोडी सी हेरोइन के सिंगापुर में लाने के कारण पति की फांसी दे दी गयी थी. सुन कर अचम्भा हुआ. हमारी जिज्ञासा देख कर जो उस महिला टेंग किम चू ने हमें बताया, उसे जान कर हमें बहुत रोमांच भी हुआ और दुःख भी. उस की कहानी दिनबदिन पीस-मील में सुन पाया था, फिर बहुत से कहानी के गैप तो समय समय पर स्वयं पूछे तब जाकर यह पूरा किस्से का मसौदा धीरे धीरे समझ में आता गया.अच्छी बात थी कि वह खुद भी अपने अनुभव सुनाने में प्रसन्न ही होती थी, उसे हम अच्छे श्रोता मिले हुए थे.

 हमारे देश में तो साधू सन्यासी भांग, चरस और दूसरे नशे करते आये है. भंग तो हमारे शिवजी भगवान का प्रिय पेय है, भंग को तो भंगेड़ी साधू गँगा नदी की श्रेणी में रख कर गुणगान करते आये हैं. भंग की ठंडाई के बगैर तो होली की तरंग अधूरी रहती हैं. आपने बहुत से भंग के गुणगान सुने होंगे जैसे भंगेड़ी वाला ‘गंग भंग दोनों बहन रहती शिव के संग, मर्दा तारन गंग है जिंदा तारन भंग.’ इसका सेवन खुले आम होता है, इसे तो भगवन शंकर की बूटी कहते हैं. हिंदी के प्रसिद्ध उपन्यासकार अमृतलाल नागर तो बिना भंग की तरंग में आये हुए कुछ नहीं लिख पाते थे. हिंदी फिल्मों में तो होली के अनेक प्रसंग और ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे’ जैसे लोकप्रिय गाने बच्चे बच्चे की जबान पर हैं. होली पर भंग की ठंडाई, शरबत, पकोडी खूब खुले आम चलते हैं.

भारत में साधु सन्यासी भी भाँग, चरस, सुल्फा आदि का प्रयोग सरे आम करते हैं. शिव की इस वटी का सेवन भांग की ठंडाई, लस्सी, बर्फी, शरबत में होता आया है. होली पर इसका प्रयोग काफी बड़े स्तर पर होता है. हाँ अफीम के प्रयोग पर पाबंदी है, साथ में यह भी कि भारत में इसका उत्पादन मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में नीमच -मंदसौर में होता आया है, सरकार इसकी खेती के लिये परमिट देती है तथा नीमच में भारत सरकार की अफीम की फैक्ट्री भी है. वहां यह औषिधि के लिये बनाई जाती है.उस इलाके में अफीम की लत काफी है चोरी छिपे सेवन करते हैं, अपने पंजाब में भी इसका सेवन करने वालों को कमी नहीं है यह अफगानिस्तान व पाकिस्तान से स्मगलिंग होती है. पंजाब में अफीम के अलावा दूसरी ड्रग्स भी खूब लेने लगे हैं. हालाकि इन पाबन्दी है, कोई खास सजा नहीं है, फांसी तो सोची भी नहीं जा सकती.

चलिए अब मुख्य मुद्दे पर लौते कि आखिरकार क्या हुआ कि इस वृद्धा टेंग के पति और परिवार में कि सब कुछ बिखर गया था और समटने में उसकी सारी जिंदगी निकल गयी. अब उसे अपने संघर्ष को बताने में बिल्कुल संकोच भी नहीं होता था.

पति पत्नी गाथा टेंग किम चू की जबानी,

वर्ष 1977 की बात है कि कम उम्र के एक स्मार्ट चीनी युवक ‘वोंग कि चिन’ को 18 वर्षीय स्मार्ट युवती. टेंग चुआ’ से पहली मुलाकात में ही प्रेम हो गया था, जिसे अंग्रेज़दां लोग ‘लव इन फर्स्ट साइट’ कहते हैं. पहले वे दोनों मित्र बने फिर दो साल बॉय-गर्ल-फ्रेंड बन कर रहे और जब उंन दोनों को यकीन हो गया कि वे ‘मेड फॉर-इच-अदर है, उन्होंने दिसम्बर 1970 में एक चर्च में क्रिस्चियन रिवाज़ से चर्च में शादी कर ली. इस तरह वह टेंग चुआ से टेंग किम चू हो गयी. उन दोनों ने अलग छोटा अपार्टमेंट किराये पर ले लिया था. यहाँ सब लड़के लड़कियां आपस में बिना परिवार के दखल के शादी करते आये हैं अभी भी कर रहे हैं.वही उन दोनों ने किया था.

