(कमरा वही है… पर अब खाली नहीं—
बल्कि दिखाई न देने से भरा हुआ।)
(ना सुनीति दिख रही है, ना कौशिक। सिर्फ़ दो साँसों की आवाज़ें।)
अब वो अकेली नहीं थी…अब वो दोनों ही
दुनिया की नज़रों से ग़ायब हो चुके थे।
सुनीति (टूटी हुई आवाज़ में) बोली -
“मुझसे गलती हो गई कौशिक…
मैंने सोचा था मेरे अदृश्य होने से आप बच जाएँगे…”
(वो अपने हाथ देखती है—कुछ भी नहीं।)
सुनीति बोली -
“पर मुझे ये नहीं पता था कि जिस दवा को मैंने पिया…उसका कोई antidote ही नहीं है…”
(कौशिक उसे देख रहा है। अदृश्य आँखों से अदृश्य आँसू। वो दोनों अब एक दूसरे को बिना चश्मे के भी देख सकते थे। छू सकते थे। क्योंकि दोनों एक जैसे थे। कुछ देर पहले तक कौशिक उसे देख भी नहीं सकता था पर जैसे जैसे दवाई का असर पूरा हुआ वो सुनीति को देख सकता था।)
कौशिक (शांत लेकिन भारी आवाज़ में) बोला -
“तो फिर तुम अकेली क्यों डर रही हो…?
जब गलती हमारी है तो सज़ा भी साथ मिलकर भुगतेंगे।”
सुनीति बोली -
“अगर हम कभी ठीक नहीं हुए तो…?”
(कुछ पल की चुप्पी।)
कौशिक बोला कि
“तो भी हम साथ होंगे।”
अजीब विडंबना थी—
जो दुनिया से छुपे थे वो ही अब एक-दूसरे को सबसे साफ़ देख पा रहे थे।
सुनीति (सोचते हुए) बोली -
“वो केमिकल… वो पूरी तरह experimental था।
डॉक्यूमेंट्स में साफ़ लिखा था—
‘No antidote possible.’”
कौशिक बोला है
“Science कभी ‘ना’ नहीं कहती सुनीति…
बस रास्ता लंबा होता है।”
(सुनीति अचानक चौंकती है।)
सुनीति बोली -
“एक चीज़ है…जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।”
कौशिक बोला -
“क्या?”
सुनीति बोली -
“जिस दिन हम एक-दूसरे के पास आते हैं
हमारी आँखें अपने आप बंद हो जाती हैं…
मतलब हमारी visibility emotion से जुड़ी है।”
कौशिक (धीरे) बोला -
“तो शायद इलाज भी किसी दवा में नहीं…
हमारे connection में है।”
सुनीति (डरते हुए) बोली -
“पर अगर हम गलत हुए…
तो हम हमेशा के लिए अदृश्य हो सकते हैं…”
कौशिक बोला -
“और अगर सही हुए…तो हम दोनों वापस।”
(कौशिक अपना हाथ आगे बढ़ाता है।
कुछ पल… फिर सुनीति का अदृश्य हाथ उसमें समा जाता है।)
दुनिया के लिए वो नहीं थे… पर एक-दूसरे के लिए
अब भी सब कुछ थे।
सुनीति (मजबूत स्वर में) बोली -
“तो तय रहा…हम antidote नहीं ढूँढेंगे…”
कौशिक बोला -
“हम खुद antidote बनेंगे।”
(कमरे में सन्नाटा… पर इस बार डर नहीं।)
जब दो लोग पूरी दुनिया से गायब हो जाएँ…
और फिर भी एक-दूसरे को चुनें—
वहीं से चमत्कार शुरू होते हैं।
(अंधेरा नहीं था…बस शांति थी।)
अब उन्हें डर नहीं लगता था। डर तब होता है जब खोने का डर हो। अब तो खोने को कुछ बचा ही नहीं था।
सुनीति (हल्की मुस्कान के साथ) बोली -
“शायद हम कभी ठीक नहीं होंगे…”
कौशिक (शांत स्वर में) बोला -
“हाँ…पर शायद अब
हमें ठीक होने की ज़रूरत भी नहीं।”
(दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे—बिल्कुल साफ़।)
वो एक-दूसरे को देख सकते थे,
छू सकते थे, महसूस कर सकते थे… बस दुनिया की नज़र से
ग़ायब थे।
सुनीति बोली -
“जब दुनिया हमें नहीं देख सकती
तो क्यों न हम अपनी ही दुनिया बना लें?”
(कौशिक उसकी ओर देखता है।)
कौशिक बोला -
“एक ऐसी दुनिया जहाँ सिर्फ़ हम हों।”
(दिन का दृश्य।वोएक पुरानी, बड़ी हवेली। बाहर से वीरान… पर अंदर?)
घर बाहर से भूतिया हवेली लगता था…पर अंदर सब कुछ ज़िंदा था।
(सुबह।)
(दीपक अपने आप जलता है। अगरबत्ती की खुशबू फैलती है।)
सुनीति (पूजा करते हुए) बोली -
“भगवान…हमें अलग नहीं किया यही बहुत है।”
(घंटी बजती है—कोई दिखाई नहीं देता।)
(फर्श झाड़ा जा रहा है। बर्तन धुल रहे हैं। खिड़कियाँ खुली हैं।)
लोग कहते थे—
“अगर घर में कोई नहीं रहता तो इतना साफ़ कैसे रहता है?”
पर जवाब देने वाला कोई था ही नहीं।
(पास के कुछ लोग डरते-डरते हवेली की ओर देखते हैं।)
पड़ोसी 1 बोलीं -
“रात को दीपक जलता है…”
पड़ोसी 2 बोला -
“घंटी भी बजती है…पर कोई दिखता नहीं…”
पड़ोसी 3 (डरते हुए) बोली -
“पक्का भूत है…”
(धीरे-धीरे घरों पर ताले लगते जाते हैं। लोग सामान समेटकर चले जाते हैं।)
डर ने पूरे मोहल्ले को खाली कर दिया। अब वो हवेली सच में अकेली थी।
(रात।
हवेली के अंदर।)
(सुनीति और कौशिक आमने-सामने बैठे हैं।)
सुनीति (मुस्कुराकर) बोली -
“देखा…अब कोई हमें परेशान नहीं करेगा।”
कौशिक बोला -
“और कोई हमारे बीच भी नहीं आएगा।”
(सुनीति कौशिक के कंधे पर सिर रख देती है।)
दुनिया के लिए वो भूत थे…पर एक-दूसरे के लिए आज भी इंसान से ज़्यादा।
सुनीति (धीरे से) बोली -
“कौशिक…अगर कभी कोई रास्ता मिला वापस दिखने का… तो?”
(कौशिक कुछ पल चुप रहता है।)
कौशिक बोला -
“तो हम सोचेंगे…पर अभी यही हमारी ज़िंदगी है।”
(हवेली के अंदर दीपक जल रहा है। बाहर पूरा अंधेरा।)
कुछ प्रेम दिखाई देने के लिए नहीं होते… वो बस महसूस किए जाते हैं।