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उसे इस तरह तड़पते हुए देख सभी घबरा से गये थें। पार्टी-वार्टी छोड़ वे सब उसे घेरे हुए बैठे थे और वो बस सबको ताकने का काम कर रही थी। पर इस बात से वह खुश थी कि सब उसके लिए कितना परेशान हो रहें हैं।
"मां! आप परेशान मत हो, मैं पूरी तरह ठीक हूं।" उसने कहा और मुस्कुरा दी। जिसे किलकारियां भरते देख सबके चेहरे पर मुस्कान लौट आई। उसने तय किया कि जब तक वह बड़ी नहीं हो जाती तब तक वो अपने दुश्मनों को नजरंदाज करेंगी।
"वैसे भी उन्हें तो अंदाजा भी नहीं है कि मैं वापस आ गई हूं उसको सबक सिखाने के लिए। जब तक मैं छोटी हूं चैन से जी लो, उसके बाद तो कोर्ट-कचहरी के चक्कर में ही फंसना हैं। अगर कोर्ट ने सजा नहीं सुनाई तो मैं खुद अपने आप को न्याय दिलाऊंगी।" उसने खुद से कहा और मुस्कुराते हुए किलकारियां मारने लगी। उसे नहीं पता था कि अगले छः महीनों में वो सब कुछ भूलने वाली थी।
"ओह! मेरी राजकुमारी! तुम फिक्र मत करो, हम तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे।" दादी मां ने उसे गोद में लेते हुए कहा। और प्यार करने लगी।
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धीरे धीरे दिन बीतने लगे थे। वह अब स्कूल जाने लगीं थी। वह चार साल कि हो चुकी थी और अपना पिछला जन्म भी भूल चुकी थी। अब उसे इस फैमिली की आदत हो गई थी। आजकल वो किंडरगार्टन में पढ़ने जाती थीं। यहां पढ़ाई के इलावा सब होता था। क्योंकि उनका मानना था कि छोटी उम्र में बच्चों को सिर्फ बचपन इंजॉय करना चाहिए, नई नई गतिविधियां सीखना चाहिए और वो वहीं कर रहीं थीं।
अमीर बच्चों के स्कूल में, अमीर बच्चों के साथ रह रह कर वो भी थोड़ी सी बदल गई थी। बात बात पर नखरें करतीं थीं।
"अरे वाह! आनिया, यह तो बहुत खूबसूरत है। तुम इसे कहां से लाई हों?" हरि की बहन शैलजा ने आनिया के हाथ में प्यारी सी गुड़िया देख कर कहा।
"ये मेरी डॉल है, इसकी ड्रेस देखी? पेरिस से आई है! तुम बस दूर से देखो, ठीक है?" आनिया ने कमर में हाथ रखते हुए कहा। वह अपने डॉल पर इतरा रहीं थी क्योंकि उसके जैसा डॉल और किसी के पास नहीं था। वह एक कस्टमाइज़ डॉल थी जो बहुत ही प्यारी थी।
"मुझे भी खेलना है! क्या तुम इसे थोड़ी देर के लिए मुझे दे सकती हों?" शैलजा ने मुस्कुराते हुए कहा लेकिन आनिया ने मुंह फेर लिया।
"नहीं! इसे किसी को नहीं दूंगी। यह मेरी फेवरेट हैं?" आनिया ने कहा तो शैलजा उदास हो गई। लेकिन तभी उसे एक तरकीब सूझी।
"आनिया! मैं कल तुम्हारे लिए मेरी मां के हाथों से बना हुआ फ्रेंच फ्राइज़ लेकर आउंगी। फिर क्या तुम मुझे थोड़ी देर के लिए दे दोगी?" शैलजा ने मक्खन लगाया तो आनिया को फिसलते देर न लगी। क्योंकि मां उसे कभी भी चटपटी और तली हुई चीजें ठीक से खाने नहीं देती थी इसलिए फ्रेंच फ्राइज़ का नाम सुनकर वो खुश हो गई।