शादी के तुरंत बाद ही वे अपने मां पिता से अलग एक छोटा अपार्टमेंट लेकर ‘मैन एंड वाइफ’ बन कर रहने लगे थे, कुक वोंग को एक रेस्टोरेंट में काम करते करते कुकिंग कार्य में काफी अच्छा ज्ञान हो गया था और पत्नी टेंग एक धनाड्य चीनी के घर पर हेल्पर का कार्य करती थी और इस तरह दोनों को मिलकर अच्छी आमदनी हो जाती थी. यहाँ पर ज्यादातर लोग बड़े कर्मठ है, खूब काम करते हैं तथा भारत की तरह जॉइंट फॅमिली का चलन न के बराबर है.

शादी के कई वर्ष हो गए थे पर भी चाहते हुए भी उनके कोई संतान नहीं हो पाई थी. कुक वोंग के रेस्टोरेंट में तरह तरह के लोग आते जाते थे, उनके साथ वह मौज मस्ती करने यदा कदा मलेशिया भी चला जाता था. सिंगापुर कुछ वर्ष पहले 1965 में ही तो मलेशिया से अलग हुआ था. सिंगापुर तब तक ज्यादा विकसित नहीं हुआ था और सिंगापुर के पहले प्रधान मंत्री ली क्वान यू आधुनिक सिंगापुर के निर्माता कहलाते हैं, उस समय जोर शोर से सिंगापुर के विकास के लिये कटिबद्ध थे. यह तो सर्व विदित है कि सिंगापुर को उच्च स्तर पर लाने का श्रेय उन्हें ही है, वे ही फादर ऑफ़ नेशन हैं. उन्होंने यहां से बुराइयों को हटाने के लिये सख्त नियम बनाये और उनका बहुत सख्ती से अनुपालन करवाया. ड्रग्स के लिये इतना कठोर दंड दुनिया में कहीं नहीं है.

उनकी शादी हुए कुछ ही वर्ष हुए थे तभी वोंग और टेंग के जीवन में भयंकर तूफ़ान आया जो भयंकर तबाही मचा कर गया और उन नए पति पत्नी पर कहर टूट पड़ा. एक दिन वोंग को गिरफ्तार कर लिया गया था, टेंग को भारी शर्मिंदगी उठानी पड रही थी, मुंह छिपाना पड़ रहा था, उसे इतना ही पता था कि वोंग के कई मित्र घूमने फिरने वाले, मौज मस्ती करने वाले तथा ड्रिंक का मज़ा करने वाले थे, जो यहाँ एक आम बात है. टेंग ने कभी वोंग को रोका या टोका नहीं था, क्योंकि वह जानती थी कि वोंग समझदार है, जिसे वह सात आठ वर्ष से जानती है. हां उन दोनों को इस बात का बड़ा खेद था कि लगभग छह साल की शादी में कोशिश करने के बावजूद उनके कोई संतान नहीं हुई थी. इस बात को लेकर वे थोडा परेशान हो जाते कि क्यों इतनी देर हो रही थी.

 एक दिन वोंग को मलेशिया से वापिस आते समय बॉर्डर पर कस्टम विभाग, नारकोटिक्स और बॉर्डर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया गया था. उसके पास से पैरों में प्लास्टिक थैली में बंधी थोडी हेरोइन ड्रग पकड़ी गयी थी. टेंग को पता नहीं कितने पैसे के लालच में, और कब वह उन दोस्तों ने ड्रग का कूरियर बना लिया था? एकाध बार पहले भी वह मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर चला जाया करता था क्योंकि वहां उसके मित्र रहते थे जो सिंगापुर में भी उसके पास आते जाते रहते थे, आने पर उसके रेस्टोरेंट में भी खाते पीते रहते थे पर वे घर कभी नहीं आये थे न टेंग कभी उनसे मिली थी. पर वे दूसरा ड्रग स्मगलिंग का गैर कानूनी धंधा करते हैं, ऐसा वह सोच भी नहीं पाई, वर्ना वह वोंग को उनसे दूर रहने को कहती.  

