Prem n Haat Bikaay - 12 in Hindi Love Stories by Pranava Bharti books and stories PDF | प्रेम न हाट बिकाय - भाग 12

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 12

12--   

 

     एक तो टॉप करने के बावज़ूद भी एम.फ़िल में छात्रवृत्ति नहीं मिल रही थी, छात्रवृत्ति सीधे पीएच.डी में ही मिलती, दूसरे बहुत बड़ी समस्या थी कि उसी वर्ष यह नियम आया था कि एम.फ़िल की छात्राओं को हॉस्टल में रहना ज़रूरी था | विवेक के अधिकांशत: शहर से बाहर जाने के कारण उसकी हालत पतली होने वाली थी| आख़िर कैसे मैनेज करेगी जब अकेले ही बच्चे संभालने के साथ हॉस्टल में भी रहना पड़ेगा | वह निराश हो गई | प्रिंसिपल के पास गई जो उससे बहुत प्रभावित थे किन्तु उन्होंने भी कहा ;

"बहन ! यह तो नियम है ---"उसे लगा ये नियम भी मज़ाक हैं, जब चाहे बना लो --- उसी वर्ष यह नियम लागू किया गया था |   

"बहन, सुनिए  ----" जब वह अनमनी होकर प्रिंसिपल के पास से उठकर जाने लगी अचानक उनकी आवाज़ से ठिठक गई | 

"जी ---कहिए --"

"ऐसा करिए, आप चँदा बहन से मिल लीजिए --शायद वो कोई रास्ता दिखाएँ ---" अनामिका को प्रिंसिपल की आवाज़ में जैसे कोई रहस्य छिपा महसूस हुआ | 

"जी ---नमस्कार" वह बाहर निकल आई और उस रहस्य की तलाश में लड़कियों के हॉस्टल की ओर उसके क़दम बढ़ गए | 

       चँदा बहन एक भारी-भरकम डीलडौल की रौबदार महिला थीं |नियमानुसार उनको भी प्रतिदिन  कताई व प्रार्थना करने विद्यालय के प्रार्थना-हॉल में आना पड़ता था | दो वर्षों में वे उससे परिचित भी हो गईं थीं | कभी-कभी संगीत की बहन विमला  जी की अनुपस्थिति में उसे स्टेज पर बैठकर प्रार्थना करने व भजन  के लिए भी पुकारा जाता था, वे उसे पहचानती तो थीं ही | वैसे भी अनामिका के आने के बाद सोते हुए वातावरण में जान सी आने लगी थी | गुरु जी बेशक टोकते रहते कि यहाँ इतना हँसना, मुस्कुराना ठीक नहीं आख़िर वह विद्यापीठ है ---तो ! वह सोचती, यहाँ चेहरे लटके रहने का नियम लटका देना चाहिए न ! उसकी  व भारती की उपस्थिति में चेहरे लटके हुए तो रह नहीं सकते थे |प्रार्थना-खंड में भजन के लिए  मंच पर भी उसका जाना होने लगा था | वह जब मुस्कुराते हुए कोई भजन प्रस्तुत करती, वहाँ के लोग उसे तानपुरा पकड़े नुए मीराबाई कहते | इस प्रकार सारा विध्यापीठ उससे परिचित हो चुका था  ;

"केम, अनामिका बेन --आजे आ बाजू ---?"(आज इधर कैसे आना हुआ अनामिका बहन ?)

     अनामिका ने चँदा बहन को पूरी कथा सुना दी | चँदा बहन की बुद्धि खूब चलती थी | उन्होंने जो बात समझाई उसका आशय था कि अनामिका को एक कमरा दे दिया जाएगा जिसमें वह अपना थोड़ा-बहुत सामान रख लेगी | शाम को सात बजे प्रार्थना फिर भोजन होता था  | वह चाहे तो भोजन करे अथवा प्रार्थना करके घर चली जाए लेकिन सुबह पाँच बजे की प्रार्थना में सम्मिलित होना बहुत आवश्यक था |सुबह व शाम दोनों समय स्कूल के बच्चों की तरह उपस्थिति ली जाती थी |चँदा बहन हाथ में रजिस्टर और पैन लेकर प्रार्थना-स्थल पर खड़ी रहतीं | बस--हाथ में एक छड़ी ही न होती |  एम.फ़िल करना है तो अनामिका को दोनों समय प्रार्थना के लिए शाम सात बजे व सुबह पाँच बजे हॉस्टल में उपस्थित रहना ही होगा |

       अनामिका को अपने बचपन के कत्थक नृत्य के गुरुजी की स्मृति हो आई, वे भी चँदा बहन की भाँति लंबे-चौड़े, हृष्ट-पुष्ट थे | जिनके हाथ में एक छड़ी रहती, जब बच्चियाँ  शैतानी करतीं या गलत तोड़े बोलतीं, मास्टर जी की छड़ी चल ही जाती | उसने कितनी छड़ी खाई हैं, सोचकर उसके चेहरे पर मुस्कान तैर गई | वह चँदा बहन के हाथ में छड़ी की कल्पना करते हुए अतीत में पहुँच गई |   