"हां ठीक है! पर मेरे भाईयो को मत बताना।" आनिया ने मुंह पर ऊंगली रखते हुए कहा जिससे शैलजा ने भी मुंह पर ऊंगली रख लिया।
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अगले दिन जब शैलजा उसके लिए फ्रेंच फ्राइज़ लाई तो वह बहुत खुश हुई। उसने अपनी गुड़िया उसे दे दी और खाने में मगन हो गई। उसे ऐसी चीजें खाना बहुत पसंद था। यह मां के हाथों बने फ्रेंच फ्राइज़ से अलग था। इसमें कई मसाले थे और ज्यादा क्रंची और टेस्टी था। यह हरी सब्जियों से बहुत अलग था।
"थैंक्यू शैलु! मुझे यह बहुत पसंद आये।" उसने आखिरी कोर लेते हुए कहा ही था कि हरि और यश वहां आ गए जहां आते ही हरि के अंदर का शैतान जाग गया और उसने शैलू के हाथों की गुड़िया छीनीं और दूर फेंक दी। जिस पर शैलू तो रोने लगी मगर आनिया ने हरि को काट लिया।
अब दोनों के बीच घमासान युद्ध चल रहा था। जहां आनिया उसे काट रहीं थी तो हरि उसके बालों को खींच रहा था। यश दोनों को छुड़ा रहा लेकिन वह नहीं कर पाया। आखिर में शैलू वीर और रुद्र को बुला कर लाई मगर कोई फायदा नहीं। अब भी दोनों एक-दूसरे को भींच रहें थें। तभी टीचर आई और गुस्से में दोनों को थप्पड़ लगा बैठीं।
सबकी नजर टीचर पर थी क्योंकि जिन्दल साहब ने एडमिशन के समय सख़्त हिदायत दी थी कि कोई भी उनके बच्चों को परेशान नहीं करेगा और न ही उन्हें किसी तरह का चोट पहुंचाएगा। अगर ऐसा कुछ हुआ तो वे स्कूल को कभी भी स्पोंसर नहीं करेंगे और टीचर को भी जॉब से हाथ धोना पड़ सकता है। उनकी लिस्ट तो उससे भी बड़ी थीं।
फ़्लैशबेक🎀🌿🐥
शहर के सबसे महंगे स्कूल सेंट ऑरोरा इंटरनेशनल स्कूल के ऑफिस में उस कुछ अजीब हुआ। नियम और अनुशासन को सख्ती से पालन करने वाले स्कूल में आज कुछ अजीब कंडीशन रखने वाले देश के टॉप टेन अमीर बिजनेस मैन में से एक दी ग्रेट करण जिन्दल की बेटी आनिया जिंदल की बेटी का एडमिशन होने वाला था।
दरवाज़ा खुला… और अंदर आए देश के सबसे अमीर उद्योगपति मिस्टर जिन्दल। साथ में उनकी चार साल की बेटी आनिया, गुलाबी फ्रॉक, हीरे की छोटी-सी क्लिप और हाथ में कस्टमाइज़ डॉल।
प्रिंसिपल सर ने मुस्कुराकर स्वागत किया। वहां मौजूद सारा स्टाफ उनकी सेवा चाकरी में लगा हुआ था। उस प्यारी सी लड़की को देख सबकी आंखों में एक चमक सी आ गई थी।
"वेलकम, सर। हमें खुशी है कि आप अपनी बेटी का एडमिशन हमारे स्कूल में......" अभी प्रिंसिपल सर अपने शब्दों को पूरा भी नहीं कर पाए थें कि जिन्दल साहब बोल पड़े — "खुशी तो हमें भी है, सर। बस… कुछ छोटी-छोटी शर्तें हैं।"मिस्टर जिन्दल हल्की मुस्कान, लेकिन बेहद ठंडी आवाज में बोले।
"जी, कहिए।" प्रिंसिपल सर ने बड़े ही तहजीब से कहा।
मैं अपनी प्रिंसेस को बहुत प्यार करता हूं इसलिए मैं चाहता हूं कि मैं उसके लिए कुछ नियम बनाए है — शर्त नं. 1 — "मेरी बेटी को कोई डांटेगा नहीं। बिल्कुल भी नहीं। उसकी भावनाएं बहुत कीमती हैं।" जो सुनकर प्रिंसिपल थोड़ा सा सकपका गया।
"लेकिन सर, बच्चों को समझाना......?"