टेंग समझ रही थी कि वोंग को अपराध में गिरफ्तार तो कर लिया गया है पर वह केवल पहली बार मैसेंजर बना था शायद कोर्ट से उसे थोडी राहत मिल जाएगी, वह वोंग से मिलने के लिये कई बार मिलने जेल भी गयी थी पर उसे वोंग से मिलने की इज़ाज़त नहीं मिल पाती थी. वोंग के पकडे जाने के एक महीने बाद उसे पता चला था कि जिस ख़ुशी की बात के लिये वे दोनों कई साल से कोशिश कर रहे थे, चिंतित थे वह हो गयी थी. उसका पीरियड मिस होने पर जब टेस्ट प्रेगनेंसी टेस्ट हुआ तब पता चला कि वह प्रेग्नेंट हो गयी थी. वोंग से जेल में मिल तो नहीं पाई थी पर उसने पत्र जेल में देकर वोंग को इसके बारे में सूचित कर दिया था. पति के जेल में होने के कारण उसके लिये यह अब यह ख़ुशी,अब ख़ुशी नहीं रह गयी थी, अब तो वह एक तरह से बड़ी समस्या ही बन गई थी. वह परेशान थी कि अकेले पति का मुकदमा लड़े, अपना घर चलाये और जीवनयापन के लिये अपने काम पर भी जाए और बच्चा भी पैदा करे. हाँ, यह प्रेगनेंसी सूचना वोंग को जेल में देने पर वोंग ने अपनी खूब प्रसन्नता बताते लिख कर ज़बाब भेज दिया था. उन दोनो को विश्वास था कि या तो वोंग बरी हो जाएगा या कुछ कौड़े व कुछ दिन की जेल की सजा के बाद वह रिहा हो जाएगा. पुलिस ने असली दो अपराधियों को गिरफ्तार कर लिया था जिन्होंने इस काम के लिये एक तरह से फंसाया लिया था. पर ऐसा कुछ नहीं हो पाया था उन्हें हर स्टेप पर असफलता मिलती गयी. वोंग ने उसे लिख कर बताया था कि उसके एक मित्र ने उसका सामान पहुँचाने के लिये 1000 सिंगापुर डॉलर देने कि बात की थी वह सिर्फ धोखे से इस केस में से फंस गया था.उस समय तक सिंगापुर का नया क़ानून बहुत सख्त था बंचुका था. कोई माफ़ी गलती नहीं थी अपराध किया तो ऐसी कड़ी एक्सेम्प्लारी या अनुकरणीय सजा मिलना पक्का रहता है जिससे डर कर कोई आगे जुर्रत ही न कर सके. लगभग सभी देशों में कौड़े या कैनिंग करना बंद कर दिए हैं पर इस विकसित देश में अभी भी इनका खूब प्रयोग है और ये बहुत प्रभावी भी हैं. 

1977 में डिस्ट्रिक्ट कोर्ट द्वारा जजमेंट सुनाया जाना था, टेंग सुबह ही अपनी चार महीने की बेटी को लेकर पहले ईश प्रार्थना करने चर्च गयी फिर वहीं से सीधे कोर्ट में पहुंची. वोंग कोर्ट के कटघरे में मौजूद था उसने गर्दन झुकाई हुई थी. टेंग के होठों पर धीरे प्रार्थना चल रही थी. दोनों की आंखे मिली दूर से गोद की बच्ची को उसने देखा एक हल्की मुस्कान वोंग के चेहरे पर क्षण भर के लिये आई. दोनों पक्ष के वकील मौजूद थे.केस की बहस पहले हो चुकी थी. नए क़ानून बनने पर यह पहला ऐसा मुकदमा था जो यह तय करने जा रहा था कि क्या मामूली ड्रग केस में सिर्फ पास थोडी सी भी ड्रग पाई जाने पर फांसी दी जायेगी या स्ट्रोक्स/कैनिंग और लम्बी जेल की सजा दी जायेगी. यह उनको लगता नहीं था.

 डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के बाद, जब 1 नवम्बर 1977 को सिंगापुर के हाई कोर्ट जज ने वोंग को फांसी की सजा सुनाई वोंग बिलकुल शांत व निर्विकार बुत बना रहा शायद वह इस बात के लिये अपने आप को तैयार कर चुका था, या उसको अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने की ज़बरदस्त सामार्थ्य थी. पर टेंग तो फांसी की सजा सुन कर पागल सी होकर जोर जोर से रोने लगी थी, कोर्ट में उपस्थित सब दर्शकों की नज़र गोदी में बच्चे लिये जोर से रोते हुई टेंग पर थी. कोर्ट में उसकी रुलाई के अलावा पूरी शांति थी, पिन ड्राप साइलेंस था. सजा सुन कर बहुत लोगों का मुंह खुला का खुला रह गया था.
थोड़े समय के लिये कोर्ट की कारवाही रूकी हुई थी. टेंग के रोने कि करुण चीत्कार में दो साल की छोटी बच्ची को रूदन भी शामिल हो गयी थी, बहुत करुण दृश्य हो गया था. देख कर एक क्षण के लिये जज भी थोडा हिल गया था. पर जज महोदय ने वहां मौजूद सिक्यूरिटी स्टाफ को इशारा किया और स्टाफ टेंग और बच्ची को रोते रोते कोर्ट से बाहर ले गया. अब 29 वर्षीय टेंग को जीवन में अंधेरा ही अंधेरा नज़र आ रहा था. वे सुप्रीम कोर्ट में अपील पर गए वहां भी कुछ नहीं हो पा रहा था. वे दया याचिका के लिये भी गए कि मौत की सजा के बदले उम्र कैद मिल जाए पर इसे भी मंजूरी नहीं मिली.

 उस समय की बात बरसों बाद करते और थोडा मुस्करा कर मुस्कुराते हमें बताया था कि अगर उसके पास वह बच्ची न होती तो उस दिन वह आत्महत्या कर लेती ऐसा विचार उसके मन में आया था. पर छोटी अबोध बच्ची का क्या होगा इसी विचार ने ही उसे रोका था. उन्जे जीवन का वह ब्लैक डे था.

अगले दिन यह खबर सिंगापुर के प्रमुख अखबार, स्ट्रैट्स टाइम्स, में बड़ी प्रमुखता से छपी थी और टेंग को मुंह छिपाने कि ज़गह नहीं मिल पा रही थी. इस केस और इस तरह के केसों के बारे लेख लिखे गए. हाई कोर्ट की प्रिवी कौंसिल में क्षमादान की प्रार्थना पर भी सजा यथावत रही थी.
जजमेंट के दो साल बाद और दया याचना अपील रद्द होने के बाद 5 अक्टूबर 1979 में सवेरे सवेरे लॉन्ग ड्राप हैंगिंग से वोंग की कहानी समाप्त हो गयी, अजीब बात पता चली की फांसी देना वाला ज़ल्लाद भारतीय मूल का दर्शन सिंह था.
उस समय टेंग मात्र 29 वर्ष की, और बेटी एडेलीन केवल 2 वर्ष की थी वोंग को फांसी दे दी गयी. ड्रग सेवन करने और ड्रग माफिया दोनों को सख्त मेसेज चला गया था.
वोंग के बाद दूसरे ड्रग का प्रयोग करने वालों या उनको सिंगापुर में लाने कई और अपराधियों को भी इसी तरह फांसी की सजा मिली था, नतीजा यह कि सिंगापुर से यह अपराध लगभग खत्म हो गया, जीरो टॉलरेंस अपराध है. यहाँ तक कि अगर सिंगापुर निवासी किसी अन्य देश में ड्रग सेवन का अपराधी पाया गया उसे भी फांसी दी जा सकती है.

फांसी मिलने के एक दिन पहले टेंग को वोंग से मिलने दिया गया था. वोंग ने बिना कमज़ोर पड़े टेंग को सॉरी कहा था, चीनी भाषा में लिखा एक पत्र दिया था, और बोला था, ‘नाउ टेक अनेदर मैन’ अर्थात अब वह दूसरी शादी कर ले. बेटी का ख्याल करने के लिये बताया था. वह बिलकुल सामान्य व गंभीर था कोई रोना धोना नहीं किया. मुलाकात कोई 15 मिनट की थी वह बेटी एडेलीन को साथ लेकर गयी थी.