        उन्हीं दिनों वह संगीत के गुरु जी से संगीत भी सीख रही थी यानि एक ही क्लब में हॉल में उसकी कत्थक की कक्षा से पहले ऊपर गुरु जी के कमरे में संगीत की कक्षा होती |उसी कैम्पस में ऊपर के कमरे में संगीत के गुरु जी सब बच्चों की अलग-अलग ग्रुपों में संगीत की कक्षा लेते थे | अनामिका अक्सर नृत्य की कक्षा से बाथरूम जाने के लिए मास्टर जी को अपनी नन्ही उँगली (कनिष्ठा)दिखाती और जल्दी लौटने की जगह संगीत के गुरु जी के कमरे के सामने वाले ऊँचे कटारों(इमली ) के पेड़ पर चढ़ जाती | गुरु जी से संगीत सीखने जाने वाली लड़कियों  का ग्रुप भी ऊपर गुरु जी के कमरे में जाने से पहले उसको पेड़ पर चढ़ा देखकर बीच में ही कटारे लेने रुक जाता | 

"आना, फेंक न कटारे ---"और उसे पता ही न चलता समय का, वह कब ऊँची डाल पर जा पहुँचती और कटारे तोड़-तोड़कर नीचे फेंकती जाती |

संगीत के गुरु जी की खिड़की उसी कटारे (इमली) वाले पेड़ की ओर खुलती थी | उनकी दृष्टि अनामिका पर पड़ ही जाती और वे नीचे खड़ी लड़कियों को पुकारते ;

"मैं तुम्हारे समय से अधिक समय नहीं दूँगा, तुम लोग लेट हो रहे हो ---"

      लड़कियाँ कटारे लपकते हुए भागतीं | गुरु जी के ‘बैच’ बँधे हुए थे| ऊपर, उनके कमरे में  जाने पर लड़कियाँ सुनतीं ;

"अनामिका की इतनी सुंदर आवाज़ है, गंभीरता से  रियाज़ करे तो  एक अच्छी ग़ज़ल-सिंगर बन सकती है |लेकिन नहीं, कटारे खाकर आवाज़ खराब करनी अधिक महत्वपूर्ण है इसके लिए --"एक लंबी श्वाँस भरकर कहते ; 

"माँ शारदे सद्बुद्धि दें ---चलो, तुम लोग शुरू करो ---"फिर उनके हाथ तानपुरे पर चलने लगते |

     संगीत के गुरु पंडित सुरेश चंद्र जी काफ़ी कोमल स्वभाव के थे, उनसे बिलकुल विपरीत नृत्य के मास्टर श्री शिवदत्त जी थे | महाकड़क स्वभाव के !आना को तब तक समझ में नहीं आता था कि संगीत के शिक्षक को गुरु जी और नृत्य के शिक्षक को मास्टर जी क्यों कहा जाता था ?जबकि दोनों ही तो कला में पारंगत थे | लेकिन इसकी व्याख्या करने वाला कोई नहीं था | छोटा शहर था जो अभी बड़ा बनने की होड़ में था ---सो, जैसा एक बार शुरू हो गया सो हो गया !

   हाँ, बाद में माँ ने समझाया था कि दोनों ही गुरु जी हैं | कत्थक नृत्य मुगलों के समय से शुरू हुआ शायद इसलिए उन्हें मास्टर जी कहा जाता होगा | माँ भी इस बारे में बहुत अधिक नहीं जानती थीं | उन्होंने किशोरी वय में आना के उत्सुक प्रश्न का उत्तर देने की कोशिश अपनी सोच के अनुसार की थी |  

           नृत्य का हॉल कुछ दूरी पर था |दूर से मास्टर जी उसके बंदरों सी उछल-कूद देखते और किसी लड़की को उसे बुलाने भेजते | हॉल में जाने से पहले वह अपने फ़्रॉक की जेब में भरे कटारे हॉल के बाहर बरामदे के कोने में छिपा जाती |जो अक़्सर कक्षा पूरी होने के बाद लौटने पर उसे नदारद मिलते | 

        अंदर जाकर मास्टर जी की छड़ी हथेली पर पड़ती लेकिन कटारों  का खट्टा स्वाद उसके हाथ पर पड़ी पतली संटी  की मार से बाज़ी मार ले जाता | मज़े की बात यह थी कि मास्टर जी ने वह संटी भी उसीसे तुड़वाई थी | 

"जाओ, अनामिका, उस नीम के पेड़ से एक लंबी डंडी तोड़कर ले आओ ---"कई दिन पहले मास्टर जी ने उससे कहा था| 

      वह कुछ समझ नहीं पाई थी और मूर्खों की तरह 'मोटे मास्टर जी' के चेहरे पर पटर-पटर देखने लगी थी | नृत्य के मास्टर जी कुछ थुलथुले थे इसलिए "सब बच्चे उन्हें गुपचुप  'मोटे मास्टर जी' कहते |  

"तुम्हें पेड़ पर चढ़ना बहुत पसंद है न?"उन्होंने बड़े प्यार से पूछा था और उसने बड़े मज़े में अपनी मुंडी हिलाई थी | 

 "तो जाओ फटाफट मेरे लिए एक लंबी, पतली डंडी तोड़ लाओ --" 

      उस दिन उसको तोड़े भी याद नहीं थे सो ख़ुशी-खुशी नीम के पेड़ पर चढ़कर एक लंबी, पतली डंडी तोड़कर मास्टर जी को लाकर मुस्कुराते हुए उनके हाथ में थमा दी |सोचा था, मास्टर जी उससे खुश हो जाएंगे लेकिन  उसे क्या पता था कि सबसे पहले वह संटी उसके ही हाथ पर पड़ेगी | 

     मास्टरजी तोड़े लिखवाते थे और अगले दिन सुनते भी थे फिर उन पर स्टैप्स बताते जिनकी  प्रैक्टिस बच्चों को करनी होती | पर उसे शैतानी से फ़ुरसत मिलती तब न ! 

'बताओ, डाँस में भी पढ़ाई और संगीत में भी पढ़ाई --!!’वह सोचती |