"समझाना और डांटना… दो अलग बातें हैं। समझाइए… पर प्यार से।" जिन्दल साहब ने गहरी मुस्कान के साथ कहा।
आनिया कुर्सी पर झूलते हुए बोली—
"और अगर कोई मुझे जोर से बोलेगा, तो मैं पापा को बता दूंगी।"
जिस पर सभी उसकी तरफ देखने लगे।
शर्त न.— 2. "अगर उसने होमवर्क नहीं किया… तो समझ लीजिए वो ‘रिसर्च’ कर रही थी।
अगर उसने क्लास में बात की… तो वो ‘लीडरशिप स्किल’ है।”जिन्दल साहब ने कहा तो सबकी आंखें चौड़ी हो गई। यह कैसा शर्त है?
“हाँ! मैं लीडर हूँ।”आनिया तो खुशी से झूम उठी।
शर्त नं.— 3. “सज़ा नहीं, स्पा ब्रेक”
“अगर कभी उसे टाइम-आउट देना पड़े… तो उसे ‘रिलैक्सेशन रूम’ भेजा जाए।
वहां सॉफ्ट कुर्सी, कार्टून और स्ट्रॉबेरी मिल्कशेक होना चाहिए।
बच्चे गलती नहीं करते… वो थक जाते हैं।”
शर्त नं.— 4 “कम्पनसेशन क्लॉज”
“अगर खेलते-खेलते उसने किसी को धक्का दे दिया…
तो मान लीजिए वो बच्चा उसकी स्पीड समझ नहीं पाया।
ऐसे में दूसरे बच्चे का परिवार उसे ‘सॉरी गिफ्ट’ देगा।
छोटा सा टेडी बियर भी चलेगा।”
“सर… ये थोड़ा.....” प्रिंसिपल सर ने खांसते हुए कहा हि था कि जिंदल साहब ने इस बार भी बात बीच में काट दी।
“थोड़ा नहीं, बहुत प्रैक्टिकल हूं मैं।”जिंदल साहब मुस्कराएं। और आगे कहा।
शर्त नं. 4 — “स्पेशल फेसिलिटी”
" उसकी कुर्सी बाकी बच्चों से 2 इंच ऊंची होगी ताकि उसे दुनिया ऊपर से देखने की आदत पड़े। स्कूल बस में सिर्फ वही खिड़की वाली सीट पर बैठेगी।
लंच में अगर उसका मन न करे… तो शेफ तुरंत नया मेन्यू बनाएगा।
“और मेरी पानी की बोतल रोज नई होनी चाहिए!”आनिया ने मुस्कुरा कर कहा।
“हाँ, मेरी बेटी को राजकुमारियों वाली ट्रीटमेंट मिलना चाहिए।" जिन्दल साहब ने कहा।
"अगर मेरी बेटी से गलती हो जाए… तो उसे गलती नहीं माना जाएगा। वो बस ‘क्रिएटिव एक्सप्रेशन’ होगा।"
"मतलब…?" प्रिंसिपल सर भौंचक्के रह गए फिर भी पूंछ लिया।
"मतलब अगर वो दीवार पर क्रेयॉन से ड्रॉइंग बना दे… तो वो स्कूल की नई आर्ट इंस्टॉलेशन होगी।" जिन्दल साहब ने कहा तो इस बार सबका दिमाग फिर गया।
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आज के लिए इतना ही मिलते हैं अगले एपिसोड में। तब तक के लिए बाय बाय 👋 🌼 🍂