टेंग ने हिम्मत जुटाई दुनिया कि मुसीबतों से मुकाबले के लिये उसे चर्च ने बड़ा सहारा दिया, बताया कि आत्महत्या तो बाइबिल में बहुत बड़ा गुनाह है बहुत बड़ा पाप है और उसे पैगम्बर ईशा पर भरोसा रखना चाहिए. चर्च ने वोंग के दफनाने और अंतिम प्रेयर की रस्म का पूरा ज़िम्मा उठाया. जब क्रिस्चियन ग्रेवयार्ड कॉफिन से निकाल कर वोंग को कब्र में रखा जा रहा था वोंग का बूढा पिता गिर कर बेहोश हो गया था. पिता किसी देश या समाज को हो पुत्र शौक असहनीय महादुख है चाहे वे महाराज दशरथ हों चाहे वोंग के कमज़ोर बिमार पिता. देख कर टेंग भी द्रवित हो गयी थी और निश्चय किया कि वह उस बुजुर्ग की भी देखभाल करेगी जिसने अपना बेटा खो दिया था और उसका अब उसके और उसकी पोती के अलावा कोई नहीं था.

इसके बाद टेंग ने दोबारा अपने आप को मज़बूत बनाने का इरादा किया. चर्च ने भी उसे हर तरह से मदद करने का आश्वासन दिया उसकी तारीफ़ करते हुए फादर विलियम चुंग ने उसे बताया की जीसस क्राइस्ट उसी इंसान को मुसीबत का क्रॉस उठाने के लिये चुनते है जिसमें ताकत हो.

   इसके बाद टेंग ने अपनी दो साल की बेटी एडेलीन को अपने भाई के परिवार को सौंपा जहाँ उसकी बुजुर्ग मां भी रहती और जो धेवती एडेलीन को सप्ताह में 6 दिन अपने पास रखती रविवार को एक दिन टेंग उसको अपने पास रखती थी. टेंग पूरे सप्ताह में छः दिन सुबह साढ़े छ से रात दस बजे तक कई घरों में काम करती जिससे अपना अपने ससुर का तथा अपनी बेटी का खर्चा उठाती थी. सिर्फ रविवार को अपनी बेटी एडेलीन का साथ मिलता. वह हर महीने थोडा पैसा बचाती जिससे वह भविष्य में एडेलीन की अच्छी पढाई लिखाई कर पाए.

टेंग ने इस तरह देह तोड़ मेहनत से परिवार को चलाया. वोंग की मौत के कम उम्र ही थी, लम्बी सुनसान जिंदगी सामने थी, उसके कुछ पुरुष मित्रो या साफ़ भाषा में बॉय फ्रेंड्स भी बने कुछ ने उसे प्रोपोज भी ’किया’ परन्तु उसने कभी स्वीकार नहीं किया. उसका मुख्य कारण था कि वह अपनी बेटी को आगे ले जाने के प्रयास में कमी आ जायेगी इसलिये वह अपनी बेटी पर थोडा सख्त भी हो जाती थी अगर वह कुछ गलती करती. उसके स्कूल के अध्यापक भी एडेलीन की लापरवाही और पढाई में कमजोरी की बात टेंग वोंग को बताते, टेंग उससे पूछती तो वह उलटे सीधे जबाब देती और बहस करती. इस तरह मा बेटी के बीच में खिंचाव रहने लगा था. माँ जितना उसे समझाने की बात करती वह विद्रोही होती चली जा रही थी. टेंग को बड़ी चिंता थी कि कहीं बेटी भी वोंग की तरह ख़राब कंपनी में जाकर बिगड़ ना जाए. इस तरह एडेलीन ने साधारण ग्रेड से दसवीं के बोर्ड पास कर गयी पर टेंग को निराशा हुई. उसे कभी कभी डर भी समाता की एडेलीन के पिता से मिले जीन उसे पिता के रास्ते पर ले जाकर बिलकुल बरबाद न कर दें.

 दसवीं का बोर्ड करने के बाद एडेलीन को एक पोलीटेक्निक में दाखिला मिल गया था और उसने साधारण से पास भी कर लिया तथा एक कंपनी में सर्विस भी कर ली पर साथ साथ रहते भी माँ बेटी के बीच एक खिंचाव हमेशा से बना हुआ था बहुत देर जाकर हटा था. इतना बताया कि अब सब ठीक चल रहा है और वह बेटी के साथ रहने लगी है 78 वर्ष कि हो चुकी है, उसे ज़िदगी से कोई शिकायत नहीं है.

 बेटी की गाथा बेटी की ज़बानी,

एडेलीन भी एक दिन अपने माँ के साथ हमारे सीनियर सिटीजन जिम में आई थी उस दिन का ऑफ था, टेंग ने ही हमारा आपस में परिचय कराया था, वह अंग्रेजी में बहुत साफ़ बात कर रही थी, उससे हमने उनकी असधारण माँ की बताई असाधारण कहानी को बताने के बारे में जिज्ञासा की, तो भी वह बिना झिझक इस के लिये तैयार हो गयी थी. उसने जो बताया वह निम्न है.

एडेलीन ने बताया कि अपने छोटेपन से लगा कर काफी बड़े होने तक वह अपनी माँ से बहुत निराश रही. उसके लिये माँ के पास समय न समय था और न प्यार के दो शब्द. इसलिये वह समझती थी उसकी माँ उसे बिलकुल भी प्यार नहीं करती. वैसे भी माँ सख्ती भी खूब करती थी, इसलिये कि मैं माँ से से नफरत करती रही थी. मैं समझती थी कि मैं अनचाही संतान हूँ, माँ ही नहीं कोई भी मुझ से प्यार नहीं करता. मैं जब भी इनसे अपने पिता के बारे में पूछती बस आंसुओं की साथ जोर से रोने लगती थी कुछ नहीं बताती थी. इस तरह उसका बचपन बहुत उपेक्षा, भरा था, शर्मिंदगी का था जब कोई मुझसे पिता के बारे में पूछता. मैं चुप रहती. किसी से मिलने पर बुझे मुझे डर सताता रहता कहीं मेरे से पिता के बारे में न पूछ ले. इसलिये मैं सबसे अलग पड़ती चली गयी अनचाही, और कुछ विद्रोही, मुझे किसी पर भरोसा नहीं रहा था अपनी माँ पर तो बिलकुल भी नहीं वह बहुत कठोर लगती और उस के पास मेरे लिये कोई समय नहीं था, मेरे लिये भी उसके लिये कोई परवाह नहीं थी. कई बार तो माँ दुखी कर मुझे एक तसल्ली सी मिलती थी. एक तरह का पर पीड़ा सुख- सैडिस्ट हो गयी थी.

मुझे सिर्फ इतना पता था सिर्फ पता था कि जब मैं दो साल की थी मेरे पिता का देहांत हुआ था. मैंने खुद भी अपने रिश्तेदारों से जब यह जानना चाहा, वे या तो टाल जाते या उसे बड़े आराम से कह देते कि बस मर गए. सो पिता का मौत एक रहस्य ही रहा था. मुझे बस पता नहीं क्यो लगता रहता था कि मैंने एक बार अपने पिता को देखा था जब बहुत छोटी थी वे बगल के कमरे से आकर गोदी में कुछ क्षण के लिये उठाया चुपचाप जैसे आये थे चले गए थे,बस पता नहीं क्यों यह एक एहसास मुझे था.   

निराशा के कारण पढने में कोई मन नहीं लगता था, मैंने ख़राब संगत में भी दिन गुज़ारे, छोटी मोटी चोरी चकारी भी की सिगरेट,शराब, सेक्स सब कुछ नहीं छोड़ा. अपने कमाए हुये पैसे भी खूब उडाये. पर कहीं कोई चैन नहीं मिल पाया था. माँ लगी रही अपनी राह पर आपस में बात नहीं हो पाती थी, जीवन में कुछ सार्थकता नहीं थी.

फिर एक दिन जब मैं 30 वर्ष की हो गयी एक पत्र ने ज़िदगी बदल दी. मेरी माँ ने कई बार ज़िक्र किया था कि मरने से एक दिन पत्र तुम्हारे पिता ने चीनी भाषा में लिखा था उसे मैं उनके साथ पढ़ लूं,पर मैंने दिलचस्पी नहीं दिखाई दी और कहा कि उसे देदे जो उस की माँ नहीं दिया. इस तरह बरसों तक बेटी माँ से खुश नहीं रही और यही समझती रही माँ को उस से प्यार नहीं है बस नफरत ही नफरत थी.

माँ अपनी बेटी के शुष्क व्यवहार और लापरवाही से अन्दर ही अन्दर दुखी रही मेहनत से अपना ओर बेटी का जितना हो सकता था ध्यान रखती थी भले ही बदले में बेटी का रुखा व्यवहार मिलता. वह कई बार देख कर आहत होती कि उसकी बेटी को समझ कब आएगी कब उसकी भावना को समझेगी. अब तक को बेटी को पता चल गया था कि उसके पिता को हेरोइन को मलेशिया से सिंगापुर ड्रग लानेके कारण फांसी मिली थी.इस बात को लेकर अपने माँ बाप दोनों के प्रति उदासीन थी उसकी मुझे शर्मिंदगी थी. पिता के बारे में तो अच्छी राय कैसे हो सकती थी.

एक बार एडेलीन की एक घनिष्ट मित्र उसे साथ लेकर माँ वाले चर्च गयी. चर्च के फादर विलियम ने उसके पिता के बारे में और माँ की मेहनत, बलिदान के बारे में बताया फिर अपने पुराने रिकॉर्ड से निकाल कर एक अखबार की कटिंग दिखाई और खबर में यह भी लिखा था कि अपनी मौत से पहले अंतिम इच्छा के तौर पर वोंग ने अपनी बेटी को एक बार गोदी में लेने की इच्छा प्रगट की और उसे गोदी लेने के बाद अगले दिन उसे फांसी दे दी गयी थी जिसमें बिना कोई दुःख दिखाते शांत भाव से फांसी पर चढ़ दुनिया से विदा हो गया था. फादर ने उसे यह भी बताया कि चर्च ने ही उसकी माँ को आत्महत्या से समझा कर रोका था. सब सुन कर एडेलीन सन्न रह गई उसकी आँख पर बचपन से पड़ा पर्दा हट गया था. उसे याद आया कि यह उसका अहसास मात्र नहीं था कि उसके पिता ने उसे वास्तव में गोदी लिया था यह सच था यह पहली बार उसने जाना. जिससे उसे बड़ी आंतरिक प्रसन्नता हुई थी. यह जान कर भी अच्छा लगा कि मौत सामने होते हुए भी वे धीर गंभीर रहे, रोये कलपते नहीं रहे. और यह भी कि वे अपराधी न होकर लालच वश एक गल्तो कर बैठे थे.  

शाम को जैसे ही उसकी माँ आई उसने अपने पिता के पत्र को साथ साथ पढने की स्वयं गुजारिश की. माँ को सुन कर आश्चर्य हुआ. पूरा पत्र पढने पर यह पढ़ जान कर कि उसके पिता ने अपनी अपनी बेटी के लिये लिखा था कि ‘वह बड़ी होने पर अपनी माँ के साथ ‘संतानोचित(फिलिअल) व्यवहार करे और उसकी देख भाल करे’ वह पश्चाताप से भर गयी और रोते रोते उसकी हिचकी बंध गयी, उसे भारी अफ़सोस हो रहा था कि उसने जान बूझ कर अपनी माँ को सताने का अपराध किया है,रोते रोते रोते माँ से माफ़ करने कि गुहार मचाती रहीं. इस तरह बहुत देर तक बेटी के साथ लिपट कर माँ बेटी रोती रही. पर बाद में रूदन सुखद हो गया था. वे एक दूसरे को अच्छी तरह से पा गए थे. यही वह पुराना छोटा सा चीनी भाषा में लिखा था जिसने उसकी पूरी जीवन धार बदल दी.

आजकल माँ बेटी साथ रहती है, बेटी ने बड़ी मेहनत अपनी बचत तथा कुछ मित्रों के सहयोग से से एक एनजीओ चलाया हुआ है जिसमें वे सजायाफ्ता, जेल में बंद या फांसी दिए परिवारों को तरह तरह से मदद कर सामान्य व इज्जत से जीने के लिये बहुत सक्रिय हैं. उनका मानना है अपराधी को सजा मिलती है वह ओ उचित मान सकते हैं पर उनके परिवारों को तो बिना अपराध किये ही सजा ही नहीं जिल्लत और अपमान सहना पड़ता है, भयंकर आर्थिक कठिनाईयों से गुज़ारना पड़ता है. इसके लिये बहुत कुछ करने की आवश्यकता है.   

यहाँ आने से पहले मैं सिंगापुर का वीसा लेने के लिये दिल्ली की एक ट्रेवल एजेंसी में बैठा था तब वहां का एक एग्जीक्यूटिव युवकों के एक ग्रुप को समझा रहा था कि अगर शरीफ बन कर घूमना चाहते हो सिंगापुर जाओ अगर कुछ खुराफात दिमाग में तब सिंगापुर में कदम भी मत रखना तब थाईलैंड या मलेशिया जाओ. बिलकुल प्रैक्टिकल सलाह है सभी पाठकों के लिये भी.